22.1 समाज में आर्थिक संतुलन
22.1 Economic Equilibrium in Society
इस्लाम ने सभी नागरिकों के बीच मुद्रा (धन) के प्रवाह को अनिवार्य बनाया है, और उसने इस प्रवाह को किसी एक विशेष वर्ग तक सीमित रखने को, दूसरों को उससे बाहर रखते हुए, वर्जित किया है। अल्लाह (SWT) कहता है:
Islam has made the circulation of currency between all citizens an obligation, and it has forbidden the restriction of such circulation to a certain group of people to the exclusion of others. Allah (swt) says:
ताकि वह केवल तुम्हारे धनवानों के बीच ही घूमता न रहे। [Al-Hashr: 7]
“Lest it circulates solely among the wealthy from amongst you.” [Al-Hashr: 7]
यदि समाज के व्यक्तियों के बीच आवश्यकताओं की पूर्ति में अत्यधिक असमानता हो, और यदि समाज को नए सिरे से पुनर्गठित करने की आवश्यकता हो, या यह असमानता इस्लामी नियमों की उपेक्षा या उनके लागू करने में लापरवाही के कारण उत्पन्न हुई हो, तो राज्य पर यह दायित्व होगा कि वह ज़रूरतमंदों को आर्थिक सहायता देकर इस स्थिति को सुधारे, जब तक उनकी बुनियादी ज़रूरतें पूरी न हो जाएँ और वितरण में संतुलन स्थापित न हो जाए। राज्य को चल और अचल दोनों प्रकार की वस्तुएँ उपलब्ध कराने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि उसका उद्देश्य केवल किसी की ज़रूरत को अस्थायी रूप से पूरा करना नहीं, बल्कि उसे ऐसे साधन देना भी है जो दीर्घकाल में उसे अपनी ज़रूरतें स्वयं पूरी करने में सहायता करें। यदि राज्य के पास धन की कमी हो और उसकी आय समाज में ऐसा संतुलन पैदा करने के लिए अपर्याप्त हो, तो उसके लिए संतुलन लाने के उद्देश्य से नागरिकों पर कर लगाना उचित नहीं है, क्योंकि यह दायित्व सभी मुसलमानों का नहीं है; बल्कि उसे कर के अलावा अन्य स्रोतों से धन जुटाने का प्रयास करना चाहिए, जैसे युद्ध की लूट (ग़नीमत) और सार्वजनिक संपत्तियाँ, ताकि संतुलन स्थापित किया जा सके। अतः जब भी राज्य को लगे कि समाज में आर्थिक संतुलन में असमानता है, तो उसे चाहिए कि वह इस असमानता को खज़ाने से ज़रूरतमंदों को आर्थिक सहायता देकर दूर करे, बशर्ते लूट और सार्वजनिक संपत्तियों से प्राप्त धन उपलब्ध हो।