23.2 मुद्रा विनिमय (सर्फ़)
23.2 Currency Exchange (Sarf)
यदि हम विश्व बाज़ारों में मौजूद वित्तीय प्रकृति के व्यापारिक अनुबंधों की जाँच करें, तो हमें पता चलेगा कि क्रय-विक्रय के लेन-देन छह प्रकार से होते हैं:
If we examine the trade contracts of a financial nature that exist in world markets, we would find that purchase and sales transactions occur in six types:
1. एक ही प्रकार की मुद्रा का उसी प्रकार की मुद्रा से विनिमय, जैसे पुराने इराकी दीनार के नोटों को नए नोटों से बदलना।
1. The exchange of a currency with the same type of currency, such as the exchange of old Iraqi dinar notes for new notes.
2. एक मुद्रा को दूसरी मुद्रा से बदलना, जैसे मिस्री पाउंड को डॉलर से बदलना।
2. The exchange of one currency for another currency, such as the exchange of Egyptian pounds for dollars.
3. किसी विशेष मुद्रा से कुछ विशेष वस्तुओं की खरीद और उसी एक सौदे में उस मुद्रा को किसी दूसरी मुद्रा से खरीदना, जैसे डॉलर से विमान खरीदना और उन्हीं डॉलरों को एक ही सौदे में इराकी दीनार में बदलना।
3. The purchase of certain goods with a certain currency and the purchase of that currency with another currency, such as the purchase of aircraft with dollars and the exchange of those dollars for Iraqi dinars in one single deal.
4. कुछ वस्तुओं को स्टर्लिंग में बेचना और फिर उनके बदले डॉलर लेना।
4. The sale of certain goods in sterling and then exchanging them for dollars.
5. कुछ निश्चित मुद्रा के साथ कुछ निश्चित बॉन्ड (ऋणपत्रों) की बिक्री।
5. The sale of certain bonds with a certain currency.
6. किसी निश्चित मुद्रा के साथ किसी निश्चित कंपनी के शेयरों की बिक्री।
6. The sale of stocks in a certain company, with a certain currency.
ये छह लेन-देन वित्तीय प्रकृति के व्यापारिक अनुबंध हैं। जहाँ तक बॉन्ड (ऋणपत्र) और शेयरों की खरीद-बिक्री की बात है, शरीयत के नियमों के अनुसार यह पूर्णतः हराम है, क्योंकि बॉन्ड में एक निश्चित ब्याज दर होती है, अतः उनमें सूद (ब्याज) होता है; यह स्वयं में एक सूदी लेन-देन है। शेयर किसी कंपनी में आंशिक स्वामित्व का प्रतिनिधित्व करता है, और वह कंपनी मूलतः अवैध है, इसलिए शेयरों का व्यापार हराम है। इसी प्रकार सभी सार्वजनिक कंपनियों के शेयरों में लेन-देन करना भी हराम है, चाहे वे कंपनियाँ वैध व्यापार करती हों, जैसे औद्योगिक और वाणिज्यिक सार्वजनिक कंपनियाँ, या अवैध व्यापार करती हों, जैसे बैंकों के शेयर। जहाँ तक किसी मुद्रा से माल खरीदने, एक मुद्रा को दूसरी मुद्रा से बदलने, या किसी माल को किसी मुद्रा में बेचकर फिर उस मुद्रा को दूसरी मुद्रा से बदलने की बात है, ये दो लेन-देन हैं: एक खरीद-बिक्री का लेन-देन और एक विनिमय (सर्राफ़ा) का लेन-देन। अतः वे व्यापार और विनिमय के नियमों का पालन करते हैं, और उन पर सौदों को अलग-अलग रखने (तक़ाबुज़ / हाथों-हाथ लेन-देन) का नियम लागू होना चाहिए।
These six transactions are trade contracts of a financial nature. As for the purchase and the sale of bonds and shares, this is categorically forbidden under the Shari’ah rules, for the bonds have a determined rate of interest thus usury occurs in them; it is even in itself, a usurious transaction. A stock represents a part ownership in a company that is unlawful in the first instance, thus trading in stock is forbidden, and it is also forbidden to deal in the stock of all the public companies, whether these were companies that deal in lawful trade, such as the industrial and commercial public companies, or companies that deal with unlawful trade such as the banks’ stocks. As for the purchase of goods with a certain currency, the exchange of that currency for another, or the sale of certain goods for certain currency and then exchanging that currency for another currency; these represent two transactions, a transaction of purchase and sale and a transaction of exchange. Therefore, they follow the rules of trading and exchange, and they should be subject to the rule of the separation of the deals.
