5 सभ्यताओं का टकराव
5 The Clash between Civilisations
इस्लाम और अन्य सभ्यताओं के बीच टकराव का इतिहास
The History of the Clash between Islam and other Civilisations
धर्मों और सभ्यताओं के बीच टकराव और संघर्ष (सिरा') प्राचीन है, और हमारी चिंता का विषय इस्लाम का अन्य धर्मों और सभ्यताओं के साथ टकराव है। सच्चाई यह है कि इस्लाम संघर्ष का दीन है, उस समय से जब मुहम्मद ﷺ को सत्य को खुलकर प्रकट करने का आदेश दिया गया, यहाँ तक कि क़यामत क़ायम हो जाए। जब उन्हें आदेश दिया गया कि जो कुछ उन्हें आज्ञा हुई है उसे खुलकर सुनाएँ, तो इस्लाम की अवधारणाओं और कुफ़्र की अवधारणाओं के बीच बौद्धिक संघर्ष शुरू हो गया। यह बौद्धिक संघर्ष हमारे समय तक जारी रहा है। इसमें अन्य प्रकार के संघर्ष जुड़ जाने के बावजूद यह न रुका है, न इसे रुकने की अनुमति है। बौद्धिक संघर्ष का अर्थ है तीखी शैली, तीव्रता और कठोरता के साथ विचारों का खंडन करना। रसूल ﷺ ने इसे अल्लाह (SWT) के आदेश का पालन करते हुए अंजाम दिया। इसलिए अल्लाह (SWT) फ़रमाता है:
The clash/struggle (sira'a) between religions and civilisations is ancient, and what concerns us is the clash between Islam and other religions and civilisations. The truth is that Islam is a deen of struggle from the time when Muhammad (PBUH) was commanded to come out openly with the truth until the Hour is established. When He (PBUH) was ordered to speak out openly what he was commanded, the intellectual struggle commenced between the concepts of Islam and the concepts of kufr. This intellectual struggle has continued until our time. It has not stopped nor is it allowed to stop, despite what was added to it of other types of struggle. The intellectual struggle is refuting thoughts with sharp styles, and with intensity and harshness. The Messenger (PBUH) performed it in execution of the command of Allah (SWTH). So He (SWTH) would say:
निश्चय ही तुम और जिनकी तुम अल्लाह के सिवा इबादत करते हो, वे सब जहन्नम का ईंधन हैं। बेशक तुम उसमें प्रवेश करोगे। [TMQ अल-अंबिया: 98]
"Verily you and what you worship besides Allah are fuel for the Hellfire! Surely you will enter it" [TMQ Al-Anbiya: 98].
और:
And:
एक चुगलख़ोर, जो इधर-उधर लांछन लगाता फिरता है। भलाई से रोकने वाला, सीमा लांघने वाला, पापी। क्रूर, और इन सबके बावजूद नीच जन्म वाला।
"A slanderer, going about with calumnies. A hinderer of good, transgressor, sinful. Cruel, after all that, base-born" [TMQ Al-Qalam: 11-3].
और:
And:
फिर निश्चय ही तुम, ऐ झुठलाने वाले पथभ्रष्टो! ज़क़्क़ूम के वृक्ष से खाओगे। फिर उसी से पेट भरोगे। फिर उसके ऊपर खौलता हुआ पानी पियोगे। अतः प्यासे ऊँटों की तरह पियोगे। प्रतिफल के दिन यही उनकी मेहमानी होगी! हमने ही तुम्हें पैदा किया है, तो तुम विश्वास क्यों नहीं करते? [TMQ अल-वाक़िआ: 51-7]
"Then, verily, you misguided, deniers. You will surely eat of the tree of Zaqqum. Then you will fill bellies therewith. Drink boiling water on top of it. So you will drink the drinking of thirsty camels. That will be their entertainment on the Day of Recompense! We created you, so why do you not believe?" [TMQ Al-Waqi’a: 51-7].
और:
And:
"निस्संदेह अपराधी गुमराही में हैं और (नरक की) आग में जलेंगे!" [TMQ अल-क़मर: 47] और:
"Verily the criminals are in misguidance and will burn!" [TMQ Al-Qamar: 47] And:
फिर हम प्रार्थना करते हैं और इनकार करने वालों पर अल्लाह की लानत का आह्वान करते हैं" {आले इमरान: 61}।
"Then we pray and invoke the curse of Allah upon the deniers" [TMQ Al- Imran: 61].
और:
And:
"अबू लहब के दोनों हाथ नष्ट हो जाएँ और वह स्वयं भी नष्ट हो गया" {अल-मसद: 1}।
"Perish the hands of Abu Lahab and he has perished" [TMQ Al-Masad: 1].
