14 संविधान और विधान
14 Constitution and Canon
"कानून" (Canon) एक विदेशी तकनीकी शब्द है, जिसका अर्थ है शासक द्वारा लोगों के लिए जारी किया गया वह आदेश जिसे उन्हें लागू करना होता है। इसे इस प्रकार परिभाषित किया गया है: "सिद्धांतों का वह समूह जिन्हें शासक लोगों को उनके आपसी संबंधों में लागू करने के लिए बाध्य करता है।" हर सरकार का मूल कानून "संविधान" (Constitution) कहलाता है; जबकि वह कानून जो संविधान द्वारा निर्धारित व्यवस्था से निकलता है, उसे "क़ानून" (canon) कहा जाता है। संविधान की परिभाषा इस प्रकार दी गई है: वह क़ानून जो राज्य के स्वरूप और उसकी शासन व्यवस्था की रूपरेखा तय करता है, और उसमें निहित हर सत्ता की सीमाएँ और कार्य स्पष्ट करता है; या वह क़ानून जो सार्वजनिक सत्ता, यानी सरकार, को व्यवस्थित करता है, उसका अपनी प्रजा से संबंध परिभाषित करता है, और राज्य के प्रजा के प्रति अधिकार और कर्तव्य तथा प्रजा के राज्य के प्रति अधिकार और कर्तव्य निर्धारित करता है। संविधानों की उत्पत्ति अलग-अलग तरीकों से होती है। कुछ संविधान क़ानून के रूप में जारी किए गए हैं, कुछ रीति-रिवाजों और परंपराओं से विकसित हुए हैं, जैसे ब्रिटिश संविधान, जबकि कुछ को उस समय सत्ता रखने वाली राष्ट्रीय सभा की एक समिति ने तैयार किया, जिसने उसे पारित किया, उसमें संशोधन की प्रक्रिया तय की और फिर स्वयं को भंग कर दिया ताकि संविधान द्वारा स्थापित सत्ता उसकी जगह ले सके, जैसा कि अमेरिका और फ्रांस में हुआ। संविधान और क़ानून दो स्रोतों से लिए जाते हैं। पहला वह स्रोत है जहाँ से वे सीधे उत्पन्न होते हैं, जैसे रीति-रिवाज, धर्म, न्यायविदों की राय, अदालती नज़ीरें और न्याय तथा इंसाफ़ के सिद्धांत। इसे विधायी स्रोत कहा जाता है। इस प्रकार के संविधान के उदाहरण पश्चिमी देशों के कुछ राज्य हैं, जैसे ब्रिटेन और अमेरिका। दूसरा ऐतिहासिक स्रोत है, यानी वह स्रोत जिससे संविधान या क़ानून उभरता या लिया जाता है, जैसे फ़्रांसीसी संविधान और इस्लामी दुनिया के कुछ राज्यों के संविधान, जैसे तुर्की, मिस्र, इराक़ और सीरिया।
Canon is a foreign technical term which means the decree issued by the ruler for people to enact. It has been defined as "the group of principles which the ruler obliges the people to enact in their relationships". The basic law for every government is called a constitution; whereas law which emanates from the system decreed by the constitution, is called a canon. The term constitution has been defined as the canon which outlines the shape of the state and its ruling system, and explains the limits and functions of every authority vested in it, or the canon which organises public authority, i.e. the government, defines its relationship with its subjects, and assigns both the State's rights and duties towards the subjects and the subject's duties and rights towards the State. Constitutions have different origins. Some have been issued in the form of a canon, and some have arisen through customs and norms, such as the British constitution, while others have been drafted by a committee of a national assembly - vested with the authority at that time - which passed the constitution, defined the procedure for revising it and then dissolved itself so as to be replaced by the authority established by the constitution, as happened in America and France. Constitutions and canons are taken from two sources. The first being the source from which they directly originate, such as norms, religion, the opinions of jurists, court precedents and the principles of justice and equity. This is known as the legislative source. Examples of this type of constitution are some of the Western states like Britain and America. The second is a historical source, i.e. the source from which the constitution or canon emerges or is taken, like the French Constitution and the constitutions of some of the states in the Islamic world, like Turkey, Egypt, Iraq and Syria.
