7.1 प्रतिनिधि सहायक
7.1 The Delegated Assistant
सहायक-प्रतिनिधि वह वज़ीर (मंत्री) है जिसे ख़लीफ़ा शासन और अधिकार की ज़िम्मेदारियाँ अपने साथ उठाने के लिए नियुक्त करता है। ख़लीफ़ा उसे राज्य के मामलों को चलाने का काम उसकी राय के अनुसार सौंपता है, और वह उन्हें शरीयत के नियमों के अनुरूप अपने इज्तिहाद के आधार पर लागू करता है।
The delegated assistant is the Wazir whom the Khaleefah appoints to bear with Him the responsibilities of ruling and authority. The Khaleefah delegates to Him the running of the state’s affairs according to his opinion and executing them according to his Ijtihad in compliance with the Shar’a rules.
मु'आविन (सहायक) की नियुक्ति उन मुबाह (जायज़, अनुमत) विषयों में से है, जिसका अर्थ है कि ख़लीफ़ा को यह अनुमति है कि वह अपने लिए एक प्रतिनिधि सहायक नियुक्त करे, जो उसकी ज़िम्मेदारियों और कार्यों में उसकी मदद करे। अल-हाकिम और अत-तिर्मिज़ी ने अबू सईद अल-ख़ुदरी से रिवायत किया है कि उन्होंने कहा कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
The appointment of the Mu’awin is one of the Mubah matters that means the Khaleefah is allowed to appoint a delegated assistant to Him who helps Him in his responsibilities and tasks. Al-Haakim and at- Tirmithi reported from Abi Sa’id al-Khudri, He said that the Messenger of Allah (pbuh) said:
“मेरे दो वज़ीर (मंत्री) आसमानों में जिब्रील और मीकाईल हैं, और ज़मीन पर अबू बक्र और उमर हैं।” हदीस में “वज़ीर” शब्द का अर्थ सहायक और मददगार है, जो इसका भाषाई अर्थ है। क़ुरआन में भी यह शब्द इसी अर्थ में प्रयोग हुआ है; अल्लाह (SWT) फ़रमाता है:
“My two ministers (Wazirs) from the heavens are Jibreel and Mika’il and on the earth are Abu Bakr and ‘Umar.” The word Wazir in the Hadith means the helper and the assistant, which is the linguistic meaning. It has been used in the Qur’an with such a meaning; Allah (swt) says:
"मेरे परिवार में से मुझे एक वज़ीर (मंत्री) दीजिए।" [TMQ Ta-Ha: 29]
“Give me a minister (Wazir) from my family.” [TMQ Ta-Ha: 29]
हदीस में शब्द "वज़ीर" मुतलक़ (सामान्य अर्थ वाला) है, जिसमें किसी भी मामले में किसी भी प्रकार की मदद या सहायता शामिल है; इसलिए वह ख़लीफ़ा की ख़िलाफ़त के कार्यों और ज़िम्मेदारियों में सहायता कर सकता है। अबू सईद अल-ख़ुदरी की हदीस शासन के मामले में सहायता तक सीमित नहीं है, क्योंकि जिब्रील और मीकाईल, जो आसमान से रसूलुल्लाह ﷺ के दो वज़ीर थे, उनका शासन की ज़िम्मेदारियों और कार्यों में सहायता करने से कोई संबंध नहीं था। अतः हदीस में शब्द "वज़ीरायी" (मेरे दो वज़ीर) का अर्थ भाषाई अर्थ से अलग नहीं है, यानी मेरे दो सहायक। किसी को सहायक या मददगार बनाना मुबाह (जायज़, अनुमत) कामों में से है, इसी प्रकार वज़ीर नियुक्त करना भी मुबाह कामों में से है। रसूलुल्लाह ﷺ का अबू बक्र और उमर को वज़ीर नियुक्त करना भाषाई अर्थ की सीमा से बाहर नहीं जाता, क्योंकि यह स्पष्ट नहीं है कि उन्होंने रसूलुल्लाह ﷺ के साथ शासन के कार्य भी उठाए थे। फिर भी, उन्हें दो वज़ीर बनाना उन्हें हर मामले में आप ﷺ की सहायता करने का अनिवार्य अधिकार देता है, बिना इसे शासन और सरकार के मामलों और कार्यों तक