1.1.4. वुज़ू को भंग करने वाली बातें
1.1.4. Factors Nullifying Ablution
इस अध्याय का आधार अल्लाह तआला के ये शब्द हैं: "या तुम में से कोई शौचालय से आया हो, या तुमने स्त्रियों को छुआ हो",51 और नबी ﷺ का यह कथन कि "अल्लाह किसी ऐसे व्यक्ति की नमाज़ स्वीकार नहीं करता जो अपवित्र हो, जब तक वह वुज़ू न कर ले"। इस अध्याय में विद्वान इस पर सहमत हैं कि पेशाब, शौचालय जाने, हवा निकलने, मज़ी (संभोग से पहले निकलने वाला स्राव) और वदी (पेशाब से पहले या बाद में निकलने वाला तरल) से वुज़ू टूट जाता है, क्योंकि इस अध्याय में वर्णित हदीसें प्रामाणिक हैं, जब ऐसे मल और स्राव स्वास्थ्य की अवस्था में निकलें। 7
The basis for this chapter are the words of the Exalted, “Or one of you cometh from the closet, or ye have touched women”,51 and the words of the Prophet (God’s peace and blessings be upon him) that “Allah does not accept prayers from one who is unclean, till he has performed ablution”. In this chapter they agreed about the nullification of ablution due to urination, visit to the privy, passing wind, madhy (prostatic secretion prior to cohabitation), and wady (fluid preceding or following urination), on the basis of the authenticity of the traditions laid down in this, when such excreta and discharges occur in a state of health. 7
इस अध्याय में सात मुद्दे हैं, जिनमें उन्होंने मतभेद किया, और वे इस विषय के सिद्धांतों के समान हैं।
There are seven issues in this chapter, about which they disagreed, that are like the principles of this subject.
1.1.4.1. मुद्दा 1: शरीर से निकलने वाली अशुद्ध चीज़ें
1.1.4.1. Issue 1: Unclean excretions from the body
इलाकों के फ़क़ीहों (इस्लामी विधिवेत्ताओं) में शरीर से निकलने वाली अशुद्ध चीज़ों से वुज़ू टूटने के बारे में मतभेद हुआ और यह तीन रायों में बँट गया। एक गुट ने केवल निकलने वाली चीज़ को ध्यान में रखा, चाहे वह किसी भी रास्ते से निकले या किसी भी हालत में निकले। यह राय अबू हनीफ़ा, उनके शागिर्दों, अल-सौरी, अहमद और सहाबा (साथियों) के एक समूह की थी। उनका कहना था कि शरीर से बहने वाली या निकाली गई हर अशुद्ध चीज़ वुज़ू को अनिवार्य करती है, जैसे ख़ून, नाक से अधिक मात्रा में ख़ून बहना, ख़ून निकलवाना, सिंगी लगवाना और क़ै (उल्टी)। अबू हनीफ़ा के नज़दीक थूक इससे अलग है। अबू हनीफ़ा के शागिर्द अबू यूसुफ़ ने कहा कि अगर वह मुँह भर हो तो वुज़ू ज़रूरी है। इनमें से किसी ने मामूली ख़ून बहने को महत्वपूर्ण नहीं माना, सिवाय मुजाहिद के। कुछ अन्य फ़क़ीहों ने उन रास्तों को ध्यान में रखा जिनसे निकास होता है, और इन्हें वुज़ू टूटने का कारक मानते हुए केवल गुदा और लिंग तक सीमित रखा। उनका कहना था कि इन दोनों रास्तों से जो कुछ भी निकले, चाहे वह ख़ून हो, पत्थर हो या बलग़म, वुज़ू टूट जाता है, और शरीर की हालत चाहे स्वस्थ हो या बीमार। इस राय के समर्थकों में अल-शाफ़ेई, उनके शागिर्द, और मालिक के शागिर्दों में से मुहम्मद इब्न अब्दुल हकम शामिल हैं। दूसरों ने रास्तों के साथ-साथ निकलने वाली चीज़ के प्रकार और निकलने के तरीके को भी ध्यान में रखा। उनका कहना था कि इन रास्तों से सामान्य रूप से निकलने वाली चीज़ें, जैसे पेशाब, मल, मज़ी, वदी और हवा, यदि स्वस्थ अवस्था में निकलें तो वुज़ू टूट जाता है। उन्होंने ख़ून, पित्त, कीड़ों और पेशाब के बे-इख़्तियार टपकने को ध्यान में नहीं रखा। इस राय के समर्थक मालिक और उनके अधिकतर शागिर्द थे।
