अनुच्छेद 65
Article 65
ख़लीफ़ा सेना का कमांडर होता है और वह चीफ़ ऑफ़ जनरल स्टाफ़, हर ब्रिगेड के लिए एक जनरल, और हर डिवीज़न के लिए एक कमांडर नियुक्त करता है। सेना के बाक़ी पद ब्रिगेडियरों और कमांडरों द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। जनरल स्टाफ़ में किसी व्यक्ति की नियुक्ति उसकी सैन्य विशेषज्ञता के स्तर के अनुसार होती है और यह चीफ़ ऑफ़ जनरल स्टाफ़ द्वारा की जाती है।
The Khalifah is the Commander of the Army and he appoints the Chief of General Staff, a general for each brigade, and a commander for every division. The remaining ranks in the Army are appointed by the brigadiers and commanders. The appointment of a person in the General Staff is according to his level of military expertise and is carried out by the Chief of General Staff.
ख़लीफ़ा पूरी दुनिया के सभी मुसलमानों का सामान्य नेता है, ताकि शरीअत के नियमों को स्थापित किया जाए और इस्लाम को बाक़ी लोगों तक पहुँचाया जाए। दुनिया भर में इस्लाम पहुँचाने का मुख्य तरीक़ा जिहाद है, इसलिए ज़रूरी है कि ख़लीफ़ा स्वयं जिहाद करे, क्योंकि ख़लीफ़ा का अनुबंध (बैअत) उसी के ऊपर व्यक्तिगत रूप से है, और इसलिए किसी और के लिए इसे करना जायज़ नहीं है। इसी कारण जिहाद के मामलों का प्रबंधन ख़लीफ़ा के लिए ख़ास है, और किसी और के लिए इसे करना जायज़ नहीं है। हालाँकि हर मुसलमान जिहाद में भाग लेता है, फिर भी जिहाद में भाग लेना और जिहाद का प्रबंधन करना दो अलग चीज़ें हैं। जिहाद हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है, लेकिन जिहाद का प्रबंधन केवल ख़लीफ़ा के लिए है, किसी और के लिए नहीं। ख़लीफ़ा किसी को अपनी ओर से वह काम सौंप सकता है जो उस पर फ़र्ज़ किया गया है, बशर्ते वह व्यक्ति ख़लीफ़ा की निगरानी और देखरेख में रहे। उसे पूरी तरह स्वतंत्र छोड़ देना, बिना निगरानी और देखरेख के, जायज़ नहीं है। यहाँ ख़लीफ़ा की जो निगरानी है, वह उस तरह की रिपोर्टिंग जैसी नहीं है जो सहायक उसे देता है; बल्कि जिसे उसने सौंपा है वह सीधे उसके आदेशों और प्रत्यक्ष देखरेख के अधीन रहता है। सेना का नेतृत्व जिसे वह चाहे दे सकता है, इस शर्त पर कि वह ख़लीफ़ा के नियंत्रण और उसकी प्रत्यक्ष देखरेख में हो। उसके लिए किसी को ऐसे नियुक्त करना जायज़ नहीं है जिस पर वह प्रत्यक्ष निगरानी और नियंत्रण न रखे, और यह निगरानी केवल दिखावटी नहीं होनी चाहिए। यह इसलिए है क्योंकि ख़िलाफ़त का अनुबंध उसी के ऊपर व्यक्तिगत रूप से है, और इसलिए जिहाद के मामलों का प्रबंधन करना उस पर अनिवार्य है। इसके अनुसार, अन्य गैर-इस्लामी व्यवस्थाओं में जो कहा जाता है कि राष्ट्राध्यक्ष सेना का सेनापति (Commander-in-Chief) होता है, और यह नेतृत्व केवल प्रतीकात्मक होता है जबकि सेना के प्रमुख के रूप में एक अलग, स्वतंत्र सेनापति नियुक्त किया जाता है, इस्लामी दृष्टिकोण से अमान्य माना जाता है, और यह ऐसी बात है जिसे शरीअत स्वीकार नहीं करती। बल्कि शरीअत यह अनिवार्य करती है कि ख़लीफ़ा ही सेना का वास्तविक (व्यावहारिक) सेनापति हो।