5.2 पितृसत्ता का तर्क
5.2 The Logic Of Patriarchy
मेरी समझ में न आने वाली बातों में से एक यह है: पितृसत्ता के उस विचार को, जिसका नारीवाद विरोध करता है, मैं कभी समझ नहीं पाया। इतिहास में अनेक पितृसत्तात्मक संस्कृतियों और सभ्यताओं में पुरुष क्यों व्यवस्थित रूप से अपनी ही समकक्षों, यानी अपनी पत्नियों, बहनों और माताओं, पर अत्याचार करते रहे?
One of the things I never understood about the idea of patriarchy that feminism opposes is this: Why would men throughout history across numerous patriarchal cultures and civilizations systematically oppress their counterparts, i.e., their wives, their sisters, their mothers?
जिसपर ज़ुल्म किया जाए, उसे उसकी ज़रूरत की चीज़ों से रोकना, उसका हक़ न देना, और दूसरे तरीक़ों से उसे नुक़सान पहुँचाना - यही ज़ुल्म है। मैं समझ सकता हूँ कि अलग-अलग हालात में ऐसा कैसे होता है, जैसे घरेलू हिंसा के मामलों में जब पति पत्नी पर ज़ुल्म करता है, वग़ैरह। लेकिन मैं यह नहीं समझ पाता कि यह पूरी दुनिया में या किसी पूरे समाज में कैसे हो सकता है। क्यों? क्योंकि मर्द भी समझदार हैं और औरतें भी। मेरा मतलब यह है कि अपने ही घर में इस तरह का ज़ुल्म चलाना पूरी तरह बेतुका होगा। मर्द अपनी साथी औरतों को अपाहिज बनाकर और उनकी ज़रूरतों को लगातार रोककर क्या फ़ायदा उठाते हैं? यह तो चल ही नहीं सकता। क्या आपने कभी ऐसा परिवार देखा है जहाँ शौहर/बाप (या बीवी/माँ) ज़ालिम हो, सारा क़ाबू अपने हाथ में रखे, और लोहे की मुट्ठी से हुकूमत करे? ऐसे हालात कभी टिकाऊ नहीं होते, और उसमें रहने वाले सब लोग दुखी होते हैं और निकलने का रास्ता ढूँढते रहते हैं। क्या हमें यह मानना चाहिए कि यह सिर्फ़ आज के लोगों ने समझा कि घर में लगातार ज़ुल्म (नाइंसाफ़ी) न तो बेहतर है और न ही टिकाऊ? और यह सोच भी कि हज़ारों सालों से मर्द औरतों पर ज़ुल्म करने की साज़िश करते आए हैं और औरतें उसकी लगातार शिकार रहीं, औरतों की समझ और सलाहियत की बेइज़्ज़ती है। क्या आज की औरतें ही इतनी रौशन-ख़याल हैं कि समझ सकें कि उन पर पितृसत्ता का ज़ुल्म हो रहा है और उसके ख़िलाफ़ लड़ सकें, जबकि पुरानी औरतें इतनी बेवक़ूफ़ थीं कि यह देख ही न सकीं या बदलाव न ला सकीं? यह बात समझ में नहीं आती।