The jurists of the regions disagreed about the invalidation of ablution resulting from unclean excretions from the body into three opinions. One group took into account excretions alone, whatever the outlet or the state in which it is excreted. This was the opinion •- of Abu Harnfa, his disciples, al-Thawri, Ahmad, and a group among whom are Companions. They said that each unclean substance flowing from the body or excreted from it necessitates ablution, like blood, excessive nose-bleeding, drawing of blood, cupping, and vomiting, except for sputum in Abu Hamfa’s view. Abu Yusuf, one of the disciples of Abu HanTfa, said that ablution is necessary if it is a mouthful. None of them considered minor bleeding as significant, except for Mujahid. Some other jurists took into account the passages through which the excretion occurs as factors affecting the nullification of ablution and limited these to the anus and the penis, saying that anything excreted from these two passages invalidates ablution, whatever its nature whether blood, or stone, or mucus, and whatever the condition of the body, whether in health or sickness. Those who held this opinion include al-ShafiT, his disciples, and Muhammad ibn <Abd al-Hakam from among the disciples of Malik. Others took into account the passages and the type of excretions and also the manner of excretion. They said that normal excretions from these passages, like urine, faeces, madhy, wady, and wind, if passed in a state of health invalidate ablution. They did not take into account blood, bile, worms, nor the incontinence of urine. Those who upheld this opinion were Malik and most of his disciples.
1.1.4.2. मुद्दा 2: नींद
1.1.4.2. Issue 2: Sleep
फ़ुक़हा (इस्लामी विधिवेत्ता) नींद के बारे में मतभेद रखते थे और तीन मत व्यक्त किए गए। एक समूह का मत था कि नींद वुज़ू टूटने का कारण है, इसलिए छोटी हो या लंबी, उसके बाद वुज़ू करना अनिवार्य है। दूसरे समूह का मत था कि ऐसा नहीं है, और इसके बाद वुज़ू अनिवार्य नहीं होता, सिवाय इसके कि व्यक्ति को इसका विश्वास हो कि उसका हदस* हो गया है, उन लोगों के मत के अनुसार जो संदेह को मान्यता नहीं देते, या जब उसे संदेह हो कि उसका हदस हुआ है, उन लोगों के मत के अनुसार जो संदेह को प्रभावी कारक मानते हैं। पूर्वकालीन पीढ़ी के कुछ लोग किसी व्यक्ति को नियुक्त कर देते थे कि वह सोते समय उनकी स्थिति पर नज़र रखे, अर्थात् देखे कि उनका हदस हुआ है या नहीं। एक अन्य समूह ने हल्की छोटी नींद और गहरी लंबी नींद में अंतर किया। उनके अनुसार गहरी नींद के बाद वुज़ू अनिवार्य है, पर हल्की नींद के बाद नहीं। यही क्षेत्रीय फ़ुक़हा और बहुमत का मत है। चूँकि कुछ (शारीरिक) अवस्थाएँ गहरी नींद के साथ-साथ वुज़ू-भंग करने वाली