एक ही या भिन्न मुद्रा का विक्रय करना एक विनिमय (सर्फ़) का लेन-देन है, और यह जायज़ है। इसका कारण यह है कि सर्फ़ का अर्थ है पैसे के बदले पैसे का आदान-प्रदान, यानी सोने और चाँदी का, या तो एक ही प्रकार में बराबर, या भिन्न प्रकारों में बराबर-बराबर। यह विनिमय मुद्रा में उसी तरह होता है जैसे सोने और चाँदी में होता है, क्योंकि सोने और चाँदी का वर्णन मुद्रा के रूप में उस पर भी लागू होता है। मुद्रा सोने और चाँदी के समान नहीं, बल्कि उनमें से एक रूप है, क्योंकि उसका मूल्य उन्हीं पर आधारित है। अतः यदि कोई व्यक्ति चाँदी के बदले सोना खरीदे, सिक्के के बदले सिक्का, यह कहते हुए कि "मैंने यह सोने का दीनार तुम्हें इन चाँदी के दिरहमों के बदले बेचा", और उन्हें बेचते समय उपस्थित रहकर नाम लेकर बताए, या यदि वह चाँदी के बदले सोना अनुपस्थित रहते हुए खरीदे, जैसे किसी वर्णित मौद्रिक वस्तु पर अनुबंध करते समय जब वह मौजूद न हो, और कहे: "मैंने ये मिस्री पाउंड तुम्हें दस हिजाज़ी दिरहमों के बदले बेचे", तो ये उदाहरण जायज़ हैं, क्योंकि अनुबंधों में मुद्राएँ नाम लेकर निर्धारित हो जाती हैं, और इस प्रकार उनकी संपत्ति का स्वामित्व स्थापित हो जाता है। इसलिए सोने का चाँदी से व्यापार जायज़ है, चाहे वह पाउंड का दिरहमों से हो, चाँदी के आभूषणों से हो, या निक़र (यानी चाँदी का चूर्ण) से। निक़र चाँदी का वह रूप है जो तिब्र (यानी सोने के चूर्ण) के समतुल्य है। चाँदी का सोने से व्यापार भी जायज़ है, चाहे वह आभूषण हो, सिल्लियाँ हों या सोने का चूर्ण। किन्तु ऐसा सारा व्यापार हाथों-हाथ होना चाहिए और वर्णित होना चाहिए, या तो बराबर-बराबर, वज़न के बदले वज़न, या ज्ञात मात्रा (जिज़्फ़) के बदले ज्ञात मात्रा, या उल्लिखित सभी प्रकारों में वज़न के बदले ज्ञात मात्रा, बशर्ते विनिमय दो भिन्न प्रकारों में हो। यदि वे एक ही प्रकार के हों, तो वे केवल बराबर ही हो सकते हैं, और असमान नहीं होने चाहिए। सोने का सोने से व्यापार हो सकता है, चाहे वह दीनार हों, आभूषण हों, सिल्लियाँ हों या अयस्क हों, वज़न के बदले वज़न, वर्णित संपत्ति के बदले वर्णित संपत्ति, हाथों-हाथ, और सिद्धांततः इसमें कोई अंतर जायज़ नहीं है। चाँदी को भी चाँदी के बदले बेचा जा सकता है, चाहे वह दिरहम हों, आभूषण हों या निक़र, वज़न के बराबर, निर्धारित संपत्ति के बदले निर्धारित संपत्ति, हाथों-हाथ, और सिद्धांततः कोई अंतर अनुमत नहीं है। इसलिए, एक ही प्रकार की मुद्रा के बीच विनिमय जायज़ है, बशर्ते वह बराबर हो, हाथों-हाथ हो और निर्धारित संपत्ति के बदले निर्धारित संपत्ति हो। दो अलग-अलग मुद्राओं के बीच विनिमय भी जायज़ है, और इस स्थिति में बराबरी और अंतर की शर्त लागू नहीं होती, लेकिन यह हाथों-हाथ होना चाहिए और निर्धारित संपत्ति के बदले निर्धारित संपत्ति हो। विनिमय की अनुमति का प्रमाण वह हदीस है जो अत-तिर्मिज़ी ने उबादा बिन अस-सामित से रिवायत की है, जिन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: "तुम सोने को चाँदी के बदले जैसे चाहो बेच सकते हो, हाथों-हाथ।" मुस्लिम ने भी उबादा बिन अस-सामित से रिवायत किया है, जिन्होंने कहा: "मैंने रसूलुल्लाह ﷺ को सोने का सोने के बदले, चाँदी का चाँदी के बदले, गेहूँ का गेहूँ के बदले, जौ का जौ के बदले, खजूर का खजूर के बदले, और नमक का नमक के बदले बेचने से मना करते सुना, सिवाय इसके कि वह बराबर मात्रा में और निर्धारित संपत्ति के बदले निर्धारित संपत्ति हो। जो कोई अधिक देगा या अधिक लेगा, वह सूद (रिबा) में पड़ जाएगा।" मुस्लिम ने अबू बकरा से भी रिवायत किया है, जिन्होंने कहा: "उन्होंने (रसूलुल्लाह ﷺ) हमें आदेश दिया कि हम सोने को चाँदी के बदले