23.3 विनिमय लेन-देन
23.3 Exchange Transactions
विनिमय के लेन-देन चाहे कितने भी अनेक और विविध हों, वे हमेशा एक ही प्रकार की मुद्रा को उसी प्रकार की दूसरी मुद्रा से बदलने, या एक मुद्रा को किसी दूसरे प्रकार की मुद्रा से बदलने तक ही सीमित रहेंगे। यह लेन-देन केवल नकद के बदले नकद, या धिम्मा (उधार) के बदले धिम्मा के बीच ही होता है। विनिमय नकद और उधार के बीच नहीं हो सकता। जब विनिमय का लेन-देन होता है, तो वह तब प्रभावी होता है जब अनुबंध हो चुके हों और नकद का भुगतान या हस्तांतरण हो चुका हो, और दोनों अनुबंधकर्ता पक्षों में से कोई भी अपनी बात से पीछे नहीं हट सकता, जब तक यह सिद्ध न हो जाए कि गंभीर धोखाधड़ी या दोष हुआ है, ऐसी स्थिति में दोनों पक्षों में से किसी एक के लिए सौदे से पीछे हटना जायज़ है। उदाहरण के लिए, यदि अनुबंधकर्ता पक्षों में से किसी ने जो सामान खरीदा था उसमें कोई दोष पाया, जैसे उसने पाया कि जो चाँदी उसने खरीदी थी उसमें तांबा मिला हुआ है, या चाँदी काली पड़ जाती है, तो उसे अधिकार है कि वह खरीदा हुआ सामान लौटा दे या लेन-देन के समय तय की गई कीमत के आधार पर उसे स्वीकार कर ले। इसका अर्थ है कि सामान लौटाना तब तक जायज़ है जब तक वह सौदे के समय वाली दर पर हो। यदि अनुबंधकर्ता पक्षों में से किसी ने सामान स्वीकार कर लिया, तो लेन-देन वैध रहेगा, और यदि उसने उसे लौटाने का निर्णय लिया, तो सौदा रद्द हो जाएगा। उदाहरण के लिए, यदि किसी ने 24 कैरेट सोने को 24 कैरेट सोने के बदले खरीदा, और बाद में पता चला कि जो सोना खरीदा गया वह केवल 18 कैरेट का है, तो इसे धोखाधड़ी माना जाएगा, और इस स्थिति में उसके पास यह विकल्प होगा कि या तो लेन-देन के समय तय विनिमय मूल्य पर सौदा स्वीकार करे या उसे अस्वीकार कर दे। अतः, यदि जिस व्यक्ति ने सोने के बदले सोना दिया था, उसने दोषयुक्त सोने को छूट के साथ स्वीकार करने का निर्णय लिया, तो यह जायज़ नहीं होगा, क्योंकि इससे दोनों वस्तुओं में से किसी एक का मूल्य अधिक आंका जाएगा, और "एक ही प्रकार" के सौदे की शर्त, यानी समानता, का अभाव होगा।
No matter how numerous and varied the transactions of exchange are, they would always be confined to the trading of one currency for another of the same type, or the trading of one currency for another of a different type. The transaction only occurs either between ready cash for other ready cash, or between a Dhimma (credit) for another credit. The exchange cannot take place between cash and a credit. When the exchange transaction takes place, it becomes effective once the contracts and the cashing in have taken place, and neither of the two contracting parties can go back on his word, unless it became established that there had been a case of serious fraud or defect, in which case it is permitted for one of the contracting parties to withdraw from the deal. If, for instance one of the contracting parties found a defect in that which He had purchased, for example He found that the silver He had bought contained copper, or that the silver turned black, He has the option to return the goods He had bought or to accept them based on the agreed price at the time of the transaction. This means that the returning of goods is allowed as long as it is at the same rate as the time of the deal. If one of the contracting parties accepted the goods, the transaction would be valid, and if He decided to return them, the deal would be cancelled. If, for instance one bought 24 carat gold for 24 carat gold, only to find that the gold purchased is only 18 carats, this would be considered fraud, and in this case He would have the choice of either accepting the deal at the agreed price of exchange at the time of the transaction or rejecting it. So, if the person who exchanged the gold for gold decided to accept the gold with its defect at a discount, this would not be allowed because there would be a higher value placed on one of the two commodities, and there is an absence of equivalence which is a condition of a deal of the “same type”.