चीज़ों के निकलने को अन्य अवस्थाओं से अधिक सुगम बनाती हैं, इसलिए विद्वानों ने उनके बारे में मतभेद किया। मालिक ने कहा कि जो व्यक्ति करवट के बल या सजदे की अवस्था में सोए, उसे वुज़ू करना होगा, चाहे नींद लंबी हो या छोटी, पर जो बैठे-बैठे सोए उस पर वुज़ू अनिवार्य नहीं, जब तक ऐसी नींद बहुत लंबी न हो जाए। रुकू (झुकी) अवस्था में सोने के बारे में उनका मत भिन्न रहा। एक बार उन्होंने कहा कि उसका हुक्म खड़े व्यक्ति जैसा है, और एक बार कहा कि उसका हुक्म सजदा करने वाले जैसा है। अल-शाफ़ेई ने कहा कि जब भी कोई व्यक्ति सोए, चाहे उसकी जो भी अवस्था हो, उस पर वुज़ू अनिवार्य है, सिवाय उस व्यक्ति के जो बैठे-बैठे ऊँघ रहा हो। अबू हनीफ़ा और उनके शिष्यों ने कहा कि सोने वाले पर वुज़ू नहीं है, सिवाय उस व्यक्ति के जो करवट के बल सोया हो। इन लोगों के बीच इस मसले पर मतभेद का आधार संबंधित हदीसों का आपस में टकराव है। कुछ हदीसें ऐसी हैं जिनके स्पष्ट अर्थ से लगता है कि सोने वाले व्यक्ति के लिए बिल्कुल भी वुज़ू नहीं है, जैसे इब्न अब्बास की वह रिवायत कि "अल्लाह के रसूल ﷺ मैमूना के यहाँ गए और उनके पास सो गए, यहाँ तक कि हमने उनके सांस लेने की आवाज़ सुनी। फिर वे उठे और बिना वुज़ू किए नमाज़ पढ़ी।" इसके अलावा नबी ﷺ का यह कथन है: "अगर तुम में से कोई नमाज़ में ऊँघने लगे, तो उसे लेट जाना चाहिए, यहाँ तक कि उसकी नींद दूर हो जाए (फिर नमाज़ पढ़े)। क्योंकि हो सकता है वह अपने रब से माफ़ी माँगने का इरादा करे और (उल्टा) अपने आप को गाली दे बैठे।" यह भी रिवायत है कि नबी ﷺ के साथी मस्जिद में ऊँघते थे, यहाँ तक कि उनके सिर झुक जाते थे, फिर वे बिना वुज़ू किए नमाज़ पढ़ते थे। ये सभी सहीह रिवायतें हैं। वहीं कुछ दूसरी हदीसें ऐसी भी हैं जिनका स्पष्ट अर्थ बताता है कि नींद हदस (वुज़ू तोड़ने वाली चीज़) है। इनमें सबसे स्पष्ट सफ़वान बिन अस्साल की रिवायत है, जिन्होंने कहा: "हम एक सफ़र में अल्लाह के रसूल ﷺ के साथ थे, तो आप ﷺ ने हमें हुक्म दिया कि पेशाब, पाखाने या नींद की वजह से अपने मोज़े न उतारें, सिर्फ़ जनाबत (वीर्य-स्खलन) की हालत में उतारें।" इस तरह आप ﷺ ने पेशाब, पाखाने और नींद को एक जैसा माना। इसे इमाम तिर्मिज़ी ने सहीह कहा है। इनमें वह पिछली रिवायत भी शामिल है जो अबू हुरैरा से है, यानी नबी ﷺ का यह कथन: "जब तुम में से कोई नींद से जागे, तो बर्तन में हाथ डालने से पहले उसे धो ले।" इसका स्पष्ट अर्थ है कि नींद वुज़ू को आवश्यक बनाती है, चाहे नींद थोड़ी हो या लंबी। इसी प्रकार, उन लोगों के अनुसार, जो अल्लाह तआला के इन शब्दों से ऐसा अर्थ निकालते हैं, आयत का प्रत्यक्ष अर्थ: "ऐ ईमान वालो! जब तुम नमाज़ के लिए उठो, तो अपने चेहरों को और अपने हाथों को कोहनियों तक धोओ, और अपने सिरों का हल्का मसह करो, और अपने पैरों को टखनों तक धोओ",53 अर्थात जब तुम नींद से जागो, जैसा कि ज़ैद इब्न अस्लम और अन्य प्रारंभिक विद्वानों से वर्णित है। चूँकि इन सभी हदीसों के प्रत्यक्ष अर्थ आपस में टकराते थे, इसलिए फ़क़ीहों (इस्लामी विधिवेत्ताओं) ने दो तरीकों में से किसी एक के आधार पर मामले का फ़ैसला किया: तरजीह (प्राथमिकता देने) का तरीका, या तत्बीक़ (मेल-मिलाप) का तरीका। जिन लोगों ने तरजीह का तरीका अपनाया, उन्होंने या तो उन हदीसों के प्रत्यक्ष अर्थ के आधार पर, जो वुज़ू को