सीमित किए। उन्हें वज़ीर बनाना इस बात का संकेत है कि ख़लीफ़ा के लिए ऐसे व्यक्ति को वज़ीर बनाना जायज़ है जो शासन के मामलों और कार्यों में उसका सहायक हो और उसकी मदद करे। अबू बक्र के ख़लीफ़ा बनने के बाद, उन्होंने उमर इब्न अल-ख़त्ताब को अपना सहायक नियुक्त किया। उनकी सहायता इतनी स्पष्ट थी कि कुछ सहाबा ने अबू बक्र से कहा: "हम नहीं बता सकते कि ख़लीफ़ा आप हैं या उमर।" जब उमर ख़िलाफ़त के पद पर आए, तो उस्मान और अली उमर के सहायक थे, लेकिन वे शासन के मामलों में उमर के सहायक के रूप में कोई भूमिका निभाते हुए दिखाई नहीं दिए। उनकी स्थिति रसूलुल्लाह ﷺ के साथ अबू बक्र और उमर की स्थिति जैसी थी। उस्मान के समय में, अली और मरवान इब्न अल-हकम उनके दो सहायक थे। हालाँकि, अली कुछ मामलों से असंतुष्ट थे, इसलिए वे दूर रहे। हालाँकि मरवान का वज़ीर होना ख़लीफ़ा उस्मान को शासन के कामों में सहायता देने में स्पष्ट रूप से दिखाई देता था।
The word Wazir in the Hadith is unrestricted (Mutlaq) which includes any help or assistance in any matter; therefore He can assist the Khaleefah in the functions and the tasks of the Khilafah. The Hadith of Abi Sa’id al- Khudri is not specific to the assistance in the matter of ruling, because Jibra’il and Mika’il, the two Wazirs of the Messenger of Allah (pbuh) from the heaven, have no relationship in helping Him in the responsibilities and functions of ruling. Therefore, the word Waziray (my two Wazirs) in the Hadith does not indicate other than the linguistic meaning, which is my two assistants. Taking anyone as an assistant or as a helper is of the Mubah matters, likewise appointing the Wazir is of the Mubah matters. The Messenger’s appointment of Abu Bakr and ‘Umar as Wazirs does not go out of the bounds of the linguistic meaning, since it does not appear that they carried along with the Messenger of Allah (pbuh) the tasks of ruling. However appointing them as two Wazirs to Him gives them the mandatory powers of assisting Him in every matter without restricting that in the matters and tasks of ruling and the government. Appointing them as Wazirs indicates that it is allowed for the Khaleefah to take as a Wazir a person who assists Him and helps Him in the matters and tasks of ruling. After Abu Bakr became the Khaleefah, He appointed ‘Umar ibn al- Khattab as an assistant to him. His assistance was so evident to the point that some of the Sahabah said to Abu Bakr; “we cannot tell whether the Khaleefah is yourself or ‘Umar.” Once ‘Umar held the post of the Khilafah, ‘Uthman and ‘Ali were ‘Umar’s assistants, but they did not appear to carry out any assistant role to ‘Umar in the matters of ruling. Their situation was similar to that of Abu Bakr and ‘Umar with the Messenger of Allah (pbuh). At the time of ‘Uthman, ‘Ali and Marwan ibn al-Hakam were his two assistants. However ‘Ali was unhappy about some affairs, so He remained distant. However, Marwan’s Wizara was quite evident in assisting ‘Uthman in the tasks of ruling.