और:
And:
"निस्संदेह, जो तुम्हारा शत्रु है, वही जड़ से कटा रहेगा" [तफ़सीर सूरह अल-कौसर: 3]। यह बौद्धिक संघर्ष (जिहाद) उसके इस कथन के विरोधाभासी नहीं है: (SWT)
"Verily the one who makes you angry will be cut off" [TMQ Al-Kauthar: 3]. This intellectual struggle does not contradict with His (SWTH) saying:
"अपने रब के रास्ते की ओर (हिकमत) और अच्छी नसीहत के साथ बुलाओ। और उनसे उस तरीक़े से बहस करो जो सबसे बेहतर हो। बेशक तुम्हारा रब ख़ूब जानता है कि कौन उसके रास्ते से भटक गया है, और वह उन्हें भी ख़ूब जानता है जो हिदायत पाने वाले हैं।" [TMQ अन-नहल: 125] यह इसलिए है क्योंकि यहाँ (हिकमत) से मुराद बुद्धिसंगत प्रमाण (बुरहान अक़ली) और अकाट्य तर्क (हुज्जत दामिग़ा) है; और अच्छी नसीहत से मुराद सुंदर स्मरण-दिलाना है। सुंदर स्मरण-दिलाना विचारों और भावनाओं दोनों को एक साथ प्रभावित करके होता है, जैसा कि अल्लाह (SWTH) का फ़रमान है:
"Invite to the way of your Lord with (hikma) and fair preaching. And argue with them with what is better. Verily your Lord knows best who has gone astray from His way and He knows best those who are guided." [TMQ Al-Nahl: 125] This is because the (hikma) here is the intellectual proof (burhan 'aqli) and the irrefutable evidence (hujjat damigha); and the fair preaching is the beautiful reminder. The beautiful reminder is by impressing the thoughts and emotions collectively like His (SWTH) saying:
"किताब वालों से बहस न करो, मगर उस तरीक़े से जो बेहतर हो, सिवाय उन लोगों के जो उनमें से ज़ुल्म करने वाले हैं।" [TMQ अल-अंकबूत: 46] जो बेहतर है वह यह है कि बहस में उनकी ओर से पहुँचने वाले नुक़सान से मुँह मोड़ लिया जाए। और जो लोग लड़ाई करके या उन पर लागू होने वाले हुक्म को मानने से इनकार करके और जिज़या अदा करने से इनकार करके ज़ुल्म करते हैं, उनसे बहस तलवार के ज़रिए होती है। बौद्धिक संघर्ष के एक उदाहरण के तौर पर, उनके बारे में ﷺ जो बात नक़ल की गई है, वह वही है जो इब्ने अबी शैबा और अब्दुर्रज़्ज़ाक़ ने अपनी मुसनदों में, और सीरत लिखने वालों और दूसरों ने, क़तादा से नक़ल की है कि "अल्लाह के रसूल ﷺ ने एक आदमी से कहा:"
"Argue not with the People of the Book except with that which is better except those who do wrong among them." [TMQ Al-Ankabut: 46] That which is better is to turn away from their harm to you in the argument. As for those who do wrong through fighting or refusing the enforcement of the rule upon them and the paying of jizyah, arguing with them is by the sword. As an example of intellectual struggle narrated regarding Him is what ibn Abi Sheeba and Abdurrazaq reported in their Musnads,as well as the writers of the Seerah and others, from Qatadah that "the Messenger of Allah (PBUH) said to a man:
"इस्लाम स्वीकार कर लो, अबू अल-हारिस।" ईसाई ने कहा: "मैंने इस्लाम स्वीकार कर लिया है।" तो उसने कहा: "इस्लाम स्वीकार कर लो, अबू अल-हारिस।" ईसाई ने कहा: "मैंने इस्लाम स्वीकार कर लिया है।" फिर उसने तीसरी बार उससे कहा: "इस्लाम स्वीकार कर लो, अबू अल-हारिस।" ईसाई ने कहा: "मैंने तुमसे पहले ही इस्लाम स्वीकार कर लिया है।" तो वह क्रोधित हो गया और बोला: "तुम झूठ बोलते हो। तुम्हारे और इस्लाम के बीच तीन बातें रुकावट हैं: तुम्हारा शराब खरीदना (उसने यह नहीं कहा: 'तुम्हारा शराब पीना'), तुम्हारा सूअर खाना और अल्लाह के लिए किसी बच्चे को पुकारना।" और अस-सना'नी ने अपनी 'तफ़सीर' में अब्दुर्रज़्ज़ाक से, उन्होंने क़तादah से रिवायत किया कि उबय्य बिन ख़लफ़ एक सड़ा हुआ दाँत लेकर आया, उसे हवा में बिखेरते हुए बोला: "क्या अल्लाह इसे फिर से ज़िंदा करेगा, ऐ मुहम्मद?" तो नबी ﷺ ने फ़रमाया:
'Embrace Islam, Abu Al-Harith.' The Christian said: 'I have embraced Islam.' So he said: 'Embrace Islam, Abu Al-Harith.' The Christian said: 'I have embraced Islam.' So he said to him the third time: 'Embrace Islam, Abu Al-Harith.' The Christian said: 'I have embraced Islam before you.' So he became angry and said: 'you lie. Three matters barred between you and Islam: Your purchasing of wine (he did not say: 'Your drinking wine'), your eating the pig and your invoking a child for Allah.'" And As-Sana'ni reported in his 'Tafseer' from Abdurrazaq from Qatadah that Ubayy bin Khalaf came with a decaying tooth while scattering it in the wind and said: Will Allah give life to this, O Muhammad? The Prophet (PBUH) said:
"हाँ, अल्लाह इसमें जान डालेगा और तुम्हें मृत्यु देगा और तुम्हें आग में दाख़िल करेगा!" और अल-हाकिम ने 'अल-मुस्तदरक' में इसे रिवायत किया और इसकी सहीह होने की पुष्टि की, जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ि.) से, जिन्होंने कहा:
"Yes, Allah will give life to it and cause you to die and enter you into the Fire!" And Al-Hakim reported in 'Al-Mustadrak' and authenticated it from Jabir bin Abdullah (ra) who said:
एक दिन कुरैश इकट्ठा हुए और उतबा बिन रबीआ उनके पास आया और बोला: ऐ मुहम्मद, क्या तुम बेहतर हो या अब्दुल्लाह?...अल्लाह के रसूल ﷺ चुप रहे। फिर अल्लाह के रसूल ﷺ ने कहा: क्या तुमने अपनी बात पूरी कर ली? उसने कहा: हाँ। तब अल्लाह के रसूल ﷺ ने पढ़ा: 'बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम। हा मीम। अल्लाह की ओर से, जो रहमान और रहीम है, एक अवतरण' यहाँ तक कि आप ﷺ पहुँचे: 'परन्तु यदि वे मुँह मोड़ लें, तो कह दो: मैंने तुम्हें 'आद और समूद की कड़कती बिजली जैसी कड़क' से डरा दिया है' [क़ुरआन, सूरा फ़ुस्सिलत: 1-13]। उतबा ने उनसे कहा: बस, बस। क्या इसके सिवा तुम्हारे पास कुछ और है? उन्होंने कहा: नहीं। फिर वह क़ुरैश के पास लौटा और उन्होंने पूछा: तुम्हारे पीछे क्या है? उसने कहा: मैंने कोई बात नहीं छोड़ी जो मेरे ख़याल में तुम उनसे कहते, सिवाय इसके कि मैंने उनसे कह दी। उन्होंने पूछा: क्या उन्होंने तुम्हें जवाब दिया? उसने कहा: हाँ। उस ज़ात की क़सम जिसने छत को ऊँचा खड़ा किया, मैं उनकी बात में कुछ नहीं समझा सिवाय इसके कि उन्होंने तुम्हें 'आद और समूद की बिजली' से डराया। उन्होंने कहा: तुम्हारा बुरा हो, एक आदमी ने तुमसे अरबी में बात की और तुम नहीं जानते कि उसने क्या कहा? उसने कहा: नहीं, अल्लाह की क़सम, मैं बिजली के ज़िक्र के सिवा कुछ नहीं समझा। यह उस बौद्धिक संघर्ष का कुछ हिस्सा है जो उनसे (ﷺ) वर्णित हुआ।
"Quraysh convened one day and Utbah bin Rabi'ah came to him and said: O Muhammad, are you better or Abdullah?...The Messenger of Allah was silent. Then the Messenger of Allah said: Have you finished? He said: Yes. So the Messenger of Allah recited: 'Bismillah ir-Rahmaan ir-Raheem. Ha Meem. A revelation from Allah, ir- Rahmaan, ir-Raheem' until he reached: 'But if they turn away, then say: 'I have warned you of a lightning bold like the lightning bolt of 'Ad and Thamud' [TMQ Fussilat: 1-13] Utbah said to him: It is enough, it is enough. Have you anything other than this? He said: No.So he returned to Quraysh and they said: What is behind you? He said: I did not leave anything that I thought you would say to him except that I said to him. They said: Did he answer you? He said: Yes. By the One who set upright the structure, I understood nothing of what he said except that he warned you of a lightning bolt of 'Aad and Thamud. They said: Woe unto you, a man spoke to you in Arabic and you do not know what he said? He said: No, by Allah, I understood nothing except mentioning the lighting bolt." This is some of what was narrated from him of intellectual struggle.