छोड़ देती हैं, नींद के बाद वुज़ू की अनिवार्यता को पूरी तरह समाप्त कर दिया, या उन हदीसों के आधार पर, जो उसे अनिवार्य करती हैं, नींद के बाद हमेशा, चाहे नींद थोड़ी हो या लंबी, उसे अनिवार्य ठहराया। यानी उन्होंने उस हदीस के अनुसार चला जिसे उन्होंने प्राथमिकता दी, चाहे वह वुज़ू को अनिवार्य करने वाली हो या उसे छोड़ने वाली। जिन लोगों ने मेल-मिलाप का तरीका अपनाया, उन्होंने वुज़ू का आदेश देने वाली हदीसों को लंबी नींद पर लागू किया, और वुज़ू से छूट देने वाली हदीसों को थोड़ी नींद पर लागू किया। जैसा कि हमने कहा, यही बहुमत की राय है, और उसूले फ़िक़्ह के विशेषज्ञों के अनुसार, जहाँ तक संभव हो, मेल-मिलाप तरजीह से बेहतर है। इमाम अश-शाफ़िई ने हदीसों की ऐसी व्याख्या की कि सोने वाले की अवस्थाओं में से केवल बैठने की अवस्था को छूट में रखा, क्योंकि सहाबा से यह प्रामाणिक रूप से सिद्ध है कि वे बैठे-बैठे सो जाते थे और फिर बिना वुज़ू किए नमाज़ पढ़ लेते थे। अबू हनीफ़ा ने इसे केवल उस नींद के बाद वाजिब ठहराया जब व्यक्ति एक करवट पर लेटा हो, क्योंकि यह एक मरफ़ू‘ हदीस में बयान हुआ है, और नबी ﷺ के इस कथन में भी: "जो व्यक्ति एक करवट पर लेटकर सोए, उस पर वुज़ू वाजिब है।" यह रिवायत उमर (रज़ि.) से भी प्रमाणित है। मालिक ने कहा: नींद केवल इसी कारण से वुज़ू को भंग करने वाली है कि वह हदस के कारण के निकलने को आसान बना देती है। अपनी राय बनाने में मालिक ने तीन बातों को ध्यान में रखा: नींद की गहराई (सुदृढ़ता), उसकी अवधि, और उसकी मुद्रा। जो मुद्रा आम तौर पर हदस को आसान बनाती है, उसके लिए उन्होंने न तो अवधि और न ही गहराई की शर्त लगाई, लेकिन जो मुद्राएँ सामान्यतः ऐसा नहीं करतीं (जैसे खड़े या बैठे रहना), उनके लिए उन्होंने यह शर्त लगाई।
.1.1.4.3. मुद्दा 3: महिलाओं को छूना
.1.1.4.3. Issue 3: Touching women
विद्वानों (फ़ुक़हा) में इस बात पर मतभेद है कि जो व्यक्ति किसी स्त्री को हाथ से या अन्य कामुक अंगों से स्पर्श करे, उस पर वुज़ू अनिवार्य होता है या नहीं। एक समूह का मत था कि जो व्यक्ति किसी स्त्री को, जब उनकी त्वचाओं के बीच कोई रुकावट या ढकाव न हो, उसकी ओर हाथ बढ़ाकर छुए, उस पर वुज़ू करना अनिवार्य है। इसी प्रकार जो उसे चूमे, उनके अनुसार चुंबन भी स्पर्श का एक प्रकार है, चाहे उससे आनंद मिले या न मिले। यही मत अल-शाफ़िई और उनके शिष्यों ने अपनाया, किंतु उन्होंने एक बार स्पर्श करने वाले और स्पर्श किए जाने वाले के बीच अंतर किया, और केवल स्पर्श करने वाले पर वुज़ू अनिवार्य ठहराया, स्पर्श किए गए पर नहीं; एक अन्य बार उन्होंने दोनों पर वुज़ू अनिवार्य माना। तीसरी बार उन्होंने उन स्त्रियों के बीच अंतर किया जिनसे विवाह निषिद्ध है और अपनी पत्नी के बीच; पत्नी को छूने पर वुज़ू अनिवार्य ठहराया, किंतु निषिद्ध रिश्ते की स्त्रियों को छूने पर नहीं, जबकि एक अन्य अवसर पर उन्होंने दोनों को समान माना। अन्य विद्वानों ने वुज़ू तभी अनिवार्य किया जब कामुक आनंद अनुभव हो या उसका इरादा हो। इस मत के समर्थक विस्तार में जाकर बीच में ढकाव होने या न होने के आधार पर, और कुछ विशेष अंगों के स्पर्श के मामले में, जिनका छूना हानिकारक हो, अंतर करते हैं। चुंबन के मामले में उन्होंने आनंद की शर्त नहीं रखी। यह मालिक और उनके अधिकांश शिष्यों का मत है। कुछ विद्वानों ने