21.5 जिज़या (सिर-कर)
21.5 The Head Tax (Jizya)
जिज़्या वह अधिकार है जो अल्लाह (swt) ने मुसलमानों के लिए निर्धारित किया है कि वे काफ़िरों से इस्लाम के शासन के प्रति उनकी अधीनता के रूप में इसे ले सकें। यह एक सामान्य कोष है जिसे समस्त प्रजा के कल्याण पर ख़र्च किया जा सकता है। यह हर वर्ष देय होता है और इसे पहले से वसूल नहीं किया जा सकता। जिज़्या का आधार क़ुरआन के पाठ में है। अल्लाह (swt) फ़रमाता है:
The Jizya is a right that Allah (swt) enabled the Muslims to take from the Kuffar as a submission from their part to the rule of Islam. It is a general fund that can be spent on the welfare of the subjects as a whole. It becomes due every year and cannot be collected beforehand. The Jizya is established through the text of the Qur’an. Allah (swt) says:
जब तक वे अपने हाथों से स्वेच्छा से जिज़्या न दें और स्वयं को अधीन न महसूस करें। [At-Tauba: 29]
“Until they pay the Jizya with willing submission (from their hands) and feel themselves subdued” [At-Tauba: 29]
अबू उबैद ने अपनी किताब अल-अमवाल (यानी माल-ओ-दौलत के बारे में) में अल-हसन इब्न मुहम्मद के हवाले से रिवायत किया है, जिन्होंने कहा: "अल्लाह के रसूल ﷺ ने हजर के मजूसियों (अग्नि-पूजकों) को इस्लाम की दावत देते हुए लिखा: 'जो इस्लाम कबूल करेगा, उससे वह कबूल किया जाएगा, और जो इस्लाम कबूल नहीं करेगा, उस पर जिज़्या लगाया जाएगा, बशर्ते कि उसका ज़बीहा न खाया जाए और उसकी औरतों से निकाह न किया जाए।'" जिज़्या काफ़िरों से उस वक़्त तक लिया जाता है जब तक वे कुफ़्र पर क़ायम रहें; अगर वे इस्लाम कबूल कर लें तो यह उनसे माफ़ कर दिया जाता है। जिज़्या सिर पर लगाया जाता है, माल पर नहीं; इसलिए यह काफ़िरों में से हर फ़र्द से लिया जाता है, न कि उनकी दौलत के हिसाब से। लफ़्ज़ "जिज़्या" "अल-जज़ा" (यानी बदला) से निकला है। इसलिए इसे काफ़िर होने के बदले के तौर पर लिया जाता है, और इसका मतलब यह है कि जब तक वे इस्लाम न अपना लें, यह माफ़ नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, जिज़्या उन काफ़िरों से माफ़ नहीं किया जा सकता जो जंग में हिस्सा लेते हों, क्योंकि यह उनकी हिफ़ाज़त के बदले में नहीं लगाया जाता। यह सिर्फ़ उसी फ़र्द से लिया जाता है जो इसे अदा करने की ताक़त रखता हो, क्योंकि अल्लाह (सुबहानहु व तआला) फ़रमाता है: