इसका अर्थ यह है कि किसी मुसलमान को किसी काफ़िर के बदले में क़त्ल नहीं किया जाएगा, और न ही उस ज़िम्मी (अहद वाले) को किसी काफ़िर के बदले में क़त्ल किया जाएगा। चूँकि ज़िम्मी भी काफ़िर है, इससे लाज़िम आता है कि हदीस में "काफ़िर" शब्द का अर्थ "हरबी" (युद्धरत काफ़िर) हो, यानी अहद वाला ज़िम्मी किसी हरबी काफ़िर के बदले में क़त्ल नहीं किया जाएगा। अतः हदीस का अर्थ यह है कि मुसलमान किसी हरबी काफ़िर के बदले में क़त्ल नहीं किया जाएगा, और न ही ज़िम्मी किसी हरबी काफ़िर के बदले में क़त्ल किया जाएगा; और इसकी समझ यह है कि मुसलमान को किसी ग़ैर-हरबी काफ़िर के बदले में क़त्ल किया जाएगा, और ज़िम्मी को भी किसी ग़ैर-हरबी काफ़िर के बदले में क़त्ल किया जाएगा। ज़िम्मी काफ़िर है, और उसका उस मुसलमान की तरह होना जो किसी काफ़िर के बदले में क़त्ल नहीं किया जाता, इस बात का संकेत है कि हदीस में "काफ़िर" शब्द से मुराद हरबी काफ़िर है, न कि ज़िम्मी। इसकी पुष्टि इस रिवायत से होती है कि रसूलुल्लाह ﷺ के पास एक मुसलमान लाया गया जिसने एक यहूदी को क़त्ल किया था, तो आपने उसे क़त्ल कर दिया। इस समझ के भेद से हुक्म में भी भेद आ जाता है। यही बात बहुत-सी आयतों और हदीसों पर लागू होती है। किसी एक हुक्म में मतभेद होने से मुसलमान पर अनिवार्य हो जाता है कि उनमें से एक मत को अपनाए, क्योंकि ये सब शरीअत के हुक्म हैं और किसी एक व्यक्ति के संबंध में अल्लाह का हुक्म एक से अधिक नहीं हो सकता। अतः उनमें से एक हुक्म को निर्धारित करके अपनाना आवश्यक है, और मुसलमान का शरीअत के हुक्मों को अपनाना अनिवार्य है, और किसी भी तरह इससे बचने का कोई रास्ता नहीं है, जब कोई व्यक्ति कर्म करता है। किसी एक हुक्म पर अमल करने का मात्र दायित्व, चाहे वह वाजिब हो, मंदूब हो, हराम हो, मकरूह हो या मुबाह हो, किसी विशेष हुक्म को अपनाना अनिवार्य करता है। इसलिए हर मुसलमान पर अनिवार्य है कि वह अपनाए, चाहे वह मुज्तहिद हो या मुक़ल्लिद (अनुयायी), ख़लीफ़ा हो या न हो। जब वह किसी विशेष हुक्म को अपनाता है, तो यह शरई हुक्म उस पर अल्लाह का हुक्म बन जाता है, और उस पर अनिवार्य हो जाता है कि केवल उसी के अनुसार अमल करे, लोगों को उसकी शिक्षा दे और उसी के आधार पर इस्लाम की ओर बुलाए। मुसलमान द्वारा किसी हुक्म को अपनाने का अर्थ यह है कि वह उसके अनुसार अमल करे, दूसरों को उसकी शिक्षा दे और जब वह इस्लाम के हुक्मों और विचारों की ओर बुलाए तो उसकी ओर भी बुलाए। जब मुसलमान किसी विशेष हुक्म को अपना लेता है तो वही हुक्म उस पर अल्लाह का हुक्म बन जाता है, और उसके लिए उसे छोड़ना जायज़ नहीं, सिवाय तीन सूरतों के: पहली, जब उस पर उस राय के कमज़ोर सबूत का स्पष्ट होना जाहिर हो जाए और उसके सबूत से अधिक मज़बूत सबूत सामने आ जाए, जो इस बात का संकेत करे कि अल्लाह का हुक्म वही है जो मज़बूत सबूत बताता है। इस स्थिति में उस पर वाजिब है कि जो उसने अपनाया था उसे छोड़ दे और नई राय अपना ले, क्योंकि वही अब उस पर अल्लाह का हुक्म बन चुकी है। दूसरी: यदि उसे यह महसूस होने लगे कि नई राय को उससे अधिक जानकार व्यक्ति ने अपनाया है, जो इस्तिंबात (हुक्म निकालने) में उससे अधिक दक्ष और सटीक है, या शरीअत का अधिक व्यापक ज्ञान रखता है। इस स्थिति में उसके लिए जायज़ है कि जो उसने अपनाया था उसे छोड़कर कुछ और अपना ले, उस बात के आधार पर जो प्रसिद्ध