स्त्रियों को छूने वाले पर वुज़ू की अनिवार्यता को नकारा, यह अबू हनीफ़ा का मत है। इन सभी मतों के समर्थन में सहाबा (साथियों) में से भी पूर्ववर्ती लोग मिलते हैं, सिवाय आनंद की शर्त के, क्योंकि मुझे याद नहीं कि किसी सहाबी ने यह शर्त लगाई हो। मतभेद का कारण अरबी भाषा में "स्पर्श" (लम्स) शब्द का बहुअर्थी होना है। अरब इसे कभी हाथ से छूने के लिए प्रयोग करते हैं, और कभी सहवास के लिए किनाए (संकेत) के रूप में। अतः विद्वानों के एक समूह ने यह मत अपनाया कि सर्वशक्तिमान के इस कथन, "या तुमने स्त्रियों को छुआ हो ...", में छूना, जिससे वज़ू टूट जाता है, का अर्थ सहवास है (जो बड़े वज़ू, अर्थात स्नान, की ओर ले जाता है)। दूसरों का कहना था कि यहाँ अर्थ हाथ से छूना है, और उनमें वे लोग भी हैं जिन्होंने इसे विशेष के लिए प्रयुक्त सामान्य शब्द माना और इसलिए इसमें आनंद की शर्त लगाई। उनमें वे भी थे जिन्होंने इसे सामान्य के लिए प्रयुक्त सामान्य शब्द माना, और इसी कारण उन्होंने (वज़ू टूटने के लिए) आनंद की शर्त नहीं लगाई। जिन्होंने आनंद की शर्त लगाई, वे उस हदीस से प्रेरित हुए जो इस आयत की सामान्यता को सीमित करती है, अर्थात वह हदीस कि पैगंबर मुहम्मद ﷺ सजदे में जाते समय आइशा को छूते थे, और शायद वह (आइशा) भी ऐसा करती थीं। मुहद्दिसों ने हबीब इब्न अबी साबित की रिवायत दर्ज की है, जो उन्होंने उर्वा से और उर्वा ने आइशा से सुनी: "पैगंबर मुहम्मद ﷺ अपनी कुछ पत्नियों को चूमते थे और फिर नमाज़ के लिए निकल जाते थे, लेकिन नया वज़ू नहीं करते थे। मैंने कहा, 'यह तो आप ही के अलावा कौन हो सकता है?' और वह मुस्कुरा दीं।" अबू उमर ने कहा कि इस हदीस को हिजाज़ के विद्वानों ने कमज़ोर माना, परंतु कूफ़ा के विद्वानों ने इसे सहीह माना। फिर भी, उन्होंने इसे प्रामाणिक माना और कहा कि यह हदीस मअबद इब्न नुबाता के माध्यम से भी वर्णित है। अल-शाफ़िई ने कहा कि यदि चूमने से संबंधित मअबद इब्न नुबाता की हदीस प्रमाणित है, तो मैं न तो उसके लिए और न ही छूने के लिए वज़ू अनिवार्य मानता हूँ। जिन लोगों ने हाथ से छूने पर वुज़ू को अनिवार्य ठहराया, उनका तर्क यह है कि "छूना" शब्द अपने मूल अर्थ में हाथ से छूने के लिए प्रयुक्त होता है, और सहवास के लिए इसका प्रयोग रूपक के तौर पर होता है। और यदि कोई शब्द मूल और रूपक दोनों अर्थों के बीच डगमगाता है, तो उसे मूल अर्थ तक सीमित रखना बेहतर है, जब तक कोई प्रमाण रूपक अर्थ की ओर इशारा न करे। दूसरे लोग यह कह सकते थे कि जब किसी रूपक शब्द का प्रयोग बार-बार होने लगता है, तो वह अपने रूपक अर्थ में अपने वास्तविक अर्थ से अधिक स्पष्ट हो जाता है, जैसे "ग़ाइत" शब्द, जो अपने वास्तविक अर्थ "नीची ज़मीन" की तुलना में शौचालय जाने के अर्थ में अधिक प्रभावी है। मेरी राय यह है कि "छूना" शब्द, यद्यपि दोनों अर्थों को लगभग समान रूप से व्यक्त करता है, फिर भी मेरे विचार में सहवास के लिए अधिक स्पष्ट है, यद्यपि वह रूपक है, क्योंकि अल्लाह, महान और उच्च, ने सहवास के लिए "मुबाशरा" (संपर्क) और "लमस" (छूना) शब्दों का प्रयोग किया है, और ये दोनों छूने के अर्थ को व्यक्त करते हैं। इसी व्याख्या के आधार पर बड़े अपवित्रता (जनाबत) की स्थिति में तयम्मुम की अनुमति का तर्क दिया जाता है, बिना इस मान्यता के कि संबंधित पाठों में शब्दों के क्रम को आगे-पीछे किया गया है, जैसा कि आगे आएगा, और आयत और हदीसों के बीच का विरोध भी दूसरी व्याख्या के आधार पर समाप्त हो जाता है। जो लोग आयत से छूने के दोनों अर्थ (हाथ से या सहवास के रूप में) समझते हैं, उनकी राय कमज़ोर है, क्योंकि अरब जब कोई अनेकार्थी शब्द प्रयोग करते हैं, तो उससे उन अर्थों में से एक ही अभिप्रेत होता है जो उस शब्द से संकेतित हो सकते हैं, न कि वे सभी अर्थ जो संकेतित हो सकते हैं। यह स्वयं उनकी भाषा में स्पष्ट है।