इसी प्रकार, कुछ सहाबा भी ऐसा करते थे। इसी में से वह है जो इब्न इसहाक ने अपनी सनद के साथ अज़-ज़ुबैर से रिवायत किया, जिन्होंने कहा: "रसूलुल्लाह ﷺ के बाद मक्का में सबसे पहले ऊँची आवाज़ से क़ुरआन पढ़ने वाले अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि.) थे। उन्होंने कहा: एक दिन रसूलुल्लाह ﷺ के साथी इकट्ठा हुए और बोले: अल्लाह की क़सम, क़ुरैश ने अभी तक ऊँची आवाज़ से पढ़ा जाता क़ुरआन नहीं सुना, तो कौन ऐसा व्यक्ति है जो उन्हें इसे सुनाए? अब्दुल्लाह बिन मसऊद ने कहा: मैं। उन्होंने कहा: हमें डर है कि वे तुम्हारे विरुद्ध होंगे। हमें ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत है जिसके रिश्तेदार हों जो उसे लोगों से बचाएँ, अगर वे उसके साथ बुरा इरादा रखें। उन्होंने कहा: मुझे छोड़ दो। अल्लाह (SWTH) मेरी रक्षा करेगा। फिर उन्होंने कहा: अगले दिन, बिन मसऊद दोपहर से पहले मक़ामे (इब्राहीम, काबा के पास) पर आए और पढ़ने लगे:"
Likewise, some of the Sahabah would do this. Of this is what ibn Ishaq narrated with his chain from Az-Zubair who said: "The first to loudly recite the Qur'an in Makkah after the Messenger of Allah was 'Abdullah bin Mas'oud (ra). He said: The companions of the Messenger of Allah assembled one day and said: By Allah, the Quraysh have not heard the Qur'an being loudly recited yet, so which man will make them hear it? 'Abdullah bin Mas'oud said: Me. They said: Verily we fear them against you. We intend a person who has kinsfolk who protect him from the people if they have evil designs upon him. He said: Leave me. Allah (SWTH) will protect me. He said: On the morrow, bin Mas'oud came to the maqam (of Ibrahim at the Ka'aba) in the forenoon and recited:
'अर-रहमान ने क़ुरआन सिखाया' [सूरा अर-रहमान: 1-2]। फिर वह उनके सामने उसकी तिलावत करने लगे। उन्होंने (वर्णनकर्ता ने) कहा: उन्होंने उस पर विचार किया और फिर पूछने लगे: इब्न उम्म अब्द क्या कह रहा है? उसने कहा: फिर उन्होंने कहा: वह कुछ ऐसी बातें पढ़ रहा है जो मुहम्मद ﷺ लेकर आए थे। तो वे खड़े हो गए और उसके चेहरे पर मारने लगे, और वह अल्लाह की इच्छा के अनुसार जितना पढ़ना संभव था, उतना पढ़ता रहा। फिर वह अपने साथियों के पास लौटे, और उनके चेहरे पर चोट लगी थी। उन्होंने उनसे कहा: हमें तुम्हारे बारे में यही डर था। उसने कहा: अल्लाह के दुश्मन मेरी नज़र में अब से पहले इतने तुच्छ कभी नहीं थे, और यदि तुम चाहो तो मैं कल फिर ऐसा ही करने के लिए तैयार हूँ। उन्होंने कहा: नहीं, तुम्हारे लिए इतना ही काफ़ी है, जो तुमने कहा। तुमने उन्हें वह सुना दिया जो उन्हें नापसंद है।" और इब्न कसीर ने 'जामिउल मसानीद वस-सुनन' में वर्णन किया: "हातिब से, जिन्हें अल्लाह के रसूल ﷺ ने जुरैज बिन मीना के पास भेजा था, जो इस्कंदरिया का मुक़ौक़िस था, उसने उनसे कहा: तुम्हारे नबी उन लोगों के विरुद्ध बद्दुआ क्यों नहीं करते जिन्होंने उन्हें उनकी धरती से निकाल दिया? उन्होंने उससे कहा: जैसे तुम्हारे नबी ने उन लोगों के विरुद्ध बद्दुआ नहीं की जो उन्हें मार डालने का इरादा रखते थे, यहाँ तक कि अल्लाह ने उन्हें अपने पास उठा लिया। उसने उनसे कहा: तुमने अच्छा किया। तुम एक बुद्धिमान व्यक्ति हो जो एक बुद्धिमान व्यक्ति के पास से आए हो।" और अल-हाकिम ने 'अल-मुस्तदरक' में वर्णन किया और कहा कि (यह हदीस) दोनों शेखों (अल-बुखारी और मुस्लिम) की शर्तों पर सहीह है: "अबू मूसा (रज़ि.) से, जिन्होंने कहा: अल्लाह के रसूल ﷺ ने हमें नजाशी की भूमि की ओर प्रस्थान करने का आदेश दिया। यह बात क़ुरैश तक पहुँची और उन्होंने अम्र बिन अल-आस और 'अमारा बिन अल-वलीद को भेजा, और उन्होंने नजाशी के लिए उपहार इकट्ठा किए। वे हमारे पास आए और नजाशी के पास पहुँचे, उपहार लेकर उसके पास पहुँचे, उसे चूमा और उसके आगे सजदा किया। फिर अम्र बिन अल-आस ने कहा: निश्चय ही हमारी एक जमात ने हमारे धर्म को नापसंद किया है और वे आपकी धरती में हैं। नजाशी ने उससे कहा: मेरी धरती में? उसने कहा: हाँ। उसने कहा: उन्हें मेरे पास भेज दो। जाफ़र ने हमसे कहा: तुम में से कोई न बोले। आज मैं तुम्हारा प्रवक्ता हूँ।" हम नजाशी के पास पहुँचे, जब वह अपनी सभा में बैठा था, अमर उसके दाईं ओर था और 'अमारा उसके बाईं ओर, और पादरी और भिक्षु (samatin) बैठे हुए थे। अमर और 'अमारा ने उससे कहा: ये लोग आपको सजदा नहीं करते। जब हम उसके पास पहुँचे, तो उसके साथ के पादरियों और भिक्षुओं ने हमें डाँटा: अपने राजा को सजदा करो। जा'फ़र ने कहा: हम अल्लाह के सिवा किसी को सजदा नहीं करते। नजाशी ने उससे कहा: और वह कौन है? उसने कहा: निश्चय ही अल्लाह (SWTH) ने हमारे बीच अपना (SWTH) रसूल भेजा है, और वह वही रसूल है जिसकी भविष्यवाणी ईसा ने उनके बाद आने के बारे में की थी, जिसका नाम अहमद है। उन्होंने हमें आदेश दिया कि हम अल्लाह की इबादत करें और उसके साथ किसी को शरीक न ठहराएँ, नमाज़ क़ायम करें, ज़कात दें।