एक और उदाहरण: यदि कोई कर्ज़दार अपने देनदार से कहे, "मेरे कुछ कर्ज़ को कम कर दो, और मैं बाकी कर्ज़ को जल्दी चुका दूँगा," तो यह भी जायज़ नहीं है, क्योंकि यह नकद के बदले उधार के सौदे का व्यापार होगा, जिसमें बराबरी नहीं है। यानी मानो कर्ज़दार ने अपना कर्ज़ "तुरंत" अपने देनदार को उस मूल लेन-देन से कम कीमत पर बेच दिया, और इस तरह ऐसा अंतर पैदा हुआ जो रिबा है। इसी तरह, यदि देनदार कर्ज़दार से कहे, "अगर तुम मेरे 100 जो तुम पर बकाया हैं, उन्हें जल्दी चुका दो तो मैं तुम्हें दस दिरहम दूँगा," तो यह जायज़ नहीं है, क्योंकि मूल्य में अंतर होगा जो रिबा है। मुस्लिम ने अबू सईद अल-ख़ुदरी से रिवायत किया कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: "सोने का सोने से, चाँदी का चाँदी से, गेहूँ का गेहूँ से, जौ का जौ से, खजूर का खजूर से और नमक का नमक से लेन-देन करो, बराबर-बराबर और हाथों-हाथ। जो कोई ज़्यादा दे या ज़्यादा ले, वह रिबा में पड़ गया; लेने वाला और देने वाला दोनों बराबर हैं।" एक और उदाहरण: यदि एक व्यक्ति पर दूसरे का सोना उधार हो और दूसरे पर पहले का चाँदी उधार हो, और वे एक-दूसरे का बकाया आपस में चुका दें, यानी पहला व्यक्ति अपना सोने का कर्ज़ उस चाँदी से चुकाए जो उसका दूसरे पर बकाया है, तो यह लेन-देन जायज़ है, क्योंकि नकद कर्ज़ चुकाना वस्तुओं के तत्काल भुगतान के समान है। और यदि कोई व्यक्ति सोने से माल खरीदे और विक्रेता माल का मूल्य चाँदी में वसूल करे, तो यह लेन-देन भी जायज़ है, क्योंकि एक मुद्रा से दूसरी मुद्रा का भुगतान करना जायज़ है, और यह सौदा एक परिसंपत्ति और कर्ज़ (उधार) के बीच का विनिमय होगा। इसका आधार यह है कि अबू दाऊद और अल-अथरम ने अपनी "सुनन" में इब्न उमर से रिवायत किया, जिन्होंने कहा: "मैं बक़ीअ में ऊँटों का व्यापार करता था, तो मैं दीनार में बेचता और दिरहम में वसूल करता, या दिरहम में बेचता और दीनार में वसूल करता था।" मैं इससे उसे लेता हूँ और उसको इससे देता हूँ, तो मैं हफ़्सा के घर में अल्लाह के रसूल ﷺ के पास गया और कहा: 'ऐ अल्लाह के रसूल ﷺ, कृपया सुनिए, मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ। मैं बक़ीअ में ऊँट बेचता हूँ, मैं दीनार में बेचता हूँ और दिरहम में भुगतान लेता हूँ, या मैं उन्हें दिरहम में बेचता हूँ और दीनार में भुगतान लेता हूँ। मैं इससे उसे लेता हूँ और उसको इससे देता हूँ।' अल्लाह के रसूल ﷺ ने उत्तर दिया: 'इसमें कोई बुराई नहीं है, बशर्ते तुम उस दिन के बाज़ार मूल्य के अनुसार व्यापार करो और बशर्ते तुम दूसरे पक्ष से इस हाल में अलग न हो कि तुम दोनों के बीच कुछ बाक़ी रह गया हो।' इसके अलावा, यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे से एक असली दीनार के बदले दो नकली दीनार ख़रीदे, तो यह जायज़ नहीं है। लेकिन यदि वह चाँदी के दिरहम के बदले एक असली दीनार ख़रीदे, फिर उन दिरहमों से दो नकली दीनार ख़रीदे, तो यह जायज़ है, चाहे वह उन्हें उसी व्यक्ति से ख़रीदे या किसी दूसरे से। इसका कारण यह है कि मुस्लिम ने अबू सईद से रिवायत किया, जिन्होंने कहा: "बिलाल अल्लाह के रसूल ﷺ के पास कुछ बरनी (उत्तम किस्म की) खजूरें लेकर आए, तो अल्लाह के रसूल ﷺ ने पूछा: 'ये कहाँ से आईं?' बिलाल ने उत्तर दिया: 'ये घटिया किस्म की खजूरें हैं जो हमारे पास कुछ समय से थीं, और मैंने अल्लाह के रसूल ﷺ के भोजन के लिए दो साअ घटिया किस्म की खजूरों का एक