अनुच्छेद 39
Article 39
ख़लीफ़ा का कार्यकाल निश्चित नहीं होता; जब तक ख़लीफ़ा शरीअत को संरक्षित रखता है, उसके नियमों को लागू करता है, और राज्य के कामों को चलाने में सक्षम है, तब तक वह ख़लीफ़ा बना रहता है, बशर्ते उसकी स्थिति ऐसी न हो जाए जो उसे राज्य के नेतृत्व से हटाने वाली हो। यदि उसकी स्थिति इस प्रकार बदल जाती है, तो उस समय उसे उसके पद से हटाना अनिवार्य हो जाता है।
The Khalifah does not have a fixed term of office; as long as the Khalifah preserves the Shari’ah and he implements its rules, and is capable of carrying out the affairs of the State, he remains as a Khalifah as long as his situation does not change to one that would remove him from the leadership of the State. If his state changes in this manner, then it is obligatory to remove him from his position at that time.
इसका प्रमाण यह है कि नुसूस (हदीसों) में वर्णित बैअत का पाठ निरपेक्ष (मुतलक़) रूप में आया है और किसी विशेष अवधि से सीमित नहीं है। इसके अतिरिक्त, सही मार्गदर्शन प्राप्त ख़ुलफ़ाअ में से प्रत्येक की बैअत उसी निरपेक्ष रूप में हुई, जो हदीसों में वर्णित बैअत थी, और उनकी अवधि निश्चित नहीं की गई थी। अतः उनमें से प्रत्येक ने बैअत होने के समय से लेकर मृत्यु तक ख़िलाफ़त का दायित्व उठाया। यह सहाबा का इज्मा' है कि ख़िलाफ़त की कोई निश्चित अवधि नहीं है, बल्कि वह निरपेक्ष है, और जिसकी बैअत हो जाए वह मृत्यु तक ख़लीफ़ा बना रहता है। यह तब तक है जब तक ख़लीफ़ा के साथ ऐसी कोई बात न हो जाए जो उसे पद से हटा दे, या उस समय उसे हटाना अनिवार्य कर दे। परंतु यह ख़िलाफ़त की अवधि पर कोई सीमा नहीं है, बल्कि ऐसी घटना है जिससे ख़िलाफ़त की शर्तों में कमी आ गई हो, क्योंकि शरई नुसूस और सहाबा के इज्मा' द्वारा निर्धारित बैअत के रूप ने ख़िलाफ़त को अनिश्चित अवधि का बना दिया है। फिर भी, वह उस वचन से सीमित है जिस पर उसकी बैअत हुई थी, अर्थात् किताब और सुन्नत, दूसरे शब्दों में शरीअत का लागू करना। यदि उसने शरीअत की रक्षा नहीं की या उसे लागू नहीं किया, तो वह खुला कुफ़्र प्रकट करेगा, और हदीस के आधार पर उसके विरुद्ध उम्मत पर प्रतिरोध करना अनिवार्य हो जाएगा।