1.1.4.4. समस्या 4: लिंग को छूना
1.1.4.4. Issue 4: Touching the penis
इस विषय में फ़क़ीहों (धर्मशास्त्रियों) में मतभेद है, और उनकी तीन राएँ हैं। कुछ लोग इसके कारण वुज़ू को वाजिब (अनिवार्य) मानते हैं, चाहे स्पर्श किसी भी प्रकार का हो। यह राय अल-शाफ़िई, उनके शिष्यों, अहमद और दाऊद की है। उनमें से कुछ ने इस स्थिति में वुज़ू को बिल्कुल वाजिब नहीं माना। ये अबू हनीफ़ा और उनके शिष्य हैं। दोनों पक्षों के पूर्ववर्ती सहाबा (साथियों) और ताबिईन में भी मिलते हैं। फ़क़ीहों का एक समूह इस बात में अंतर करता है कि उसे किसी विशेष अवस्था में छूना और किसी दूसरी अवस्था में छूना। इन फ़क़ीहों के भी आगे उपसमूह हैं। कुछ ने इस आधार पर अंतर किया कि क्या व्यक्ति को उससे आनंद मिलता है। दूसरों ने इस आधार पर अंतर किया कि वह उसे हथेली के भीतरी भाग से छूता है या बाहरी भाग से। उन्होंने आनंद की स्थिति में वुज़ू को वाजिब माना, पर उसके अभाव में नहीं; इसी प्रकार (दूसरे समूह ने) हथेली से छूने पर वुज़ू को वाजिब माना, पर बाहरी भाग से छूने पर नहीं। ये दोनों विचार मालिक के शिष्यों से वर्णित हैं। मानो हथेली के भीतरी भाग का विचार आनंद की प्राप्ति से जुड़ा हुआ है। कुछ फ़क़ीहों ने इरादे और भूल के आधार पर अंतर किया, और इरादे से छूने पर वुज़ू को वाजिब माना, पर भूल से छूने पर नहीं। यह मालिक से वर्णित है, और दाऊद तथा उनके शिष्यों की राय भी यही है। कुछ अन्य का मत है कि स्पर्श के बाद वुज़ू करना मुस्तहब (उत्तम) है, वाजिब नहीं। अबू उमर ने कहा कि यह मालिक से उनके शिष्यों द्वारा अल-मग़रिब के निवासियों के बीच वर्णित स्थिर मत है, यद्यपि वर्णन में भिन्नता है। मतभेद का कारण यह है कि इस विषय में दो परस्पर विरोधी हदीसें हैं। बुसरा (सफ़वान की बेटी) से वर्णित है कि उन्होंने अल्लाह के रसूल ﷺ को यह कहते सुना: "जब तुम में से कोई अपने लिंग को छूए, तो उसे वुज़ू करना चाहिए।" लिंग छूने से वुज़ू के वाजिब होने के बारे में यह सबसे प्रसिद्ध हदीस है, जिसे मालिक ने अपनी किताब अल-मुवत्ता में दर्ज किया है, और याह्या इब्न मुईन तथा अहमद इब्न हंबल ने इसे प्रामाणिक ठहराया है, किंतु कूफ़ा के फ़क़ीहों ने इसे कमज़ोर घोषित किया है। यही अर्थ उम्म हबीबा से भी वर्णित है, और अहमद इब्न हंबल ने इसे प्रामाणिक कहा है। अबू हुरैरा के माध्यम से आंशिक रूप से समान एक रिवायत भी वर्णित है। इब्न अस-सकन ने इसे प्रामाणिक माना है, यद्यपि इसे अल-बुख़ारी या मुस्लिम ने दर्ज नहीं किया है। दूसरी हदीस, जो इसके विपरीत है, तल्क़ इब्न अली से वर्णित है, जिन्होंने कहा: "हम अल्लाह के रसूल ﷺ के पास आए, और उनके साथ एक व्यक्ति था जो देहाती प्रतीत होता था। उसने पूछा, 'ऐ अल्लाह के रसूल! उस व्यक्ति के बारे में आप क्या कहते हैं जो वुज़ू करने के बाद अपने लिंग को छूता है?' उन्होंने कहा, 'क्या