'Ar-Rahmaan. Has taught the Qur'an' [TMQ Ar-Rahman: 1-2]. Then he faced them reciting it. He said: They contemplated it then began asking: What is ibn Umm 'Abd saying? He said: Then they said: He is reciting some of what Muhammad came with. So they stood and began striking upon his face and he maintained reciting what Allah willed that he reaches. Then he left to his companions, and he had been affected in the face. They said to him: This is what we feared for you. He said: The enemies of Allah were no more contemptible to me than now, and if you wish I will awake for the like tomorrow. They said: No, it is enough for you, what you said. You have made them hear what they detest." And ibn Kathir reported in 'Jami' Al-Masaneed wa As-Sunan': "From Hatib whom the Messenger of Allah (PBUH) had sent to Juraij bin Mina who was the Muqawqis of Alexandria who said to him: Why does your Prophet not invoke against those who expelled him from his land? He said to him: Just as your Prophet did not invoke against those who intended to kill him until Allah raised him to Him. He said to him: You have acted well. You are a wise man coming from a wise man." And Al- Hakim reported in 'Al-Mustadrak' and said (it is) saheeh upon the conditions of the two Sheikhs (Al-Bukhari and Muslim): "From Abu Musa (ra) who said: The Messenger of Allah commanded us to depart to the land of An-Najashi. That reached Quraysh and they sent Amru bin Al-As and 'Amara bin Al-Waleed, and they collected gifts for An- Najashi. They came to us and advanced to An-Najashi, arrived to him with gifts, kissed him and prostrated to him. Then Amru bin Al-As said: Verily a folk from us disliked our religion and they are in your land. An- Najashi said to him: In my land? He said: Yes? He said: Send them to me. Ja'far said to us: Let none of you speak. I am your speaker today. So we reached An-Najashi while he was sitting in his assembly, Amru at his right and 'Amara at his left, and the priests and monks seated (samatin). Amru and Amara said to him: They do not prostrate to you. When we reached him, the priests and monks with him chided us: Prostrate to your king. Ja'far said: We do not prostrate except to Allah. An-Najashi said to him: And who is that? He said: Verily Allah (SWTH) sent among us His (SWTH) Messenger, and he is the Messenger that Isa prophesied (to come) after him whose name is Ahmad. He commanded us to worship Allah without associating anything with Him, to establish the prayer, pay the zakat,
और उन्होंने हमें भलाई का आदेश दिया और बुराई से मना किया। उन्होंने कहा:
and he commanded us the good and forbade us from the evil. He said:
उसकी बातों से लोग चकित रह गए। जब अम्र ने यह देखा, तो उसने (नजाशी से) कहा: अल्लाह बादशाह को सलामत रखे। ये लोग ईसा बिन मरयम के बारे में आपका विरोध करते हैं। इसलिए नजाशी ने जाफ़र से कहा: तुम्हारा साथी मरयम के बेटे के बारे में क्या कहता है? उसने कहा: वह उनके बारे में वही कहता है जो अल्लाह ने कहा है: {वह अल्लाह की रूह है और उसका वह कलिमा है जिसे उसने कुंवारी पवित्र स्त्री की ओर डाला, जिसे किसी पुरुष ने छुआ तक नहीं था।} फिर नजाशी ने ज़मीन से एक छड़ी उठाई और उसे उठाकर कहा: ऐ पादरियो और भिक्षुओ, जो तुम ईसा बिन मरयम के बारे में कहते हो, वह इस छड़ी की चौड़ाई से भी ज़्यादा नहीं है। तुम्हारा स्वागत है और उस जगह का भी जहाँ से तुम आए हो। मैं गवाही देता हूँ कि वह अल्लाह के रसूल ﷺ हैं और वही हैं जिनकी भविष्यवाणी ईसा बिन मरयम ने की थी। अगर मेरी बादशाहत की ज़िम्मेदारी न होती तो मैं उनके पास जाता और उनकी जूतियाँ उठाने तक चला जाता। मेरे देश में जितने दिन चाहो रहो। फिर उसने उनके लिए खाने और कपड़ों का हुक्म दिया। और उसने कहा: इन दोनों को उनके तोहफे लौटा दो। और अहमद ने इस हदीस को उम्मे सलमा (रज़ि०) से विस्तार के साथ रिवायत किया है, और यह अबू मूसा (रज़ि०) की हदीस से ज़्यादा विस्तृत है। अल-हैसमी ने इसे 'अल-मज्मा' में रिवायत किया और कहा: इसके रावी सहीह हदीसों के रावी हैं, सिवाय इब्न इसहाक़ के, और उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्होंने इसे सुना है। उनकी वफ़ात के बाद भी मुसलमान कुफ़्र के धर्मों और सभ्यताओं के साथ बौद्धिक और सैन्य संघर्ष में लगे रहे, जैसा कि आगे आएगा, यहाँ तक कि इस्लाम प्राचीन दुनिया के