यह संविधान (constitution) और कानून (canon) शब्दों की केवल एक संक्षिप्त परिभाषा है, जिसका सार यह है कि राज्य कुछ नियमों को या तो विधायी स्रोतों से या ऐतिहासिक स्रोतों से लेता है, उन्हें अपनाता और लागू करता है; इसके बाद राज्य द्वारा अपनाए गए ये नियम, यदि वे सामान्य हों तो संविधान बन जाते हैं, और यदि वे विशिष्ट हों तो कानून (canons) बन जाते हैं।
This is but a brief definition of the terms constitution and canon, which in sum means, that the State takes certain rules from either legislative or historical sources which it adopts and enacts, such that thereafter the rules adopted by the State become a constitution, if they are general, or canons if they are specific.
मुसलमानों के सामने अब यह सवाल है कि क्या इन शब्दों का प्रयोग जायज़ है? इस सवाल का जवाब यह है कि अगर विदेशी शब्दों में ऐसे अर्थ या तार्किक निहितार्थ हों जो मुसलमानों की परिभाषाओं (इस्तिलाहात) के विरुद्ध हों, तो उनका प्रयोग हराम है, जैसे "सामाजिक न्याय" (social justice) शब्द, जो एक ऐसी विशेष व्यवस्था की ओर संकेत करता है जो गरीबों को शिक्षा और चिकित्सा की गारंटी देने तथा कर्मचारियों और मज़दूरों के अधिकारों की गारंटी देने के रूप में प्रकट होती है। यह निहितार्थ इस्लाम में न्याय (अदल) के परिभाषित अर्थ से टकराता है, क्योंकि इस्लाम में अदल का मतलब ज़ुल्म (दुल्म) का विपरीत है। जहाँ तक शिक्षा और चिकित्सा की सुरक्षा की बात है, तो यह अमीर और गरीब दोनों का अधिकार है, और कमज़ोरों और ज़रूरतमंदों के अधिकारों की रक्षा उन सभी लोगों का अधिकार है जो इस्लामी राज्य की नागरिकता रखते हैं, चाहे वे कर्मचारी हों, मज़दूर हों या किसान आदि। लेकिन अगर शब्द का अर्थ वही है जो मुसलमानों के यहाँ पहले से है, तो उस शब्द का प्रयोग जायज़ है, जैसे "टैक्स" (tax) शब्द, जिसका अर्थ है राज्य द्वारा अपने मामलों के प्रबंधन के लिए लोगों से इकट्ठा किया गया धन। मुसलमानों के यहाँ भी राज्य द्वारा अपने मामलों के प्रबंधन के लिए इकट्ठा किया गया धन होता है, इसलिए "टैक्स" शब्द का प्रयोग सही है। "दस्तूर" (constitution) और "क़ानून" (canon) शब्दों का अर्थ है कि राज्य कुछ नियमों को अपनाता है, उन्हें लोगों के सामने घोषित करता है, उन्हें उन पर अमल करने के लिए बाध्य करता है और उन्हीं के आधार पर उन पर शासन करता है। यह अर्थ इस्लाम से मेल खाता है। इसके अनुसार, हमें "दस्तूर" और "क़ानून" शब्दों के प्रयोग से रोकने वाली कोई चीज़ नहीं मिलती, जिसका अर्थ है वे नियम जिन्हें ख़लीफ़ा अहकाम शरीआ में से अपनाता है। फिर भी, इस्लामी दस्तूर और क़वानीन तथा दूसरे देशों के दस्तूर और क़वानीन के बीच अंतर है। दूसरे दस्तूर और क़वानीन का स्रोत उनकी परंपराएँ और उनकी अदालतों के फ़ैसले आदि हैं। और इसका स्रोत एक संस्थागत समिति है जो संविधान तय करती है, और लोगों द्वारा चुनी गई परिषदें जो क़ानून (कानून) लागू करती हैं, क्योंकि वे लोगों को सत्ता और संप्रभुता का स्रोत मानते हैं। जहाँ तक इस्लामी संविधान और क़ानूनों की बात है, उनका स्रोत केवल क़ुरआन और सुन्नत है, और उनका मूल ढाँचा मुजतहिदीन का इज्तिहाद है, जिससे ख़लीफ़ा कुछ नियम अपनाता है, उन्हें लागू करता है और लोगों को उनके अनुसार अमल करने का पाबंद बनाता है। यह इसलिए है क्योंकि संप्रभुता केवल शरीअत की है, और इज्तिहाद हर मुसलमान का हक़ है और उन पर फ़र्ज़-ए-किफ़ाया है कि वे शरई अहकाम निकालें। शरई अहकाम को अपनाने का अधिकार केवल ख़लीफ़ा को है।