यह तुम्हारे ही शरीर का एक हिस्सा नहीं है?'" इसे अबू दाऊद और अत-तिरमिज़ी ने भी दर्ज किया है, और कूफ़ा के कई विद्वानों तथा अन्य ने इसे प्रामाणिक ठहराया है। फ़क़ीहों ने इन हदीसों की व्याख्या दो तरीक़ों से की है: या तो वरीयता या निरस्तीकरण (नस्ख़) के तरीक़े से एक को स्वीकार और दूसरे को अस्वीकार करके, या सामंजस्य (जमा') के तरीक़े से। जिन्होंने बुसरा की हदीस को वरीयता दी, या उसे तल्क़ इब्न अली की हदीस का निरस्तकर्ता माना, उन्होंने लिंग छूने के बाद वुज़ू के वाजिब होने का पक्ष लिया, जबकि जिन्होंने तल्क़ इब्न अली की हदीस को वरीयता दी, उन्होंने छूने से उत्पन्न होने वाले वुज़ू के वाजिब होने को छोड़ दिया। जिन लोगों ने दोनों हदीसों में सामंजस्य बिठाने की कोशिश की, उन्होंने एक मामले में वुज़ू को अनिवार्य ठहराया और दूसरे में नहीं, या फिर बुसरा की हदीस को मुस्तहब (पसंदीदा) पर और तल्क़ बिन अली की हदीस को अनिवार्यता के निषेध पर महमूल किया। हर पक्ष ने अपनी पसंद की हदीस को प्राथमिकता देने के लिए जो दलीलें पेश की हैं, वे (बहुत) अधिक हैं और उनकी चर्चा लंबी है। ये दलीलें उनकी किताबों में मौजूद हैं, लेकिन मतभेद के बिंदु वही हैं जिनकी ओर हमने संकेत किया है।
1.1.4.5. मुद्दा 5: आग पर पकाई गई खाद्य सामग्री
1.1.4.5. Issue 5: Eatables prepared on fire
प्रथम काल के न्यायवेत्ताओं में आग पर पकी हुई वस्तु खाने के बाद वुज़ू के वाजिब होने के विषय में मतभेद था, क्योंकि अल्लाह के रसूल ﷺ से इस बारे में वर्णित हदीसें आपस में विरोधाभासी थीं। प्रथम काल के बाद के क्षेत्रों के अधिकांश न्यायवेत्ता इस बात पर सहमत हुए कि यह वाजिब नहीं रहा, क्योंकि उनके लिए यह सिद्ध था कि चारों ख़लीफ़ा का यही तरीक़ा था, और इसलिए भी कि जाबिर से वर्णित हदीस है, जिन्होंने कहा: "अल्लाह के रसूल ﷺ के अंतिम आदेशों में से एक यह था कि आग पर पकी हुई वस्तु खाने के बाद वुज़ू छोड़ दिया जाए।" इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। लेकिन हदीस के विद्वानों के एक समूह, अहमद, इसहाक और उनके अलावा कुछ अन्य लोगों का मत था कि वुज़ू केवल ऊँट का मांस खाने के बाद वाजिब है, इस विषय पर नबी ﷺ से स्थापित हदीस के आधार पर।
The jurists in the first period disagreed about the obligation of ablution after eating what was cooked on fire, because of the conflict of the traditions related about it from the Messenger of Allah (God’s peace and blessings be upon him). The majority of the jurists of the regions after the first period agreed about dropping the obligation, for it was established for them that such was the practice of the four Caliphs, and also because of the tradition related from Jabir, who said, “One of the last commands of the Messenger of Allah (God’s peace and blessings be upon him) was to relinquish ablution after consuming what was cooked on fire”. It is recorded by Abu Dawud. But a group of scholars from the traditionists, Ahmad, Ishaq, and a group besides them held that ablution is obligatory only after eating camel meat, because of an established tradition on this point from the Prophet (God’s peace and blessings be upon him).
