5.7 गैर-मुस्लिमों को काम पर रखने का हुक्म
5.7 The Ruling of Hiring Non-Muslims
नियोक्ता और कर्मचारी, दोनों में से किसी के लिए भी मुसलमान होना शर्त नहीं है। इसलिए एक मुसलमान को किसी गैर-मुसलमान को नौकरी पर रखने की पूरी अनुमति है, इसके प्रमाण के रूप में नबी ﷺ का कर्म और किसी भी जायज़ (मुबाह) काम में, जिसमें राज्य के कार्य भी शामिल हैं, गैर-मुसलमानों को रखने पर सहाबा की सर्वसम्मति है। नबी ﷺ ने एक यहूदी को लिपिक (क्लर्क) के रूप में और एक अन्य यहूदी को दुभाषिए (अनुवादक) के रूप में नियुक्त किया, और एक मुशरिक (बहुदेववादी) को मार्गदर्शक (गाइड) के रूप में रखा। अबू बक्र और उमर ने ईसाइयों को धन-राशि के हिसाब-किताब के लिए लेखाकार (अकाउंटेंट) के रूप में रखा। जब मुसलमान के लिए गैर-मुसलमान को नौकरी पर रखना जायज़ है, तो मुसलमान के लिए भी जायज़ है कि वह किसी गैर-मुसलमान द्वारा किसी जायज़ काम को करने के लिए नौकरी पर रखा जाए। परंतु निषिद्ध (हराम) काम नहीं किया जाना चाहिए, चाहे नियोक्ता मुसलमान हो या गैर-मुसलमान। अतः एक मुसलमान के लिए जायज़ है कि कोई ईसाई उसे अपने लिए काम पर रखे। इसमें वह काम शामिल नहीं होना चाहिए जिसमें किसी मुसलमान को काफ़िर के अधीन करके अपमानित किया जाए। बल्कि यह केवल किसी जायज़ मामले में स्वयं को किसी अन्य व्यक्ति के पास किराए पर देना है, जिसमें नियोक्ता या कर्मचारी के लिए इस्लाम में विश्वास होना शर्त नहीं है। अली (रज़ि.) ने स्वयं को एक यहूदी के पास इस शर्त पर नौकरी पर लगाया कि वे उसके लिए पानी खींचेंगे और हर बाल्टी पानी के बदले एक खजूर मज़दूरी होगी। उन्होंने यह बात नबी ﷺ को बताई और आपने इससे मना नहीं किया। साथ ही, नौकरी पर रखना एक लेन-देन का अनुबंध है जिसमें मुसलमान का अपमान शामिल नहीं होता। हालाँकि, ऐसे काम के लिए जो अल्लाह तआला से निकटता दिलाने वाला हो, यह शर्त है कि जिसे नौकरी पर रखा जाए वह मुसलमान हो। उदाहरणों में नमाज़ पढ़ाना, अज़ान देना, हज, ज़कात बाँटना और क़ुरआन व हदीस की शिक्षा देना शामिल हैं। क्योंकि ये काम मुसलमान के सिवा किसी और से शरई रूप से मान्य नहीं होते, इसलिए इन्हें मुसलमान के सिवा किसी को नौकरी पर नहीं रखा जाता। इन कार्यों में इल्लत (कारण) यह है कि ये मुसलमान के अलावा किसी और से वैध नहीं होते। लेकिन यदि वे कार्य, जो हमें अल्लाह (swt) के निकट लाने वाले हैं, किसी गैर-मुस्लिम द्वारा भी करने के लिए मान्य हैं, तो उसे उन कार्यों के लिए काम पर रखना भी मान्य है। सार यह है: यदि नियोक्ता इन कार्यों को अल्लाह (swt) की निकटता पाने का एक प्रकार मानता है, लेकिन कर्मचारी उन्हें ऐसा नहीं मानता, तो उनकी जाँच करनी होगी। यदि वे कार्य केवल मुसलमान द्वारा ही मान्य हैं, जैसे न्यायिक कार्य (क़ज़ा), तो गैर-मुस्लिम को उन्हें करने के लिए काम पर रखने की अनुमति नहीं है। लेकिन यदि वे गैर-मुस्लिम के लिए भी मान्य हैं, जैसे युद्ध करना, तो उसे उस कार्य के लिए काम पर रखने की अनुमति है। अतः ज़िम्मी (गैर-मुस्लिम) को युद्ध के लिए काम पर रखा जा सकता है और उसका वेतन बैतुल-माल से दिया जाएगा।