अनुच्छेद 147
Article 147
राज्य को यह अधिकार है कि यदि बैतुल-माल (राजकोष) में धन पर्याप्त न हो, तो वह कर लगा सके, उन कार्यों के लिए जिन्हें शरीयत ने उम्मत पर अनिवार्य किया है, क्योंकि ऐसी स्थिति में उनके वित्तपोषण की ज़िम्मेदारी उम्मत पर स्थानांतरित हो जाती है। किंतु राज्य को उन कार्यों के लिए कर लगाने का कोई अधिकार नहीं है जिन्हें उम्मत पर अनिवार्य नहीं किया गया है। इसलिए अदालतों या विभागों के लिए शुल्क वसूलना, या किसी भी सेवा को पूरा करने के बदले शुल्क लेना, जायज़ नहीं है।
The State has the right to impose taxes in order to undertake anything that the Shari’ah obligated upon the Ummah if the funds in the Bayt Al-Mal were insufficient since the obligation for funding it would be transferred onto the Ummah. The State has no right to impose a tax for the sake of whatever is not obligatory upon the Ummah to undertake, and so it is not permitted to collect fees for the courts or departments or to fulfil any service.
इसका प्रमाण वही है जो पिछले लेख के पहले मुद्दे के लिए बताया गया था, कि शरीयत ने सामान्य आय को परिभाषित किया है, और रसूल ﷺ ने कर नहीं लगाए तथा चुंगी (सीमा-शुल्क) लेने से मना किया, क्योंकि वह भी एक कर है, और इसलिए यह निषेध हर प्रकार के कर को अपने भीतर समेटता है। इसमें यह भी बताया गया था कि यदि बैतुल-माल में उतना धन न हो जितना उन चीज़ों पर खर्च करने के लिए चाहिए जिन्हें शरीयत ने बैतुल-माल और उम्मत दोनों पर अनिवार्य किया है, तो यह दायित्व उम्मत पर आ जाता है; किंतु जिन चीज़ों का दायित्व शरीयत ने केवल बैतुल-माल पर डाला है, उनका दायित्व उम्मत पर स्थानांतरित नहीं होता, भले ही बैतुल-माल में उनके लिए कुछ न बचा हो, बल्कि उनका भुगतान तब तक टाला जाता है जब तक उनके लिए धन न मिल जाए, और उम्मत पर कोई कर नहीं लगाया जाता। इसी तरह, जो चीज़ें उम्मत पर अनिवार्य नहीं थीं, उनके लिए उम्मत पर सीधे कर नहीं लगाए जाते, और इसी प्रकार अप्रत्यक्ष कर भी नहीं लगाए जाते; अतः अदालतों, विभागों, आयात-मुहरों, परमिट शुल्कों, या इसी प्रकार की किसी भी चीज़ के लिए कोई शुल्क वसूल नहीं किया जाता। जहाँ तक डाक-टिकटों की बात है, वे अप्रत्यक्ष कर नहीं माने जाते, बल्कि वे पत्रों को पहुँचाने का मूल्य हैं, जो जायज़ है। इसलिए ऐसा कोई अप्रत्यक्ष कर नहीं वसूला जाना चाहिए जिसके पीछे कोई ऐसी चीज़ हो जिसे शरीयत ने मुसलमानों पर अनिवार्य नहीं किया, क्योंकि वे बिल्कुल प्रत्यक्ष करों की तरह हैं, उनके बीच कोई अंतर नहीं, और उम्मत पर उन्हें लगाना जायज़ नहीं है।