1.1.4.6. मुद्दा 6: नमाज़ के दौरान हँसना
1.1.4.6. Issue 6: Laughter during prayer
अबू हनीफ़ा ने एक ग़लत राय व्यक्त की, जब उन्होंने नमाज़ के दौरान हँसने वाले व्यक्ति पर वुज़ू को अनिवार्य ठहराया। इसका आधार अबू अल-अलीयाह की एक मुरसल हदीस55 थी, जिसमें बताया गया है कि कुछ लोग नमाज़ के दौरान हँस पड़े थे और नबी ﷺ ने उन्हें वुज़ू और नमाज़ दोहराने का आदेश दिया। जमहूर (बहुसंख्यक विद्वानों) ने इस हदीस को इस आधार पर रद्द कर दिया कि यह मुरसल है और सिद्धांतों के विपरीत है, क्योंकि यह किसी चीज़ को नमाज़ के दौरान वुज़ू तोड़ने का कारण बनाती है, लेकिन नमाज़ के बाहर उसका ऐसा प्रभाव नहीं होता। हालाँकि, यह मुरसल ऐसी है जो सहीह है।
Abu HanTfa expressed a deviant opinion as he made ablution obligatory for one who laughs during prayer, because of a tnursal tradition55 of Abu al-cAliyah, which states that a group of people laughed during prayer and the Prophet (God’s peace and blessings be upon him) ordered them to repeat ablution and prayer. The majority rejected this tradition for its being a mursal and opposed to the principles, as it makes something a cause of invalidating ablution during prayer, but not when one is not praying. It is, however, a mursal that is sound.
1.1.4.7. मुद्दा 7: मुर्दे को उठाने के बाद वुज़ू
1.1.4.7. Issue 7: Ablution after carrying the dead
एक समूह के फ़क़ीहों ने मुर्दे को उठाने के कारण वज़ू को वाजिब ठहराकर सीमा लांघी। इस विषय में एक हदीस वर्णित है जो कमज़ोर है: "जो मुर्दे को नहलाए वह स्नान करे, और जो उसे उठाए वह वज़ू करे।" यह जानना ज़रूरी है कि अधिकांश फ़क़ीहों ने वज़ू को वाजिब ठहराया, चाहे उसका कारण कुछ भी हो, जैसे बेहोशी, पागलपन या नशा, इस वजह से कि होश खो देना। इन सबने इसे नींद पर आधारित समझा, यानी उनका मत यह है कि जब नींद, जो आम तौर पर हदस की स्थिति की ओर ले जाती है, यानी गहरी नींद, वज़ू को अनिवार्य करती है, तो उचित यही है कि बुद्धि का लोप भी यही प्रभाव डाले। ये इस अध्याय के वे मसले हैं जिन पर सहमति है या जो व्यापक रूप से मतभेद वाले जाने जाते हैं। अब हमें पाँचवें अध्याय की ओर बढ़ना चाहिए।
One group of jurists deviated by making ablution obligatory because of carrying the dead. There is a tradition for it that is weak, “One who bathes the dead let him take a bath, and one who carries them let him perform ablution”. It is necessary to know that the majority of the jurists made ablution obligatory due to the loss of senses, whatever its cause, like fainting, insanity, or intoxication. All of them held it to be analogous to sleep, that is, they maintained that if sleep makes ablution obligatory in a state that normally leads to hadath, namely, sound sleep, it is appropriate that the loss of reason should cause this too. These are the issues of this chapter that are agreed upon or are widely known to be disputed. We must now move to the fifth chapter.