क्षेत्रों में फैल गया, सिवाय थोड़े से हिस्से के। लोग भीड़ की भीड़ इस्लाम में दाखिल हुए, और उन्होंने अपने पिछले धर्मों और सभ्यताओं को त्याग दिया और एक नई, एकीकृत उम्मत बन गए, जिसका अक़ीदा एक था, जिसके विचार एक थे, जीवन के प्रति जिसका दृष्टिकोण एक था, जिसकी व्यवस्था एक थी, जिसका हित एक था, और जिसका सर्वोच्च आदर्श एक था, अर्थात अल्लाह के कलिमे को बुलंद करना। उसने दुनिया में अग्रणी राज्य का स्थान ग्रहण किया, और उसके नगर प्रबुद्ध विचार, तौहीद के अक़ीदे और न्यायपूर्ण शरीयत के प्रकाश-केंद्र बन गए। उन्होंने किताब और सुन्नत, तथा अरबी भाषा को दुनिया तक पहुँचाया, जिसके परिणामस्वरूप इस्लाम सबकी विचारधारा बन गया और अरबी भाषा में रुचि बहुत बढ़ गई, यहाँ तक कि उनमें अरब और गैर-अरब के बीच भेद किए बिना मुज्तहिद और भाषा के विद्वान पैदा हुए, और अल्लाह की कृपा से वे आपस में भाई बन गए। आज हम अरबी भाषा के विरुद्ध एक दुर्भावनापूर्ण अभियान देखते हैं, जिसका उद्देश्य उसे इस्लाम से अलग करना है, और इसके लिए बुरे तरीके अपनाए जा रहे हैं, जैसे बोलचाल की भाषा (कोलोक्वियलिज़्म) की ओर बुलाना, मुसलमानों की अन्य भाषाओं को लैटिन लिपि में लिखना, और स्थानीय बोलचाल की भाषाओं को अरबी मान लेना। यह सर्वविदित है कि जो व्यक्ति अरबी नहीं जानता, उसके लिए इस्लाम को समझना असंभव है, इजतिहाद करना तो दूर की बात है। वे चाहते हैं कि अरबी लैटिन और सुरयानी जैसी हो जाए, ताकि इस अप्रचलित भाषा के विशेषज्ञों के सिवा कोई इस्लाम को न समझ सके। वास्तव में, वे चाहते हैं कि यह एक मृत भाषा बन जाए। जो व्यक्ति अरबी नहीं समझता, वह खबर (ख़बर), इंशा (रचना), अम्र (आदेश), नही (निषेध), हक़ीक़ा (शाब्दिक अर्थ) और मजाज़ (लाक्षणिक अर्थ), इल्लत (कारण), सबब (हेतु), शर्त, मानेअ (निवारक), आम (सामान्य), ख़ास (विशिष्ट), मुतलक़ (निरपेक्ष), मुक़य्यद (सापेक्ष), मंतूक़ (स्पष्ट शब्द के संकेत) और मफ़हूम (समझा गया अर्थ) तथा इल्तिज़ाम (अनिवार्य निष्कर्ष), अक्षरों के अर्थ, रूपांतरण, व्याकरण आदि को कैसे समझ सकता है? शरई नुसूस को समझने के लिए ये सब आवश्यक हैं। जो कोई इसकी ओर बुलाता है, वह इस्लाम का शत्रु है, और मुसलमानों में से जो कोई इन झूठे दावों से धोखा खाता है, वह नादान है।
हालाँकि अल्लाह (SWTH) के दीन को अपनाना अरबों के बीच भी पूर्ण और परिपक्व तरीके से आम नहीं हुआ। पराजित धर्म और सभ्यताएँ मौजूद रहीं। शुरू में वे इसलिए कमज़ोर थीं कि उनके विकास के अनुकूल माहौल ख़त्म हो गया था। इस तरह ज़िंदीक़ों (zanadiqa) का आंदोलन विफल हुआ और दबा दिया गया। लेकिन बाद में अरबी भाषा की उपेक्षा के कारण इज्तिहाद के दरवाज़े बंद हो गए और अहकाम को समझने में उलझन पैदा हुई, जिससे राज्य कमज़ोर होते-होते छोटी-छोटी रियासतों में बँट गया। प्राचीन सभ्यताओं के कुछ विचार मुसलमानों में घुस आए, जैसे हिंदू दर्शन से लिया गया तपस्या और शरीर को दंड देने का विचार, कुछ लोगों में क़बायलीपन, कुछ में छिपे गुप्त अर्थों का विचार (बातिनिय्या), और ख़िलाफ़त के केंद्र से अलग होने की प्रवृत्ति। इन सबने राज्य को कमज़ोर किया और विजय-अभियान रोक दिए। यहाँ तक कि सलीबी (Crusaders) और तातारी उस पर लालच की नज़र डालने लगे, यहाँ तक कि उस्मानी (Ottomans) आए, जिन्होंने राज्य के अधिकांश क्षेत्रों को अपने अधिकार में एकजुट किया और विजय-अभियान फिर से शुरू किए। लेकिन उन पर सैन्य चरित्र हावी रहा, और वे इस विचारधारा को सही ढंग से लेकर नहीं चले, इसलिए विजित भूमि के लोग इस्लाम के साँचे में उस तरह नहीं ढले जैसे पहली विजयों में हुआ था। उज़्बेक, ताजिक, पश्तून, तुर्क, बर्बर, भारतीय, (अद-दीलम), तुर्कमान और कुर्द लोगों के बीच, उनके इस्लाम के प्रति प्रेम और उससे उनके लगाव को, उस्मानी काल में विजित हुए लोगों जैसे सर्ब, यूनानी, हंगेरियन, क्रोएट, रोमानियाई और दूसरों से अलग देखा जा सकता है। ये लोग जल्दी ही पश्चिम के साथ मिलकर इस्लाम और उसके राज्य के विरुद्ध षड्यंत्र करने लगे, और जब भी बदला लेने का अवसर मिला, उन्होंने उसे छोड़ा नहीं। फिर इस्लाम के विरुद्ध सांस्कृतिक और मिशनरी आक्रमण शुरू हुए, यहाँ तक कि पश्चिमी सभ्यता ने इस्लामी राज्य का विनाश कर दिया, उसे टुकड़ों में बाँट दिया, और मुसलमानों के जमाअत (समुदाय) को विभाजित कर दिया। पश्चिमी पूंजीवाद इस सीमा पर ही नहीं रुका; बल्कि उसने मुसलमानों के बीच अपनी राष्ट्रवाद, देशभक्ति, लोकतंत्र, स्वतंत्रता, मनुष्य-निर्मित नियमों और काल्पनिक सीमाओं की अवधारणाएं फैलाने का काम किया। उसने इन छोटे-छोटे राज्यों पर भ्रष्ट शासक नियुक्त किए जो उसके साथ गठबंधन में थे, जो उसके प्रभाव और विचारों को मज़बूत करते, उसके हितों की रक्षा करते, विभाजन को बनाए रखते, अल्लाह के मार्ग से भटकते, और हर उस सच्चे व्यक्ति का विरोध करते जो उनके फंदे से मुक्त होने का प्रयास करता। इस काम में उनकी मदद उन एजेंट बुद्धिजीवियों ने की जो पूरे जोश के साथ पश्चिमी