साअ उत्तम किस्म की खजूरों से विनिमय किया।'" इस पर अल्लाह के रसूल ﷺ ने कहा: "हाय! यही वास्तविक रिबा है, तो ऐसा मत करो। यदि तुम उत्तम किस्म की खजूरें ख़रीदना चाहते हो, तो घटिया खजूरों को एक अलग सौदे में बेच दो, फिर उत्तम किस्म की खजूरें ख़रीद लो।" और अबू सईद तथा अबू हुरैरा ने एक "सर्वसम्मत" हदीस में रिवायत किया "कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने ख़ैबर पर एक व्यक्ति को कर वसूलने वाला नियुक्त किया, तो वह एक दिन उनके पास जनीब नामक उत्तम किस्म की कुछ खजूरें लेकर आया। इस पर अल्लाह के रसूल ﷺ ने कहा: 'क्या ख़ैबर की सारी खजूरें ऐसी ही हैं?' उसने कहा: 'नहीं, अल्लाह की क़सम, ऐ अल्लाह के रसूल!' हम इन उत्तम गुणवत्ता वाली खजूरों का एक साअ घटिया खजूरों के दो साअ के बदले में, और उसी (उत्तम) का दो साअ तीन साअ के बदले में खरीदते हैं।” इस पर अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: “ऐसा मत करो; बल्कि अपनी घटिया खजूरें दिरहमों के बदले बेच दो और फिर दिरहमों के इस्तेमाल से जनीब खजूरें खरीद लो।” यहाँ अल्लाह के रसूल ﷺ ने उस व्यक्ति को यह आदेश नहीं दिया कि वह अपनी खजूरें उस व्यक्ति के अलावा किसी और को बेचे जिससे वह उन्हें खरीदेगा, और यदि उसी व्यक्ति को खजूरें बेचना, जिससे वह खरीदता है, हराम होता तो अल्लाह के रसूल ﷺ इसे अपने कर-संग्रहकर्ता को अवश्य समझा देते। इसलिए यह जायज़ था, क्योंकि उन्होंने एक प्रकार की वस्तु (खजूर) को दूसरी प्रकार की वस्तु (खजूर) के बदले बेचा, बिना किसी पूर्व शर्त या गुप्त समझौते (मिलीभगत) के, अतः यह जायज़ है, मानो उन्होंने किसी अन्य व्यक्ति से खरीदा हो। इसी प्रकार सोने को चाँदी के बदले बेचकर फिर चाँदी खरीदना भी जायज़ होगा। परंतु यदि यह पूर्व व्यवस्था और गुप्त सौदे के अधीन हो, तो यह जायज़ नहीं होगा और इसे निषिद्ध चाल माना जाएगा। इसका कारण यह है कि इस्लाम में हर प्रकार की चालबाज़ी निषिद्ध और अवैध है, यानी धोखे से किसी अनुबंध को वैध दिखाने का प्रयास, जिसका इरादा कोई निषिद्ध कार्य करना हो। इसमें वह कार्य शामिल है जिसे अल्लाह ने हराम किया है उसकी ओर बुलाना, जिस कार्य का अल्लाह (swt) ने आदेश दिया है उसे छोड़ना, किसी अधिकार को दबाना आदि। इसका कारण यह है कि जो भी हराम की ओर ले जाए वह स्वयं हराम है, और इसलिए कि अहमद ने उबादा बिन अस-सामित के हवाले से रिवायत किया कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: “मेरी उम्मत का एक समूह एक दिन “ख़मर” (नशीली चीज़ों) को उसका दूसरा नाम देकर हलाल समझ लेगा।” अहमद ने अबू मालिक अल-अशज़ई के हवाले से भी रिवायत किया कि उन्होंने अल्लाह के रसूल ﷺ को फ़रमाते सुना: “मेरी उम्मत के लोग शराब (ख़मर) को दूसरा नाम देकर पिएँगे।” अतः इस्लाम में विनिमय (अदला-बदली) शरीयत द्वारा निर्धारित विशेष नियमों के अनुसार जायज़ लेन-देन में से एक है। यह स्थानीय लेन-देन में भी हो सकता है और विदेशी लेन-देन में भी। जैसे एक ही देश की मुद्रा में सोने का चाँदी से और चाँदी का सोने से आदान-प्रदान किया जाता है, वैसे ही यह विदेशी मुद्रा में भी किया जा सकता है, चाहे देश के भीतर हो या बाहर, और चाहे यह आदान-प्रदान मौद्रिक हो या व्यावसायिक, तथा चाहे इसमें एक मुद्रा का दूसरी मुद्रा से विनिमय हो। विभिन्न मुद्राओं के बीच विदेशी विनिमय को विस्तार से समझने के लिए हमें मुद्रा की प्रकृति का गहराई से अध्ययन करना होगा।