पैगंबरों और रसूलों की आवश्यकता
The Need For Messengers And Prophets
मनुष्य अपनी जैविक आवश्यकताओं और अपनी प्रवृत्तियों को पूरा करने के लिए प्रेरित होता है, और सही और गलत की किसी कसौटी के बिना वह निश्चित रूप से भटक जाएगा। इतिहास के पन्ने मनुष्य द्वारा मनुष्य पर किए गए अत्याचारों से भरे पड़े हैं। लालच, स्वार्थ, हत्या, एकाधिकार और दुराचार, ये सब मनुष्य द्वारा अपनी अस्तित्व-रक्षा की प्रवृत्ति को पूरा करने की अभिव्यक्तियाँ हैं।
Mankind is driven to satisfy his organic needs and his instincts, and without any form of criterion for right and wrong surely he will go astray. The annals of history are full of man's oppression of man. Greed, selfishness, killing, monopoly, and vice are manifestations of man fulfilling his survival instinct.
यदि मनुष्य अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए दूसरों की जान लेने तक को तैयार हो जाए, तो निश्चित रूप से मनुष्य को अपने कर्मों पर नियंत्रण की ज़रूरत है। कर्म के लिए कोई मानदंड न हो, तो अपनी ज़रूरतों की संतुष्टि की खोज उसे दूसरों के साथ निरंतर संघर्ष की ओर ले जाएगी। एक व्यक्ति की स्वतंत्रता दूसरे की गुलामी है। ईश्वर ने मनुष्य को उसकी अपनी मर्ज़ी पर नहीं छोड़ा है; मनुष्य को कभी भी यह आज़ादी नहीं रही कि वह अपना जीवन जिस तरह उसे सबसे अच्छा लगे, उसी तरह बिताए। मनुष्य को सीमित, आश्रित और अपूर्ण मानने की हमारी धारणा के पूर्णतः अनुरूप है कि मनुष्य अपना रास्ता, अपनी अपनी व्यवस्था लाए, तो वह गलत होगा, क्योंकि जीवन की उसकी समझ सीमित है। मनुष्य सदैव पक्षपात, असमानता, मतभेद, विरोधाभास और अपने वर्तमान वातावरण के प्रभाव के अधीन रहता है, जो पूर्ण निष्पक्षता और निरपेक्ष सत्य का आधार नहीं हो सकता। मनुष्य द्वारा बनाई गई कोई भी व्यवस्था इन्हीं पक्षपात, असमानता, मतभेद, विरोधाभास और प्रभाव से ग्रस्त होगी। आज के राजनेताओं और व्यापारिक जगत के साथ उनके संबंध इस बात की याद दिलाते हैं कि राजनीति का तथाकथित निष्पक्ष स्वरूप किस तरह दुरुपयोग में लाया जा सकता है।