10.4.7 निष्कर्ष
10.4.7 Conclusion
इस्लामी राज्य की न्यायिक व्यवस्था और दंड-विधान हर युग में लागू रहे, उस समय से जब पैग़म्बर ﷺ ने मदीना में पहला इस्लामी राज्य स्थापित किया। इसने लोगों के बीच के विवादों का निपटारा किया, समुदाय के वैध अधिकारों की रक्षा की, और यह सुनिश्चित किया कि शासन में बैठे लोग इस्लाम की शरीअत के अनुसार राज्य के नागरिकों को उनका हक़ दें। यह सब इसने उत्कृष्ट ढंग से किया, यहाँ तक कि इसके द्वारा संरक्षित लोगों को मिलने वाले न्याय और औचित्य को सभी ने स्वीकार किया।
The Judicial System and Punishments of the Islamic State were implemented throughout every period from the time of the Prophet (saw) in Madinah, when he established the first Islamic State. It settled the disputes between the people, protected the legitimate rights of the community, and ensured that those in authority gave the citizens of the State their dues in accordance with the Shari‘ah of Islam. All this it did in a superior manner, such that it was acknowledged by all, the justice and propriety which it conferred upon those who were protected by it.
लेकिन इस्लाम में न्यायपालिका को जो शक्ति और अधिकार प्राप्त है, वह कठोर सज़ाओं या लोगों पर अत्याचार पर आधारित नहीं है। इसकी शक्ति इस बात में निहित है कि यह इस्लामी अक़ीदे से निकलती है, जो जीवन में उठने वाली सभी समस्याओं का उत्तर देने में सक्षम है, और इसके क्रियान्वयन तथा इसके पालन को इबादत (उपासना) माना जाता है। इस प्रकार इतिहास ने दिखाया है कि न्यायपालिका को लोगों को सज़ा देने का सहारा बहुत कम मामलों में ही लेना पड़ा।