अनुच्छेद 3
Article 3
ख़लीफ़ा कुछ विशिष्ट शरीअत के हुक्मों को अपनाता है, जिन्हें वह संविधान और क़ानूनों के रूप में लागू करता है। जब वह किसी शरीअत के हुक्म को अपनाता है, तो यही हुक्म वह शरीअत का हुक्म बन जाता है जिस पर अमल करना ज़रूरी है, और यह एक बाध्यकारी क़ानून बन जाता है जिसका हर नागरिक खुले और छुपे दोनों तरीक़ों से पालन करना अनिवार्य है।
The Khalifah adopts specific Shari’ah rules which he will enact as a constitution and laws. If he adopts a Shari’ah rule, this rule alone becomes the Shari’ah rule that must be acted upon and it becomes a binding law that every citizen must obey openly and privately.
इस अनुच्छेद का प्रमाण सहाबा का इज्मा' (सर्वसम्मति) है कि ख़लीफ़ा को विशिष्ट शरीअत के हुक्मों को अपनाने का अधिकार है। इसी तरीके से यह भी स्थापित हुआ है कि ख़लीफ़ा द्वारा अपनाए गए हुक्मों पर अमल करना अनिवार्य है। मुसलमान के लिए जायज़ नहीं कि वह ख़लीफ़ा द्वारा अपनाए गए हुक्मों के अलावा किसी हुक्म पर अमल करे, भले ही वे शरई हुक्म हों जिन्हें मुज्तहिदीन (इस्लामी विद्वानों) में से किसी ने अपनाया हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि अल्लाह का वह हुक्म जो सभी मुसलमानों पर विधिवत रूप से लागू होता है, वही है जिसे ख़लीफ़ा अपनाता है। सही मार्गदर्शन प्राप्त ख़ुलफ़ा इसी तरीके पर चले; उन्होंने अनेक विशिष्ट हुक्मों को अपनाया और उनके लागू किए जाने का आदेश दिया। इस प्रकार मुसलमान, जिनमें सभी सहाबा शामिल थे, इन हुक्मों पर अमल करते थे और अपने निजी इज्तिहाद (इस्लामी प्रमाणों से निकाली गई इस्लामी राय) को छोड़ देते थे। उदाहरण के लिए, अबू बक्र (रज़ि.) ने तलाक़ के मामले में यह हुक्म अपनाया कि यदि तीन तलाक़ एक ही बैठक में दी जाएँ तो उन्हें एक तलाक़ माना जाएगा। उन्होंने मुसलमानों में धन बाँटने के मामले में भी यह हुक्म अपनाया कि धन मुसलमानों में बराबर-बराबर बाँटा जाए, इस्लाम में वरिष्ठता या किसी अन्य बात का ध्यान न रखा जाए। मुसलमानों ने भी उनका अनुसरण किया और क़ाज़ियों तथा वालियों (गवर्नरों) ने उनके अपनाए हुए हुक्मों को लागू किया। जब उमर (रज़ि.) ने पद सँभाला, तो उन्होंने इन्हीं दो मामलों में अबू बक्र (रज़ि.) से भिन्न राय अपनाई; उन्होंने यह हुक्म लागू किया कि तीन तलाक़ को तीन माना जाएगा, और उन्होंने धन को मुसलमानों में उनकी इस्लाम में वरिष्ठता और उनकी ज़रूरतों के अनुसार बाँटा, न कि बराबर-बराबर। मुसलमानों ने उनका विधिवत अनुसरण किया और क़ाज़ियों तथा गवर्नरों ने उनके अपनाए हुए हुक्मों को लागू किया। फिर उमर (ra) ने एक नियम अपनाया, जिसके अनुसार युद्ध में जीती गई भूमि बैतुल-माल (राज्य के खज़ाने) की संपत्ति होगी, न कि लड़ने वालों की, और भूमि उसके मालिकों के पास ही रहेगी और उसे लड़ाकों में या मुसलमानों में बाँटा नहीं जाएगा। गवर्नरों और न्यायाधीशों ने उनके अपनाए हुए इस नियम का पालन किया और उसे लागू किया।