सहाबा के बारे में साबित है कि उन्होंने अपनी रायों को छोड़ा और दूसरों की राय अपनाई। अबू बक्र (रज़ि.) ने अली (रज़ि.) की राय अपनाई और अपनी राय छोड़ दी, और उमर (रज़ि.) ने अली (रज़ि.) की राय अपनाई और अपनी राय छोड़ दी। तीसरी: यदि उद्देश्य मुसलमानों के दृष्टिकोण को एक राय पर एकत्र करना हो। इस स्थिति में मुसलमान के लिए जायज़ है कि जो राय उसने अपनाई थी उसे छोड़कर वह राय अपना ले जिस पर वह मुसलमानों के दृष्टिकोण को एकत्र करना चाहता है, उस बात के आधार पर जो उस्मान (रज़ि.) के बारे में साबित है कि उन्होंने लोगों से अल्लाह की किताब, उसके रसूल ﷺ की सुन्नत और उनके बाद के दो शैखों, अबू बक्र और उमर की राय पर बैअत लेना स्वीकार किया। सहाबा ने उनके उस कार्य पर सहमति दी, जो यह था कि उन्होंने जो अपनाया था उसे छोड़कर वह अपनाया जो अबू बक्र (रज़ि.) और उमर (रज़ि.) ने अपनाया था। इन परिस्थितियों में मुसलमान जिसे उसने अपनाया था उसे छोड़कर कोई दूसरा मत अपना सकता है; इन परिस्थितियों के अलावा उसके लिए किसी भी प्रकार से उसे छोड़ना जायज़ नहीं है, क्योंकि शरीअत ने हर व्यक्ति को संबोधित किया है, और हर मुसलमान पर यह अनिवार्य है कि वह उसी को अपनाए जिस तक वह इज्तिहाद या तक़लीद के द्वारा पहुँचा है। एक बार उसने जिसे अपनाया, तो वह उसी पर बाध्य है, सिवाय उन परिस्थितियों के जिन्हें शरई दलील ने अलग रखा हो।
Its meaning is that a Muslim is not killed for a disbeliever, nor is the covenanted person killed for a disbeliever. Since the covenanted person is a disbeliever, it necessitates that the word disbeliever means belligerent i.e. the covenanted disbeliever is not killed for a belligerent disbeliever. So the hadith’s meaning is that the Muslim is not killed for a belligerent disbeliever, nor is a covenanted person killed for a belligerent disbeliever; its understanding is that the Muslim is killed for a non-belligerent disbeliever and the covenanted person is killed for a non belligerent disbeliever. The covenanted person is a disbeliever and his being like the Muslim who is not killed for a disbeliever indicated that the meaning of the word “disbeliever” in the hadith is the belligerent disbeliever not the dhimmi. This is strengthened by what is narrated that there was a Muslim brought to the Messenger of Allah (saw) who had killed a Jew so he killed him. With this variation in understanding, there is variation in the rule. The same applies to many ayat and ahadith. The difference of opinions in one rule makes it inevitable upon the Muslim to adopt one opinion among them as they are all Shari’ah rules and the rule of Allah in respect of one person cannot be more than one. Therefore it is inevitable to specify one rule among them to adopt, thus the Muslim’s adoption of the Shari’ah rules is essential and there is absolutely no escape from this in any way when one performs the action. The mere obligation of acting upon one rule whether it is obligatory or recommended or prohibited or disliked or allowed obliges the adoption of a specific rule. Therefore it is obligatory upon each Muslim to adopt whether he is a mujtahid or a follower (muqallid), Khalifah or not. When he adopts a specific rule, this Shari’ah rule becomes the rule of Allah upon him and it becomes obligatory upon him to act according to it alone, teach it to people and call to Islam based upon it. This is because the meaning of the Muslim’s adoption of the rule is to act according to it, teaching it to others and calling to it when he calls to the rules and thoughts of Islam. When the Muslim adopts a specific rule this rule becomes in itself the rule of Allah upon him, and it is not allowed for him to leave it except in three (cases): Firstly, if the weakness of the evidence becomes clear to him and there appears stronger evidence than its evidence which is attributed to him that the rule of Allah is that indicated by the stronger evidence. In this case, it is obliged upon him to leave what he adopted and to adopt the new opinion since it has become the rule of Allah upon him. Secondly: If he begins to think that the new opinion was adopted by one more knowledgeable than him in deduction and more precise in deduction or has more comprehensive knowledge about the Shar’a. In this case, it is allowed for him to leave what he adopted and adopt something else due to what is proved about the famous Sahabah who left their opinions and adopted the opinion of others. Abu Bakr (ra) adopted Ali’s (ra) opinion and left his opinion, and Umar (ra) adopted Ali’s (ra) opinion and left his own. Thirdly: If the intention is to unify the Muslims’ standpoint upon one opinion. In this case, it is allowed for the Muslim to leave the opinion he adopted and adopt the opinion which he wishes to unify the Muslims’ standpoint due to what was proved about Uthman who accepted to take the pledge from the people upon the Book of Allah and the Sunnah of His Messenger and the opinion(s) of the two Sheikhs after him, Abu Bakr and Umar. The Sahabah consented to him doing what he did which is leaving what he adopted and adopting what Abu Bakr (ra) and Umar (ra) had adopted. In these situations, the Muslim leaves what he adopted and adopt something else; apart from these (situations), he is not allowed to leave it in any way since the Shari’ah addressed each individual and it is upon each Muslim to adopt what he reached via ijtihad or following (taqleed). Once he adopted, he is obliged upon what he adopted save the situations excluded by the Shari’ah evidence.