यदि ख़लीफ़ा किसी को शासन के मामलों में अपना सहायक नियुक्त करता है, तो वह उसे सामान्य रूप से मामलों के प्रबंधन का अधिकार सौंपता है, उसके प्रतिनिधि के रूप में। इस सौंपे जाने से, वह सौंपा गया व्यक्ति ख़लीफ़ा का वज़ीर और प्रतिनिधि सहायक बन जाता है, और उसकी ज़िम्मेदारियाँ ख़लीफ़ा जैसी होती हैं। फिर भी, वह ख़लीफ़ा की तरह अपने आप में अधिकार नहीं रखता, बल्कि ख़लीफ़ा द्वारा उसे अपने प्रतिनिधि के रूप में वज़ारत सौंपे जाने के कारण ये अधिकार पाता है। इसलिए, यदि ख़लीफ़ा घोषणा करे कि "मैंने अमुक व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि वज़ीर" या "प्रतिनिधि सहायक" नियुक्त किया है, या किसी से कहे "मेरे सौंपे गए कामों में मेरे प्रतिनिधि बनो", या कोई अन्य समान शब्द कहे, तो नियुक्त व्यक्ति उसी क्षण से प्रतिनिधि के रूप में ख़लीफ़ा के सभी अनिवार्य अधिकारों का उपयोग करेगा। अल-मावर्दी ने अपनी पुस्तक अल-अहकाम अल-सुल्तानिय्या में इस पद को "वज़ारत-उत-तफ़वीज़" कहा है, और उसका वर्णन इस प्रकार किया: "जहाँ तक सौंपी गई वज़ारत की बात है, इसका अर्थ है कि इमाम एक वज़ीर नियुक्त करता है, जिसे वह अपनी राय के अनुसार मामलों के संचालन और अपने इज्तिहाद के अनुसार उन्हें लागू करने का अधिकार सौंपता है।" सौंपे गए प्रतिनिधि सहायक की वास्तविकता यही है। वह ख़लीफ़ा के सभी शासकीय कार्यों में उसका सहायक होता है। उसे ख़िलाफ़त से संबंधित कोई भी कार्य करने का अधिकार होता है, चाहे वह कार्य ख़लीफ़ा ने विशेष रूप से उसे सौंपा हो या नहीं, क्योंकि उसे सामान्य प्रतिनिधित्व दिया गया है। फिर भी, उसे हर कार्य के लिए ख़लीफ़ा को रिपोर्ट करनी चाहिए, क्योंकि वह सहायक है, ख़लीफ़ा नहीं। अतः वह ख़लीफ़ा से स्वतंत्र नहीं हो सकता, बल्कि उसे अपने हर कार्य के बारे में, चाहे छोटा हो या बड़ा, ख़लीफ़ा को सूचित करना होगा। इसका कारण यह है कि शासन के मामलों के संचालन की ज़िम्मेदारी ख़लीफ़ा को सौंपी गई है।
If the Khaleefah appointed someone to be his assistant in the matters of ruling, He delegates to Him the administration of the affairs, in general terms, as a deputy to him. By such delegation, the delegated person becomes a Wazir and a delegated assistant to the Khaleefah and, He has responsibilities like those of the Khaleefah. However, He does not possess his powers by himself like the Khaleefah, rather through the assignment of the wizara’ to Him by the Khaleefah as a deputy to him. Therefore, if the Khaleefah declares I have appointed so and so person as my delegated Wazir, or as my delegated assistant, or if He said to someone: ‘Be my deputy in what is assigned to me’ or any other wording to that effect, then the designated person would thereafter enjoy all the mandatory powers of the Khaleefah as deputy to him. Al-Mawardi, in his book Al Ahkam Al-Sultaniyya called this post ‘Wizarat-ut-Tafweed, and He described it as follows; “As for the delegated Wizarah, it means that the Imam appoints a Wazir, for whom He delegates the running of the affairs according to his own opinion and executing them according to his own Ijtihad.” This is the reality of the delegated assistant. He is an assistant to the Khaleefah in all the Khilafah functions. He has a mandate to perform any task related to the Khilafah, whether the Khaleefah delegated that particular task to Him or not, for He has been given a general delegation. However, He should report back to the Khaleefah for every task He performs, for He is an assistant and not a Khaleefah. Thus He cannot be independent of the Khaleefah but must report to Him about every action He undertakes no matter how big or small. This is because the running of the ruling affairs is commissioned to the Khaleefah.