The question that now faces the Muslims is whether or not it is permissible to use these terms? The answer to this question is that if foreign terms contain meanings or logical connotations that contradict the terminology of Muslims, they are prohibited for use: such as the term "social justice", which implies a specific system that is manifested in the form of guaranteeing education, medical care for the poor and guaranteeing the rights of employees and workers. This connotation contradicts the Muslims terminological meaning for justice, because in Islam justice ('adl) means the opposite of injustice (DHulm). As for securing of education and medical care it is a right for rich and poor, and protecting the rights of the weak and needy is a right secured to all those who hold citizenship of the Islamic State, whether they are employees, labourers or farmers etc. However, if the meaning of the terminology is consistent with what the Muslims have then it is permissible to use that term, such as the term tax, which means the funds collected from the people for the management of the state. The Muslims do have funds collected by the State for the management of their affairs and, thus, it is correct to use the term tax. The terms constitution and canon mean that the state adopts certain rules, announces them to the people and obliges them to act according to them and it governs them on their basis. This meaning is consistent with Islam. Accordingly, we do not find anything to prevent the use of the terms constitution and canons, which means the rules adopted by the Khaleefah from the AHkam shar’aiah. However, there is a difference between the Islamic constitution and canons, on the one hand, and other constitutions and canons, on the other. The source of the other constitutions and canons is the traditions and verdicts of their courts etc. and the origin is an institutional committee which lays down the constitution, and councils elected by the people to enact canons, for they consider the people to be the source of authority and sovereignty. As for the Islamic constitution and canons, their source is the Qur'an and Sunnah only, and their origin is the ijtihad of the mujtahideen from which the Khaleefah adopts certain rules, where he enacts them and obliges the people to act according to them. This is because sovereignty is for the shar’aiah and ijtihad is a right for all Muslims and a fard kifayah upon them to deduce AHkam shar’aiah. Only the Khaleefah has the right to adopt the AHkam shar’aiah.
इस विषय के संबंध में कि "संविधान" और "कानून-ए-मूलिया" (canon) जैसे शब्दों का प्रयोग जायज़ है या नहीं: जहाँ तक नियम अपनाने की आवश्यकता का प्रश्न है, अबू बक्र (रज़ि॰) के समय से लेकर अंतिम ख़लीफ़ा के समय तक मुसलमानों ने यह आवश्यक समझा कि कुछ नियम अपनाए जाएँ, जिनके अनुसार मुसलमानों को कार्य करने का आदेश दिया गया है। यह अपनाना विशेष नियमों के लिए था, न कि उन सभी आदेशों के व्यापक रूप से अपनाने के लिए जिनके अनुसार राज्य शासन करता था। राज्य ने केवल कुछ युगों में व्यापक रूप से अपनाया, अर्थात् जब अय्यूबियों ने शाफ़िई मज़हब अपनाया और जब उस्मानी राज्य ने हनफ़ी मज़हब अपनाया।
This is with respect to the permissibility of using the terms constitution and canon. As for the necessity of adopting rules, the Muslims, from the time of Abu Bakr (ra) up to the time of the last Khaleefah, have seen the necessity of adopting rules according to which the Muslims have been commanded to act. This adoption was for specific rules and not a comprehensive adoption of all the decrees that the state ruled with. The State only adopted comprehensively in some eras, namely, when the Ayubites adopted Ash-Shafi'i madhab and when the Uthtmani State adopted Al- Hanafi madhab.