विचारों की ओर बुलाते, उनका बचाव करते, और इस्लामी सभ्यता के विरुद्ध संघर्ष करते, अंधी निष्ठा के साथ उम्मत के शत्रु के पक्ष में खड़े होते। क्रूसेडर शत्रुओं और मुस्लिम देशों के प्रभावशाली लोगों में से उनके एजेंटों ने मीडिया के साधनों और शिक्षा को अपने नियंत्रण में ले लिया, और इस प्रकार वे स्वयं भटके हुए और दूसरों को भटकाने वाले बन गए। यह बौद्धिक हमला यहीं नहीं रुका, बल्कि पश्चिमी सभ्यता के उन विचारों का आह्वान ज़ोरों पर है, जिन्हें वे स्वतंत्रताएं, लोकतंत्र, बहुलवाद, नागरिक समाज, संस्थाओं का राज्य, मानवाधिकार, महिलाओं के अधिकार, देशभक्ति का बंधन, धार्मिक संवाद आदि कहते हैं। इस प्रकार इसे वास्तव में इस्लामी और पूंजीवादी, दो सभ्यताओं के बीच एक हिंसक बौद्धिक संघर्ष माना जाता है। यह टकराव इतना स्पष्ट है कि इसे किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं, क्योंकि हम इसे प्रतिदिन जी रहे हैं, चाहे कुछ बुद्धिजीवी और प्रभावशाली पूंजीपति इसे विकृति और धोखे के ज़रिए कितना भी छिपाने का प्रयास करें। उदाहरण के लिए, हम पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन को 'The Favourable Opportunity (al-fursa as-saniha)' में यह कहते हुए पाते हैं: "हमारा अलगाव हमारे मूल्यों और धार्मिक विश्वासों के विपरीत है, जो पूरी दुनिया में सद्गुण फैलाने का आह्वान करते हैं।" वे अपनी पुस्तक 'Victory without War' में यह भी कहते हैं: "क्रांतिकारी इस्लामी विचारधारा आधुनिकीकरण के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया है। कम्युनिज़्म इतिहास के पहिये को आगे घुमाने का वादा करता है, और इस्लामी कट्टरवाद उसे पीछे लौटा देता है… कम्युनिस्ट और इस्लामी क्रांतिकारी वैचारिक दुश्मन हैं जो एक साझा लक्ष्य अपनाते हैं: किसी भी आवश्यक साधन से सत्ता हासिल करने की इच्छा, ताकि अपने आदर्शों पर आधारित एक प्रभुत्वशाली तानाशाही थोपी जा सके, जो असहनीय है।" हम देखते हैं कि इतालवी प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी कहते हैं: "हमें अपनी सभ्यता की श्रेष्ठता के प्रति सजग रहना होगा। पूर्व पश्चिम की सभ्यता की ओर उन्मुख रहेगा, और यह झुकाव बढ़ता जाएगा। यह एक बार कम्युनिस्ट दुनिया में हुआ था, और इस्लामी दुनिया के कुछ हिस्सों में भी हुआ।" ओस्लो प्रक्रिया की समन्वयक तेरी लार्सन ने फ़िलिस्तीन के मुसलमानों के पश्चिम के साथ सामान्यीकरण की ओर झुकाव का स्वागत किया। ओस्लो और वाई रिवर में यहूदी प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य, ओरी स्पीर, ने अपनी पुस्तक 'द कोर्स (अल-मसीरा)' में लिखा: "महिलाओं के सिरों से दुपट्टे गायब होने लगे, और पोशाकें नीचे से छोटी होने लगीं, एक ऐसी बात जिसका लार्सन ने स्वागत किया, यह मानते हुए कि यह पश्चिम के साथ सामान्यीकरण की ओर झुकाव है।" वास्तव में, ओस्लो से पहले पहली इंतिफ़ादा के दौरान महिलाएं ऐसा करने की हिम्मत नहीं करती थीं। हम पूर्व अंडर-सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फ़िलिस ओकली को यह कहते हुए भी पाते हैं: "हम उन लोगों से सहमत हैं जो कहते हैं कि सभ्यताओं के टकराव को टाला नहीं जा सकता।" अमेरिका की पूर्व विदेश मंत्री मेडेलीन अलब्राइट ने कहा: "हम पर हमला हमारी पहचान की वजह से हुआ। हम वैश्वीकरण से जुड़े हैं और लोकतंत्र, स्वतंत्रता और खुले समाज की रक्षा करते हैं। यही अमेरिका का सार है, जिससे हम पीछे नहीं हट सकते" (अल-कुद्स पत्रिका, नाथन चार्ल्स- वाशिंगटन के अनुवादित शब्दों से उद्धृत)। अमेरिकी येल विश्वविद्यालय के इतिहास के प्रोफ़ेसर पॉल कैनेडी कहते हैं: "यह निष्कर्ष निकालना कठिन है कि आतंकवादी हमलों का ख़तरा समाप्त नहीं होगा। इन हमलों को होने से रोकने में हमें बड़ी सफलता भी नहीं मिली है।" जिन्न बोतल की गर्दन से बाहर निकल आया है और वह प्रतिशोध की भावना लिए हुए है; और कार बम अब हवाई जहाज़ बम बन चुका है" (अल-क़ुद्स पत्रिका, 22.9/2001 के अनुवादित शब्दों में)। पूर्व यहूदी राष्ट्रपति हर्ज़ोग ने 1992 में पोलिश संसद के समक्ष कहा: "इस्लामी कट्टरवाद की महामारी तेज़ी से फैल रही है। यह केवल यहूदी लोगों के लिए ही ख़तरा नहीं है; बल्कि पूरी मानवता के लिए है" (अल-'अरबी पत्रिका, अंक 514)। शिमोन पेरेज़ ने कहा: "कम्युनिज़्म के पतन के बाद कट्टरवाद इस युग का सबसे बड़ा ख़तरा बन गया है" (अल-'अरबी पत्रिका, अंक 514)। अमेरिका के पूर्व विदेश सचिव साइरस वेंस ने कहा: "हमें इन कट्टरपंथियों से निपटने में सावधान और दृढ़ रहना होगा, जिनके कार्यों का अनुमान लगाना असंभव है" (अल-'अरबी पत्रिका, अंक 514)। फ़्रांसीसी सांस्कृतिक विश्वकोश में लिखा है कि मुहम्मद ﷺ: "ईसा-विरोधी, महिलाओं का अपहरणकर्ता, और मानव बुद्धि का सबसे बड़ा शत्रु" हैं।