शरीयत की दृष्टि में सहायक या वज़ीर की यह वास्तविकता लोकतांत्रिक व्यवस्था में मंत्रालय की वास्तविकता से पूरी तरह भिन्न है। इसका कारण यह है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मंत्रालय ही सरकार है, जो व्यक्तियों का एक समूह है और जो अपनी हैसियत से एक समूह के रूप में शासन चलाता है। इसका कारण यह है कि उनकी दृष्टि में शासन व्यक्ति का नहीं, बल्कि समूह का अधिकार है। दूसरे शब्दों में, इमारत सामूहिक है, एकल नहीं। अतः वास्तविक शासक, जिसे शासन के सभी अनिवार्य अधिकार प्राप्त होते हैं, वह सरकार है यानी मंत्रियों का समूह, और उनमें से कोई भी एक मंत्री पूर्ण शासन का अधिकार नहीं रखता, बल्कि शासन का अधिकार पूरे मंत्रिमंडल में साझा होता है। जहाँ तक एक मंत्री की बात है, उसे शासन के एक क्षेत्र का दायित्व सौंपा जाता है, जिसमें उसके पास अनिवार्य अधिकार होते हैं, जिन्हें सरकार सामूहिक रूप से उसे प्रदान करती है। जिन क्षेत्रों का दायित्व उसे नहीं सौंपा गया, वे मंत्रिमंडल के रूप में सरकार के हाथ में रहते हैं, न कि उस व्यक्ति के हाथ में। उदाहरण के लिए, न्याय मंत्री को अपने मंत्रालय के भीतर कुछ अनिवार्य अधिकार प्राप्त होते हैं, और अन्य मामले ऐसे हैं जिन पर उसका कोई अधिकार नहीं होता, बल्कि उनका निर्णय और संचालन पूरी सरकार द्वारा होता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की यही वास्तविकता है। इससे हम देखते हैं कि यह इस्लामी व्यवस्था के वज़ारत से स्पष्ट रूप से भिन्न है, और हम इस्लाम में प्रयुक्त शब्द वज़ीर, यानी सहायक, और लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रयुक्त शब्द वज़ीर, यानी मंत्री, के अर्थ में भी बड़ा अंतर पाते हैं। इसलिए इस्लामी व्यवस्था में वज़ीर और वज़ारत (मंत्री और मंत्रालय) का अर्थ है ख़लीफ़ा का सहायक उसके सभी कर्तव्यों में, बिना किसी अपवाद के, जिसमें वह ये कर्तव्य निभाता है और ख़लीफ़ा को जवाबदेह रहता है। वज़ारत एक एकल पद है जिसे एक ही व्यक्ति चलाता है, और यदि यह एक से अधिक व्यक्तियों को दिया जाए तो उनमें से हर एक को वही अनिवार्य अधिकार प्राप्त होंगे जो ख़लीफ़ा के पास हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विज़ारत (मंत्रालय), इसके विपरीत, वास्तव में एक समूह है, न कि कोई एक व्यक्ति, जहाँ हर मंत्री का अधिकार शासन के केवल एक विशेष क्षेत्र पर होता है। उसे पूरे अधिकार प्राप्त नहीं होते, बल्कि सीमित अधिकार होते हैं। उपरोक्त बातें इस्लाम में वज़ीर और विज़ारत की अवधारणाओं तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनकी अवधारणाओं के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं। फिर भी, लोकतांत्रिक व्यवस्था द्वारा प्रस्तुत वज़ीर और विज़ारत के अर्थ ही प्रचलित और व्यापक हैं, और इन शब्दों का उल्लेख होते ही लोगों के मन में तुरंत यही अर्थ आते हैं। इसलिए, किसी भी भ्रम को दूर करने और सारे अन्य अर्थों को छोड़कर शरीयत के सटीक अर्थ को निश्चित करने के लिए, ख़लीफ़ा के सहायकों को वज़ीर कहना और विज़ारत शब्द को बिना किसी प्रतिबंध के प्रयोग करना अनुचित होगा। बल्कि उन्हें मुआविन (सहायक) कहा जाना चाहिए, और वही सही अर्थ होगा। दूसरी ओर, वज़ीर और विज़ारत शब्दों का प्रयोग करते समय लोकतांत्रिक अर्थ को हटाने और केवल इस्लामी अर्थ को इंगित करने के लिए किसी प्रकार की सीमा निर्धारित की जानी चाहिए। इन सब से हम यह समझते हैं कि मुआविन वह व्यक्ति है जिसे राज्य के पूरे क्षेत्रों में राज्य के सभी कार्यों का अधिकार सौंपा गया हो। इसीलिए कहा जाता है: "ख़लीफ़ा मुआविन को अपने प्रतिनिधि के रूप में एक सामान्य अधिकार सौंपता है।" अतः मुआविन के कार्य की वास्तविकता यह है कि वह ख़लीफ़ा का नायब (प्रतिनिधि) है; यह नायबी व्यापक होनी चाहिए, जिसमें राज्य के सभी मामले शामिल हों, अर्थात वह एक सहायक शासक है।