वास्तविक समस्या
The Reality Of The Problem
वास्तविकता में समस्या यह है कि हर देश में आम लोगों की सोच, जिनमें वैचारिक राजनेता और चिंतक भी शामिल हैं, स्वाभाविक रूप से धीमी हो गई है। इसका उपाय यह है कि इस समस्या को उसकी जड़ से ख़त्म किया जाए, यानी उस धीमी सोच को ख़त्म किया जाए जो एक आदत बन गई, यहाँ तक कि तत्कालिकता (स्पॉन्टेनिटी) खो गई। इस प्रकार, समस्या धीमी सोच है और परिणामस्वरूप तत्कालिकता का (अभाव)। धीमी सोच ही समस्या है। समस्या अपनी वास्तविकता में इसलिए है कि यह आदत और स्वभाव बन गई। कोई भी प्रश्न, भले ही वह स्वचालित (ऑटोमैटिक) क्यों न हो, दार्शनिक बना दिया जाता है, और लोगों में उस पर सोच-विचार करना आम हो गया। समस्या सोचना नहीं है, क्योंकि सोचना स्वाभाविक और प्रशंसनीय, बल्कि अनिवार्य भी है; क्योंकि किसी मुद्दे पर सोचने से उसके छिपे पहलू सामने आते हैं और उसके रहस्य खुलते हैं, और व्यक्ति सत्य से अवगत होता है। इस प्रकार, सोचना अपने आप में लाभदायक और उपयोगी है। लेकिन इस सोच की धीमी गति, या यह कि इसे हर प्रश्न में प्रयोग किया जाता है, हर प्रश्न को दार्शनिक बना देती है और धीरे-धीरे आगे बढ़ती है, यही वास्तविकता में समस्या है। धीमी सोच लोगों की आधारशिला बन गई, यहाँ तक कि वे तत्कालिकता खो बैठे, इसलिए जब वे इसका प्रयोग करते हैं तो केवल ख़तरे के क्षण में। तत्कालिकता केवल ख़तरे के क्षण के लिए नहीं है। यह ज़रूरी नहीं कि तत्कालिकता के आधार पर कोई कदम उठाया जाए। तत्कालिकता बल्कि ख़तरे के क्षण में और अन्य समयों में भी आती है; हो सकता है कि उसके लिए कदम उठाना आवश्यक हो, या न हो। इसलिए तत्कालिकता स्थायी होनी चाहिए और हर बात में होनी चाहिए। अतः यह सही नहीं कि यह केवल ख़तरे के क्षण में मौजूद रहे; इसे सभी परिस्थितियों में मौजूद होना चाहिए। यह हर मामले में कदम उठाने की माँग नहीं करती, क्योंकि उनमें से कुछ में कदम उठाने की ज़रूरत होती है और कुछ में नहीं।