ये और इन जैसे लोग इस्लाम के प्रति अपनी दुश्मनी खुलकर बयान करते हैं, और उनके बयान इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि वे अपनी पूंजीवादी सभ्यता के साथ इस्लामी सभ्यता के विरुद्ध हिंसक बौद्धिक संघर्ष चला रहे हैं। लेकिन एक दूसरा समूह भी है जो मुसलमानों की आँखों में धूल झोंकने और उन्हें भ्रम में डालने की कोशिश करता है, ताकि उनकी निष्क्रियता बनी रहे और वे परिवर्तन लाने के प्रयास से रुके रहें, जबकि वे इस्लाम और उसके लोगों के प्रति कम शत्रुतापूर्ण नहीं हैं। इसलिए हम पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति क्लिंटन को यह कहते हुए पाते हैं: "मध्य पूर्व में हमारा दुश्मन उग्रवाद है," और उन्होंने सभ्यताओं के टकराव के विचार को ठुकरा दिया। इसी तरह उन्होंने कहा कि वर्तमान संघर्ष का इस्लाम से कोई संबंध नहीं है; यह तो उन उग्रवादी शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष है जो धर्म और राष्ट्रवाद की आड़ में छिपी रहती हैं। उन्होंने आगे कहा: कि यह इस्लामी शिक्षाओं के विपरीत है, और उन्होंने इस बात पर बल दिया कि इस्लाम दुनिया में सहिष्णुता और संयम की एक शक्तिशाली शक्ति है" (अल-'अरबी पत्रिका, अंक 514)। बेल्जियम के विदेश सचिव लुई मिशेल बर्लुस्कोनी के उपरोक्त बयानों पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं: "जब यूरोपीय संघ के एक सदस्य देश का प्रधानमंत्री इस तर्क से बात करता है, तो इसे पूरी तरह से अस्वीकार किया जाता है। यह विचार कि कोई एक सभ्यता दूसरी सभ्यताओं से बेहतर या अधिक उन्नत स्थिति में है, उन यूरोपीय मूल्यों के विरुद्ध माना जाता है जिनमें हम सब विश्वास रखते हैं" (अल-जज़ीरा के उपरोक्त अध्ययन मंडल में)। यहाँ तक कि बुश जूनियर, जिन्होंने खुलेआम 'क्रूसेड' की घोषणा की और उसका ऐलान किया, उन्हें भी वाशिंगटन स्थित इस्लामी केंद्र जाने और इस्लाम को शांति का धर्म बताने से यह नहीं रोक सका। उन्हीं की तरह इस अभियान में उनके साथी, ब्रिटिश प्रधानमंत्री ब्लेयर हैं, जिन्होंने इस्लाम को शांति का धर्म बताया, और इसके प्रमाण के रूप में उन्होंने इस उत्कृष्ट आयत के अर्थ का सहारा लिया:
These and their like explicitly state their enmity to Islam, and their statements are a clear indication that they practice with their Capitalist civilisation violent intellectual struggle against the Islamic civilisation. However, there is another group that attempts to blow ashes in the eyes and delude Muslims, in order to perpetuate their anaesthetisation and make them desist from generating change, while they are not less hostile to Islam and its people. So we find the former American president Clinton say: "Our enemy in the Middle East is extremism, and he rejected the idea of the clash of civilisations. Similarly he said that the current struggle has no relationship with Islam; it is however a struggle against extremist forces that hide with religion and nationalism. He added saying: that it contradicts with Islamic teachings and emphasised that Islam is a powerful force for tolerance and moderation in the world" (Al-'Arabi magazine number 514). Louis Mitchell, Belgian foreign secretary, says in comment upon the above-mentioned statements of Berlusconi: "When a prime minister of a member state of the European Union speaks with this logic, this is completely rejected. The view that any civilisation is better or of more advanced position than other civilisations is considered as contradicting European values in which we all believe" (above mentioned study circle of Al-Jazeera). Even Bush Jr. who declared openly the 'Crusade' and announced it, this did not prevent him from visiting the Islamic Centre in Washington and describing Islam as a deen of peace. Similar to him is his partner in this campaign, the British Prime Minister Blair, who described Islam as being a deen of peace, and he used as evidence the meaning of the noble ayah:
"जो कोई किसी प्राणी की हत्या करे, उसके बदले के सिवा या धरती में फ़साद फैलाने के सिवा, तो मानो उसने सम्पूर्ण मानवजाति की हत्या कर दी" [TMQ अल-माइदा: 32]। यह अनिवार्य है कि मुसलमान इस तरह के लोगों के भ्रामक शब्दों से धोखा न खाएँ, क्योंकि उनके कर्म उनकी गहरी जड़ें जमाए हुई भावनाओं को प्रकट करते हैं, न कि उनकी झूठी बातों को, और झूठी बातें किसी मुसलमान को धोखा नहीं दे सकतीं।
"Whoever kills a soul for other than a soul or (to spread) mischief in the earth, it is as if he killed all of mankind" [TMQ Al-Mai’dah: 32]. It is imperative that Muslims are not beguiled by deceptive words said by the like of these, for their deeds reveal their deep rooted feelings, not their false words, which do not fool a Muslim.
