2 खिलाफत एक फ़र्ज़ है
2 The Khilafah Is An Obligation
"नबी बनी इसराईल पर शासन करते थे; जब भी कोई नबी वफ़ात पाता, उसकी जगह दूसरा नबी आ जाता, लेकिन मेरे बाद कोई नबी नहीं होगा। ख़ुलफ़ा होंगे और वे बहुत होंगे। सहाबा ने पूछा: फिर आप हमें क्या आदेश देते हैं? उन्होंने फ़रमाया: उनमें से एक के बाद एक की बै'अत पूरी करो और उनका हक़ अदा करो। निश्चित रूप से अल्लाह उनसे उस चीज़ के बारे में पूछेगा जो उसने उन्हें सौंपी थी।" ﷺ
“The Prophets ruled over the children of Israel, whenever a Prophet died another Prophet succeeded him, but there will be no Prophet after me. There will be Khulafaa’ and they will number many. They asked: What then do you order us? He said: Fulfill the Bay’ah to them one after the other and give them their due. Surely Allah will ask them about what He entrusted them with.”
ख़िलाफ़त की पुनः स्थापना सभी मुसलमानों पर एक फ़र्ज़ (अनिवार्य दायित्व) है
The Re-establishment of the Khilafah is an obligation upon all Muslims
ख़िलाफ़त समस्त विश्व के मुसलमानों की एक साझा नेतृत्व-व्यवस्था है। इसका कार्य इस्लामी शरीअत के क़ानूनों को स्थापित करना और इस्लाम की दा'वा (आह्वान) को दुनिया तक पहुँचाना है। ख़िलाफ़त को इमामत के नाम से भी जाना जाता है; दोनों शब्दों का अर्थ एक ही है। कई सहीह अहादीस में ये दोनों शब्द एक ही अर्थ में आए हैं, और शरीअत के किसी भी स्रोत, अर्थात् क़ुरआन या नबी ﷺ की सुन्नत, में इन दोनों शब्दों के अर्थ में कभी कोई अंतर नहीं रहा, क्योंकि शरीअत के स्रोत केवल ये दो ही हैं। ख़िलाफ़त या इमामत के शब्द पर अड़े रहना अनिवार्य नहीं है, बल्कि अनिवार्य उसके अर्थ पर अड़े रहना है।
The Khilafah is a common leadership for all the Muslims in the world. Its role is to establish the laws of the Islamic Shari’ah and to carry the Da’awah of Islam to the world. The Khilafah is also known as the Imamah, both terms have the same meaning. Several Sahih Ahadith mention them with the same meaning, neither of the two terms has ever differed in meaning in any Shari’ah text i.e. the Qur’an or the Sunnah of the Prophet (saw), these being the only Shari’ah texts. It is not compulsory to hold to the term of Khilafah or Imamah, but rather it is compulsory to hold to the meaning of the term.
ख़लीफ़ा की स्थापना दुनिया के सभी मुसलमानों पर एक फ़र्ज़ (अनिवार्य कर्तव्य) है। इस फ़र्ज़ को अदा करना, मुसलमानों पर अल्लाह (سبحانه وتعالى) द्वारा निर्धारित किसी भी दूसरे फ़र्ज़ की तरह, एक तत्काल और अनिवार्य दायित्व है, जिसमें न कोई विकल्प हो सकता है और न ही ढिलाई। इस फ़र्ज़ को अदा करने में लापरवाही सबसे बड़े गुनाहों में से एक है, जिसके लिए अल्लाह (سبحانه وتعالى) सख़्त सज़ा देता है।
The establishment of a Khaleefah is an obligation upon all Muslims in the world. Performing this duty, like any of the duties prescribed by Allah (swt) upon the Muslims, is an urgent obligation in which there can be no choice or complacency. Negligence in performing this duty is one of the greatest sins, for which Allah (swt) punishes severely.
खलीफ़ा की नियुक्ति सभी मुसलमानों पर अनिवार्य है, इसका प्रमाण सुन्नत और सहाबा का इज्माअ (सर्वसम्मति) में मिलता है। सुन्नत के संबंध में, नाफ़िअ से रिवायत है कि उन्होंने कहा: "उमर ने मुझसे कहा कि उन्होंने नबी ﷺ को यह फ़रमाते सुना: 'जो कोई अल्लाह (SWT) की फ़रमाँबरदारी से अपना हाथ खींच ले, वह क़यामत के दिन इस हाल में अल्लाह (SWT) से मिलेगा कि उसके पास कोई हुज्जत न होगी, और जो इस हाल में मरे कि उसकी गर्दन पर बैअत (खलीफ़ा के प्रति निष्ठा की प्रतिज्ञा) न हो, तो वह जाहिलियत की मौत मरा।'" अतः नबी ﷺ ने हर मुसलमान पर अपनी गर्दन पर बैअत होना अनिवार्य ठहराया, और जो बिना बैअत के मरे उसे जाहिलियत की मौत मरने वाला बताया। बैअत खलीफ़ा के सिवा किसी और के लिए नहीं हो सकती, और नबी ﷺ ने हर मुसलमान पर खलीफ़ा की बैअत अपनी गर्दन पर रखना अनिवार्य किया। फिर भी आपने हर मुसलमान पर खलीफ़ा को बैअत देना अनिवार्य नहीं किया। वाजिब यह है कि हर योग्य मुसलमान की गर्दन पर बैअत मौजूद हो, यानी एक ऐसा खलीफ़ा मौजूद हो जो इसी के अनुसार हर मुसलमान की गर्दन पर बैअत का हक़दार हो। अतः खलीफ़ा का अस्तित्व ही हर मुसलमान की गर्दन पर बैअत डालता है, चाहे मुसलमान ने उसे व्यक्तिगत रूप से बैअत दी हो या नहीं।