"…और जिससे भी तुम शत्रुता रखोगे, उसे कभी सम्मान नहीं मिलेगा।" की व्याख्या
The Explanation Of:“…and Whoever You Show Enmity Towards Will Never Be Honored.”
जो कोई अल्लाह का दुश्मन हो, उसे कभी इज़्ज़त नहीं मिलेगी। इसके विपरीत, वह अपमान, पछतावे और नाकामी का स्वाद चखेगा। अल्लाह (سبحانه وتعالى) फ़रमाता है: {जो कोई अल्लाह, उसके फ़रिश्तों, उसके रसूलों, जिब्रील और मीकाल का दुश्मन हो, तो अल्लाह भी काफ़िरों का दुश्मन है।} [सूरह अल-बक़रह, 2:98] हर काफ़िर रुसवाई और परेशानी में है। इसी कारण, अगर मुसलमानों के पास वाक़ई इस्लाम की इज़्ज़त, दीन की गरिमा और अल्लाह की दोस्ती व वफ़ादारी होती, तो काफ़िर आज वैसी हालत में न होते जिसमें हम खुद को उनके मातहत अपमानित पाते हैं। हम छुपकर उन्हें इज़्ज़त और सम्मान की नज़र से देखते हैं, जबकि अपने बीच हम ख़ुद को रुसवाई और शर्म के साथ देखते हैं। इसकी वजह यह है कि आज ज़्यादातर मुसलमान, अफ़सोस के साथ, अपने दीन पर सच्चाई से क़ायम नहीं हैं, न ही उसे सही तरीक़े से सीखने की ईमानदार कोशिश करते हैं। वे सिर्फ़ इस दुनिया की भौतिक चीज़ों और उसकी रौनक़ पर भरोसा करते हैं। इसी वजह से हम ऐसी रुसवाई में डाले गए हैं कि काफ़िर आपस में इज़्ज़तदार समझे जाते हैं। फिर भी, हम मानते हैं कि काफ़िर अल्लाह के दुश्मन हैं, और उसने अपने सभी दुश्मनों पर रुसवाई और शर्म लिख दी है, जैसा कि वह फ़रमाता है: {बेशक, जो लोग अल्लाह और उसके रसूल की मुख़ालफ़त करते हैं, वही सबसे ज़्यादा ज़लील होंगे।} [सूरह अल-मुजादलह, 58:20] यह एक पक्की बात है जो ज़रूर होकर रहेगी। फिर अल्लाह (سبحانه وتعالى) फ़रमाता है: {अल्लाह ने लिख दिया है कि मैं और मेरे रसूल ज़रूर ग़ालिब रहेंगे। बेशक, अल्लाह ताक़तवर और ज़बरदस्त है।} [सूरह अल-मुजादलह, 58:21] तो जो भी अल्लाह (سبحانه وتعالى) की मुख़ालफ़त करेगा, आख़िरकार ज़लील होगा, और उसे कभी असली इज़्ज़त नहीं मिलेगी, सिवाय उस इज़्ज़त के जो बस किसी के ख़याल में हो, जैसी इज़्ज़त काफ़िरों के पास है। और जो इंसान यह मानता है कि असली इज़्ज़त और गरिमा अल्लाह (سبحانه وتعالى) की नज़दीकी और उससे वफ़ादारी तथा उसके दीन पर डटे रहने के बिना हासिल नहीं हो सकती, वह अल्लाह पर ईमान न रखने वालों को अल्लाह की मख़लूक़ में सबसे ज़्यादा रुसवा लोगों के सिवा कुछ नहीं समझता।13