जैसे चाहें खरीदें, और चाँदी को सोने के बदले जैसे चाहें खरीदें। एक व्यक्ति ने उनसे पूछा तो उन्होंने फ़रमाया: 'हाथों-हाथ।' उन्होंने यह भी जोड़ा: 'मैंने इसी तरह सुना है।'" अत-तिर्मिज़ी ने मालिक बिन औस अल-हदसान से रिवायत किया है, जिन्होंने कहा: "मैं आया और पूछा कि कौन कुछ दिरहम बदल सकता है, तब तल्हा बिन उबैदुल्लाह ने, जो उमर बिन अल-ख़त्ताब के पास बैठे थे, कहा: 'हमें अपना सोना दिखाओ,' और फिर बाद में हमारे पास आना, जब हमारा नौकर आएगा तो हम तुम्हें तुम्हारी चाँदी (दिरहम) दे देंगे।" उस पर उमर ने कहा: "नहीं, अल्लाह की क़सम, तुम उसे उसके चाँदी के सिक्के दोगे या उसका सोना उसे लौटाओगे, क्योंकि अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: 'चाँदी का सोने से बदला जाना रिबा (सूद) का एक पहलू रखता है, जब तक कि वह हाथों-हाथ न हो; गेहूँ का गेहूँ से बदला जाना रिबा है, जब तक कि वह हाथों-हाथ न हो; जौ का जौ से बदला जाना भी रिबा है, जब तक कि वह हाथों-हाथ न हो, और खजूर का खजूर से बदला जाना भी रिबा है, जब तक कि वह हाथों-हाथ न हो।'" इसलिए सोने का चाँदी से व्यापार करना केवल हाथों-हाथ ही जायज़ है, क्योंकि यदि दोनों व्यापारी हाथों-हाथ लेन-देन करने से पहले अलग हो जाएँ, तो यह लेन-देन नाजायज़ होगा। बुख़ारी और अबू दाऊद ने उमर से रिवायत किया कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: "सोने का चाँदी से बदला जाना रिबा है, सिवाय हाथों-हाथ के।" यह शर्त है कि दोनों अनुबंध करने वाले पक्ष सौदे की जगह पर ही नक़द भुगतान करें, क्योंकि यदि वे नक़द भुगतान से पहले अलग हो गए, तो बिक्री को कानूनी रूप से हुई नहीं माना जाएगा। इसका कारण यह है कि विनिमय कीमतों का आपसी लेन-देन है, और सौदे की जगह पर नक़द भुगतान करना विनिमय के वैध होने की प्रमुख शर्त है। बुख़ारी ने मालिक इब्न अव्स से रिवायत किया, जिन्होंने कहा: अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: "सोने का चाँदी से व्यापार रिबा है, सिवाय हाथों-हाथ के।" अत-तिरमिज़ी ने भी रिवायत किया कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: "सोने को चाँदी से जैसे चाहो बदलो, बशर्ते कि वह हाथों-हाथ हो।" अल्लाह के रसूल ﷺ ने सोने का चाँदी से उधार व्यापार करने से मना फ़रमाया, और उपस्थित वस्तु के बदले अनुपस्थित वस्तु के व्यापार से भी मना फ़रमाया। इसलिए विनिमय सौदे की जगह पर ही होना चाहिए, क्योंकि यदि अनुबंध करने वाले पक्ष नक़द भुगतान से पहले अलग हो गए, तो विनिमय उसकी एक मुख्य शर्त पूरी न होने के कारण अमान्य होगा। यदि, तथापि, सौदे का कुछ भाग सौदे के स्थान पर ही विनिमय कर दिया गया, तो वह सौदा उस भाग में वैध होगा जिसका विनिमय हुआ है, और उसके समतुल्य प्रतिफल में भी; और शेष सौदे तथा उसके समतुल्य भाग के लिए वह अमान्य होगा। इसका कारण यह है कि सौदे को भागों में विभाजित करना जायज़ है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति एक दीनार का विनिमय दस दिरहम के बदले ऐसे व्यक्ति से करे जिसके पास केवल पाँच दिरहम हों, तो पूरे दस दिरहम नकद किए जाने से पहले उनका अलग होना उनके लिए अमान्य होगा। यदि पाँच दिरहम नकद कर लिए गए और वे अलग हो गए, तो आधे दीनारों के लिए विनिमय अमान्य होगा और दूसरे आधे के लिए वैध होगा, जो नकद किए गए पाँच दिरहमों के समतुल्य है। इसका कारण यह है कि बिक्री के सौदे को विभाजित करना जायज़ है। यदि पाँच दिरहम वाले व्यक्ति ने सौदा पूरा करने के लिए शेष धनराशि दूसरे व्यक्ति से या किसी तीसरे पक्ष से उधार ले ली, तो विनिमय वैध होगा, बशर्ते उधार लेना सौदे की शर्त न हो; क्योंकि यदि वह सौदे की शर्त होता, तो सौदा अमान्य हो जाता।