ये लोग इस्लाम को उसकी वास्तविकता में जानते हैं, बल्कि कुछ मुसलमानों से भी बेहतर। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन, जिनके कथनों का हम पहले ही उल्लेख कर चुके हैं: "उनके आदर्श, जिन्हें वहन करना संभव नहीं…कट्टरवाद उसे पीछे की ओर मोड़ देता है…इस्लामवादी वैचारिक शत्रु हैं", उनकी पुस्तक 'The Favourable Opportunity' में हम उन्हें यह कहते हुए पाते हैं: "इस्लाम केवल एक धर्म नहीं है; बल्कि वह एक महान सभ्यता की नींव है।" तो वे इस्लाम को ईसाइयत से अलग करते हैं, और उसी पुस्तक में कट्टरपंथियों की चर्चा करते हुए वे कहते हैं: "वे अतीत को पुनर्जीवित करके पिछली इस्लामी सभ्यता को लौटाने पर दृढ़ हैं, और उनका लक्ष्य इस्लामी शरीयत को लागू करना है और यह घोषित करना है कि इस्लाम एक दीन और एक राज्य है।" इसके अलावा वे कहते हैं: "फिर भी, हमारी सभ्यता उनकी सभ्यता से अधिक उन्नत नहीं है। इस्लामी जगत ने साम्यवाद से पश्चिमी जगत की तुलना में अधिक शक्ति से लड़ाई लड़ी, और भौतिक वस्तुओं के प्रति उनका त्याग तथा पश्चिमी दुनिया में फैली नैतिक अराजकता उनके लिए श्रेय है, न कि उनके विरुद्ध।" जैसा कि आप देखते हैं, ऐसे शब्दों में वे ईमानदार प्रतीत होते हैं; फिर भी इन बातों ने उन्हें यह घोषणा करने से नहीं रोका कि हम वैचारिक शत्रु हैं। इन्होंने उन्हें मुसलमानों के विरुद्ध षड्यंत्र रचने और उनके विरुद्ध यहूदियों की सहायता करने से भी नहीं रोका। इसलिए वे अपनी पुस्तक 'Victory without War' में कहते हैं: "इज़राइल के अस्तित्व के प्रति हमारी प्रतिबद्धता गहरी है। हम आधिकारिक सहयोगी नहीं हैं। बल्कि जो हमें एक-दूसरे से जोड़ता है वह किसी भी कागज़ के टुकड़े से बढ़कर है। यह एक नैतिक प्रतिबद्धता है, ऐसी प्रतिबद्धता जिसे अतीत में कोई राष्ट्रपति कभी नहीं छोड़ा; और भविष्य का हर राष्ट्रपति इसे ईमानदारी से निभाएगा। अमेरिका कभी भी इज़राइल के उन शत्रुओं को, जिन्होंने उसे भारी क्षति पहुँचाने की शपथ ली है, अपना लक्ष्य पूरा करने और उसे नष्ट करने की अनुमति नहीं देगा।" वे अपनी पुस्तक 'The Favourable Opportunity' में यह भी कहते हैं: "इज़राइल और दक्षिण कोरिया जैसी खतरे में पड़ी लोकतांत्रिक सरकारों की रक्षा के लिए, आवश्यकता पड़ने पर हम सैन्य शक्ति का प्रयोग करने के लिए तैयार हैं।" उसने यह भी कहा: "कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति या कांग्रेस कभी भी इज़राइल के विनाश की अनुमति नहीं दे सकती।" ये लोग इस्लाम और उसकी सभ्यता की वास्तविकता को समझते हैं; फिर भी वे अपने कुफ़्र, दुश्मनी और चालों पर अड़े रहते हैं। इसमें कोई अचरज नहीं। मुसलमान पश्चिमी सभ्यता को उसके कुछ बेटों से भी अधिक समझ सकता है, फिर भी वह अपने दीन और अपनी सभ्यता के प्रति निष्ठावान रहता है, जैसे इसके विपरीत भी हो सकता है। इसलिए ज़रूरी है कि मुसलमान इस प्रकार के बयानों से धोखा न खाएँ।
These people know Islam in its reality, rather even better than some Muslims. Nixon, the former American president, whose sayings we have already mentioned his sayings: "Their ideals which cannot be afforded…Fundamentalism turns it backwards…Islamists are ideological enemies", we find him say in his book 'The Favourable Opportunity': "Islam is not merely a religion; rather it is a basis for a great civilisation." So he distinguishes between Islam from Christianity, and he says in the same book in his discussion about fundamentalists: "They are determined to return the previous Islamic civilisation through reviving the past, and they aim to implement the Islamic Shari'ah and announce that Islam is a deen and a State." Furthermore he says: "However, our civilisation is not more advanced than their civilisation. The Islamic world fought communism with more strength than the Western world fought it, and their rejection of material things and the widespread immoral excesses in the Western world is a credit for them and not against them." Just as you see that he is sincere in such words; they, however, did not prevent him from announcing that we are ideological enemies. They also did not prevent him from conspiring against Muslims and assisting Jews against them. So he says in his book 'Victory without War': "Our commitment to the survival of Israel is a profound commitment. We are not official allies. Rather what binds us together is something greater than any paper scraps. It is a moral commitment, a commitment that no president in the past ever abandoned; and every future president will fulfil it with sincerity. America will never permit Israel's enemies who swore to inflict grievous damage upon her to realise their goal in destroying her." He also says in his book 'The Favourable Opportunity': "In order to protect the threatened democratic governments such as Israel and South Korea, we are prepared to use military power if necessary." He also says: "No American president or Congress will ever be able to permit the destruction of Israel." These people understand the reality of Islam and its civilisation; however they insist upon their kufr, enmity and tricks. This is not strange. The Muslim might understand the Western civilisation more than some of its sons, yet still he remains sincere to his deen and civilisation, just as the contrary can occur. So it is imperative that Muslims are not fooled by these types of statements.
इस्लाम और कुफ़्र के बीच संघर्ष में नुबुव्वत के तरीक़े पर चलने वाली राशिदा ख़िलाफ़त का वजूद बुनियादी आधार है। संघर्ष को, जब इस्लाम लागू न हो और मुसलमानों की हालत कमज़ोरी, अपमान, पिछड़ेपन और बिखराव में दयनीय हो, केवल विभिन्न प्रकार के मीडिया में दावत देने, किताबें लिखने और व्यक्तिगत संपर्कों तक सीमित कर देना नासमझी और समझ की कमी है। जब ख़िलाफ़त (राज्य) अस्तित्व में आएगी, तो उसमें न्याय, सम्मान, ख़ुशहाली, मानवता और हर प्रकार की भलाई प्रकट होगी, और दूर-नज़दीक के लोग, मुसलमान और काफ़िर, सब उसे महसूस करेंगे। उसका वजूद लाखों किताबों और संपर्कों, तथा हज़ारों प्रकार के मीडिया की जगह ले लेगा। और अगर इसके साथ वह सब भी जुड़ जाए जो पहले बताया गया, तो तुम लोगों को अल्लाह के दीन में झुंड के झुंड दाख़िल होते देखोगे।
The existence of the rightly guided Khilafah upon the way of Prophethood is the fundamental cornerstone in the clash between Islam and kufr. It is naivety and poor understanding to confine the struggle with its various forms to mere da'wah in the various types of media, writing books and individual contacts, at the time wherein Islam is not implemented and the situation of Muslims is deplorable in weakness, disgrace, backwardness and division. Once the State existed, then justice, dignity, happiness, humanity and every type of goodness will be manifested in it; and the near and distant, Muslim and kafir will notice that. Its existence will replace the millions of books and contacts, and thousands of types of media. If what was mentioned before is added to its existence, you will see people entering the deen of Allah in crowds.