प्रश्न यह उठता है कि क्या मुसलमानों के हित में है कि वे एक व्यापक संविधान और सामान्य नियम (कानून) बनाएँ? इसका उत्तर यह है कि सभी नियमों के लिए एक व्यापक संविधान और सामान्य कानून की मौजूदगी इज्तिहाद और रचनात्मकता में रुकावट डालती है। इसी कारण सहाबा के समय के ख़लीफ़ा, ताबिईन और ताबिउत-ताबिईन ने सभी नियमों को अपनाने से परहेज़ किया। उन्होंने अपनाने को केवल उन्हीं विशेष नियमों तक सीमित रखा जहाँ शासन, विधान और प्रशासन की एकता बनाए रखने के लिए ऐसा करना आवश्यक था। अतः रचनात्मकता और इज्तिहाद को बनाए रखने के लिए राज्य के पास ऐसा संविधान होना बेहतर है जिसमें सभी नियम न हों, बल्कि ऐसे सामान्य नियम हों जो राज्य का स्वरूप परिभाषित करें और उसकी एकता की निरंतरता सुनिश्चित करें, और इज्तिहाद व निष्कर्ष निकालने का काम शासकों और न्यायाधीशों पर छोड़ दें। यह स्थिति तब है जब इज्तिहाद संभव हो और लोग मुज्तहिद हों, जैसा कि सहाबा, ताबिईन और ताबिउत-ताबिईन के समय में था। लेकिन यदि सभी लोग मुक़ल्लिद हों और मुज्तहिद दुर्लभ हों, तो राज्य के लिए ऐसे नियम अपनाना अनिवार्य हो जाता है जिनके द्वारा राज्य, अर्थात् ख़लीफ़ा, वुलात और न्यायाधीश, लोगों पर शासन करें। ऐसा इसलिए, क्योंकि अन्यथा अल्लाह (swt) के उतारे हुए के अनुसार शासन करना आसान न रहेगा और शासक व न्यायाधीश मतभेद और परस्पर विरोधी तक़लीद से पीड़ित होंगे। फिर भी, अपनाने से पहले विषय-वस्तु और दलील का अध्ययन होना चाहिए। वुलात और न्यायाधीशों को अपने-अपने ज्ञान से शासन करने देने से एक ही राज्य में, यहाँ तक कि एक ही प्रांत में, भिन्न और परस्पर विरोधी नियम पैदा होंगे, और यह उन्हें अल्लाह (swt) के उतारे हुए के सिवा अन्य के अनुसार फ़ैसला करने तक भी ले जा सकता है। इसलिए, चूँकि आजकल इस्लाम की अज्ञानता फैली हुई है, इस्लामी राज्य के लिए यह अनिवार्य है कि वह लेन-देन और दंड से संबंधित कुछ नियम अपनाए, जबकि 'अक़ीदah और 'इबादात में अपनाने को छोड़ दिया जाए। यह अपनाना सभी नियमों पर लागू होना चाहिए, ताकि राज्य के मामले व्यवस्थित हों और मुसलमानों के सभी कार्य अल्लाह (سبحانه وتعالى) के नियमों के अनुसार संचालित हों। जब राज्य नियमों को अपनाता है और संविधान तथा विधि-संहिताएँ स्थापित करता है, तो उसे स्वयं को केवल अहकाम शरईया तक सीमित रखना होगा। उसे अहकाम शरईया के अतिरिक्त किसी और चीज़ को न अपनाना चाहिए, न उसका अध्ययन करना चाहिए, चाहे वह इस्लाम से मेल खाती हो या नहीं। उदाहरण के लिए, वह संपत्ति के राष्ट्रीयकरण को नहीं अपनाएगा। इसके बजाय, उसे सार्वजनिक संपत्ति का हुक्म (नियम) निर्धारित करना होगा। फ़िक्रah (विचारधारा) और तरीक़ah (पद्धति) से जुड़े हर मामले में राज्य को अहकाम शरईया द्वारा स्वयं को सीमित रखना होगा। लेकिन जहाँ तक उन विधि-संहिताओं और व्यवस्थाओं का सवाल है जो फ़िक्रah और तरीक़ah से संबंधित नहीं हैं, और इसलिए जीवन के किसी निश्चित दृष्टिकोण को व्यक्त नहीं करतीं, जैसे प्रशासनिक संहिताएँ और विभागीय ढाँचे आदि, उन्हें साधन और शैली माना जाता है, जैसे विज्ञान, उद्योग और तकनीक, जिन्हें राज्य अपने मामलों के प्रबंधन के लिए अपना सकता है, जैसा कि उमर इब्न अल-ख़त्ताब (रज़ि.) ने किया था, जब उन्होंने फ़ारसियों से लिए गए सैन्य रजिस्टर (दीवान) स्थापित किए थे। ये प्रशासनिक और तकनीकी मामले न तो संविधान का हिस्सा हैं और न ही अहकाम शरईया का, और इसलिए संविधान में शामिल नहीं होते। अतः इस्लामी राज्य का कर्तव्य है कि वह ध्यान रखे कि उसका संविधान अहकाम शरईया हो, अर्थात उसका संविधान और उसकी विधि-संहिता इस्लामी हो। जब वह कोई भी नियम अपनाता है, तो उसे दलील शरʻī की शक्ति के आधार पर, विषय की सही समझ के साथ अपनाना होगा। इसलिए सबसे पहले उसे समस्या को समझने के लिए उसका अध्ययन करना होगा, क्योंकि समस्या को समझना अनिवार्य है। उसे फिर इस समस्या से संबंधित हुक्म शरई को समझना होगा। फिर उसे हुक्म शरई के दलील का अध्ययन करना होगा। राज्य तब इस नियम को दलील की शक्ति के आधार पर अपनाता है, इस शर्त पर कि ये अहकाम शरईया या तो मुज्तहिदों में से किसी एक की राय से अपनाए जाएँ - दलील को देखने और उसकी मज़बूती को सुनिश्चित करने के बाद - या फिर इज्तिहाद शरई के ज़रिए, यहाँ तक कि एक ही मसले में भी, कुरआन और सुन्नत, इज्माअ अस-सहाबा, या क़ियास से। इस तरह, उदाहरण के लिए, यदि राज्य माल के बीमे (इंश्योरेंस) को हराम करना चाहता है, तो उसे पहले माल के बीमे की प्रकृति को समझना होगा। उसे कब्ज़े (मिल्कियत) के साधनों का अध्ययन करना होगा। अल्लाह (सुबहानहू व तआला) का माल से संबंधित क़ानून बीमे पर लागू किया जाएगा और तत्पश्चात इसी को इस प्रश्न में हुक्म शरई के रूप में अपनाया जाएगा। तदनुसार, संविधान और प्रत्येक धारा (कानून) की एक भूमिका होनी चाहिए जो स्पष्ट रूप से बताए कि प्रत्येक अनुच्छेद किस मज़हब (मत) से निकाला गया है और किस दलील पर वह आधारित है। यदि अनुच्छेद सही इज्तिहाद द्वारा निकाला गया है, तो उस दलील की व्याख्या दी जानी चाहिए जिससे वह अनुच्छेद निकाला गया है, ताकि मुसलमान जान सकें कि राज्य ने संविधान और धाराओं में जो नियम अपनाए हैं वे सही इज्तिहाद से प्राप्त हुक्म शरई हैं। इसका कारण यह है कि मुसलमान राज्य के क़ानूनों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं हैं, जब तक कि वे ऐसे हुक्म शरई न हों जिन्हें राज्य ने अपनाया हो। इसी आधार पर, राज्य संविधान और धाराओं के रूप में अहकाम शरईया अपनाता है, ताकि उन लोगों पर शासन किया जा सके जो उसकी नागरिकता रखते हैं।
उदाहरण के तौर पर, हम मुसलमानों के हाथों में इस्लामी राज्य के लिए एक मसौदा संविधान रख रहे हैं, जिसे मुसलमान उस समय अध्ययन करें जब वे उस इस्लामी राज्य की स्थापना के लिए काम कर रहे हों जो दुनिया तक इस्लामी दावत को पहुँचाएगा। यह ध्यान देने योग्य है कि यह संविधान किसी एक देश के लिए नहीं है, और न ही किसी विशेष क्षेत्र या देश तक सीमित होने के लिए बनाया गया है, बल्कि इस्लामी दुनिया में स्थापित होने वाले इस्लामी राज्य के लिए है।
As an illustration of this, we place in the hands of Muslims a draft constitution for the Islamic State in the Islamic world, to be studied by Muslims while they are working to establish the Islamic State that will carry the Islamic da'wah to the world. It should be noticed that this constitution is not meant for a particular country or intended to be specific to any region or country but for the Islamic State in the Islamic world.