14.3 मुनाज़रात (विवाद और बहस) का इस्लामी फ़िक़्ह पर प्रभाव
14.3 The Effect Of Disputes And Debates (munazarat) On Islamic Jurisprudence
सहाबा के दौर में दो घटनाएँ घटीं: पहली, ‘उस्मान से संबंधित गृहयुद्ध (फ़ितना), और दूसरी, ‘उलमा के बीच हुई बहसें। इनके परिणामस्वरूप शरई दलीलों की क़िस्मों पर मतभेद पैदा हुए, जिनसे नए राजनीतिक समूह उभरे, और उन्हीं से विभिन्न फ़िक़ही मकतबे-फ़िक्र अस्तित्व में आए। इसका कारण यह था कि ‘उस्मान की हत्या के बाद ‘अली इब्न अबी तालिब को ख़िलाफ़त की बैअत दी गई, जिनसे मु‘आविया इब्न अबी सुफ़यान ने विवाद किया, और दोनों पक्षों के बीच युद्ध छिड़ गया, जो दो मध्यस्थों के फ़ैसले पर समाप्त हुआ। इसी से ऐसे नए राजनीतिक समूह बने जो पहले मौजूद नहीं थे। इन समूहों की अलग राय बनी। यह राय पहले ख़लीफ़ा और ख़िलाफ़त के बारे में राजनीतिक रूप में शुरू हुई, फिर शेष अधिकांश अहकाम को भी अपने दायरे में ले आई। मुसलमानों का एक समूह उभरा जो ‘उस्मान से उनकी ख़िलाफ़त की नीतियों के कारण घृणा करता था, ‘अली के मध्यस्थता (तहकीम) स्वीकार करने से नाराज़ था, और मु‘आविया से इस बात पर क्रुद्ध था कि उन्होंने ज़बरदस्ती ख़िलाफ़त हथिया ली। इसलिए उन्होंने इन सभी के विरुद्ध बग़ावत की। उनका मत था कि मुसलमानों को मुसलमानों के ख़लीफ़ा की बैअत केवल अपनी स्वेच्छा से करनी चाहिए, बिना किसी दबाव या ज़ोर-ज़बरदस्ती के। जो भी ख़िलाफ़त के योग्य हो, वह ख़लीफ़ा बन सकता है; मुसलमानों को उसकी बैअत करनी चाहिए, और जब तक वह पुरुष, मुसलमान और न्यायप्रिय हो, ख़िलाफ़त उसी के साथ बैअत द्वारा अनुबंधित हो जाएगी, भले ही वह एक हब्शी ग़ुलाम क्यों न हो। और ख़लीफ़ा की आज्ञापालन तभी अनिवार्य है जब उसका मामला क़ुरआन और सुन्नत की सीमाओं के भीतर हो। ये लोग उन हदीसों को स्वीकार नहीं करते थे जो ‘उस्मान, ‘अली, मु‘आविया से वर्णित हों, या जो किसी ऐसे सहाबी द्वारा वर्णित हों जो इनमें से किसी एक का समर्थक रहा हो। उन्होंने उनकी सभी हदीसों, रायों और फ़तवों को अस्वीकार कर दिया, और जिन्हें वे स्वीकार करते थे उनसे वर्णित बातों को प्राथमिकता दी। वे केवल अपनी राय और अपने ही विद्वानों की बातों को मानते थे, दूसरों को छोड़कर। उनकी अपनी फ़िक़्ह थी और उन्हें ख़वारिज कहा जाता है। मुसलमानों में से एक और समूह उठा जो ‘अली इब्न अबी तालिब से प्रेम करता था और उनकी संतान से मोहब्बत रखता था। उनका मत था कि ख़िलाफ़त का उनसे और उनकी संतान से बढ़कर किसी और पर अधिकार है, और उनका मानना था कि वही वसी (न्यासी) थे जिन्हें रसूल ﷺ ने अपने बाद ख़िलाफ़त सौंपी थी। उन्होंने रसूल ﷺ से वर्णित कई हदीसों को अस्वीकार कर दिया जिन्हें अधिकांश सहाबा ने रिवायत किया था। वे सहाबा के विचारों और उनके फ़तवों पर निर्भर नहीं रहते थे। वे केवल उन हदीसों पर भरोसा करते थे जो उनके इमामों और नबी ﷺ के परिवार से वर्णित थीं, और उन्हीं से आने वाले फ़तवों पर अमल करते थे। उनकी अपनी फ़िक़्ह थी और वे शिया कहलाते हैं। जहाँ तक अधिकांश मुसलमानों की बात है, उन्होंने उपरोक्त समूहों द्वारा अपनाए गए मतों को नहीं अपनाया। उनका मत था कि यदि क़ुरैश में से कोई ख़लीफ़ा मिल जाए तो उसी के हाथ पर बैअत की जानी चाहिए। उन्होंने बिना किसी अपवाद के सभी सहाबा के प्रति बड़ा सम्मान, प्रेम और निष्ठा प्रकट की। और उनके बीच के मतभेदों को उन्होंने शरई अहकाम के उन ज़न्नी (अनुमानित) मसलों में इज्तिहाद समझा जो ईमान या कुफ़्र से संबंधित नहीं थे। वे किसी भी सहाबी से वर्णित हर प्रामाणिक हदीस को, सहाबा के बीच बिना किसी भेदभाव के, प्रमाण के रूप में स्वीकार करते थे, क्योंकि उनके लिए सभी सहाबा विश्वसनीय थे, और वे सहाबा के सभी फ़तवों और रायों को स्वीकार करते थे। इसी कारण, शासन, इस्तिंबात (अहकाम निकालने के तरीक़े) और प्रमाणों के प्रकारों में मतभेद होने से, कई विषयों पर उनके अहकाम अन्य राजनीतिक समूहों के अहकाम से मेल नहीं खाते थे।