यह हर व्यक्ति के अपने स्वयं के साथ अपने संबंधों को व्यवस्थित करने से संबंधित है। जहाँ तक ख़लीफ़ा द्वारा उम्मत के मामलों की देखभाल करने, शासक की ज़िम्मेदारियाँ सँभालने और लोगों पर अल्लाह के आदेश स्थापित करने की बात है, इसमें कोई संदेह नहीं कि उसे लोगों के मामलों को उन्हीं के अनुसार चलाने के लिए विशिष्ट नियम अपनाने होंगे। उसे उन सभी मामलों में भी विशिष्ट नियम अपनाने होंगे जो सभी मुसलमानों के लिए सामान्य हैं, जैसे शासन और सत्ता के मामले, ज़कात, ख़राज (भूमि कर), विदेशी संबंध और वे सब जो राज्य और शासन की एकता से जुड़े हैं। ख़लीफ़ा द्वारा इन परिस्थितियों में अपनाना वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य है, क्योंकि यह उन कर्मों से संबंधित अनिवार्य विषय है जो वह एक मुसलमान की हैसियत से करता है, जो अपने हर कर्म को एक विशिष्ट नियम के अनुसार चलाने के लिए बाध्य है, और वह नियम है उस पर लागू अल्लाह का आदेश। इसमें व्यक्तिगत और सार्वजनिक मामलों में कोई अंतर नहीं है। शासन और सत्ता के मामले उन मूल कार्यों में आते हैं जिनमें मामलों की देखभाल करते हुए उसके लिए एक विशिष्ट नियम के अनुसार चलना अनिवार्य है। जहाँ तक राज्य की एकता से संबंधित बातों का प्रश्न है, उन्हें एक विशिष्ट नियम के अनुसार चलाना ज़रूरी है, क्योंकि राज्य की एकता अनिवार्य है और उसकी ओर ले जाने वाला हर कर्म भी अनिवार्य है। अतः जो कुछ इससे संबंधित है उसके लिए एक नियम अपनाना अनिवार्य है, वैकल्पिक नहीं। इसके अलावा जो कुछ है, उसमें ख़लीफ़ा के लिए जायज़ है कि वह लोगों को उन पर अमल करने के लिए बाध्य करने हेतु विशिष्ट नियम अपनाए, और यह भी जायज़ है कि वह ऐसा न अपनाए। वह इस मामले में वही करेगा जिसे वह मुसलमानों की भलाई, इस्लाम के प्रसार को मज़बूत करने, उसके नियमों की शिक्षा, शासन के न्याय और सत्ता की मज़बूती के लिए अधिक लाभकारी समझे। अबू बक्र (रज़ि.) ने शरीअत के ऐसे नियम अपनाए जिन पर उन्होंने लोगों को अमल करने के लिए बाध्य किया, और उनके बाद उमर (रज़ि.), उस्मान (रज़ि.) और अली (रज़ि.) ने भी ऐसे नियम अपनाए जिन पर उन्होंने लोगों को अमल करने के लिए बाध्य किया। सहाबा किराम ने अपने पूरे दौर में इस पर ख़ामोशी इख़्तियार की, और उनमें से किसी के बारे में यह सुना नहीं गया कि उन्होंने अहकाम अपनाने, उन्हें लोगों पर लागू करने, और ख़लीफ़ा द्वारा अपनाए गए अहकाम पर अमल न करने को रद्द किया हो; हालाँकि यह उन चीज़ों में से है जो रद्द की जाती हैं, क्योंकि इसमें लोगों को उन अहकाम को छोड़ने पर मजबूर करना है जो उन्होंने अपनाए हैं और जो उन पर अल्लाह (सुब्हानहू व तआला) के अहकाम हैं। अतः यह सहाबा का इज्माअ है कि ख़लीफ़ा विशेष अहकाम अपना सकता है और लोगों को उन पर अमल करने का हुक्म दे सकता है। इसलिए यदि ख़लीफ़ा कुछ विशेष अहकाम अपनाता है, चाहे वे उन चीज़ों में से हों जिन्हें अपनाना उस पर वाजिब है या उन चीज़ों में से जिन्हें अपनाने की उसे इजाज़त है, तो उसकी प्रजा में से हर मुसलमान पर वाजिब है कि वह इसी हुक्म के अनुसार अमल करे और उस हुक्म पर अमल छोड़ दे जिसे उसने पहले अपनाया था। इसका कारण यह है कि जो कुछ ख़लीफ़ा ने अपनाया वह अमल के लिहाज़ से उस पर अल्लाह का हुक्म बन गया। उसके लिए उसके ख़िलाफ़ अमल करना जायज़ नहीं; बल्कि उसके लिए वाजिब है कि केवल उसी के अनुसार अमल करे, भले ही वह उसकी अपनी राय के विपरीत हो और भले ही उसकी नज़र में वह कमज़ोर दलील पर आधारित हो। यह इस वजह से है कि सहाबा के इज्माअ ने यह तय किया कि इमाम विशेष अहकाम अपना सकता है, उन पर अमल का हुक्म दे सकता है, और मुसलमानों पर उसकी इताअत करना वाजिब है, भले ही वह उनके इज्तिहाद से अलग हो। इस बारे में मशहूर शरई उसूल ये हैं: