37.3 The obligatory [al-wajib]
37.3 The obligatory [al-wajib]
वाजिब और फ़र्ज़ का एक ही अर्थ है, इनमें कोई भेद नहीं; दोनों समानार्थी हैं। जहाँ तक उन कुछ मुज्तहिदीन के मत की बात है कि यदि कोई हुक्म क़ुरआन और मुतवातिर हदीस जैसे क़तई प्रमाण से सिद्ध हो तो वह फ़र्ज़ है, और यदि वह ख़बर-ए-वाहिद या क़ियास जैसे ज़न्नी प्रमाण से सिद्ध हो तो वह वाजिब है, तो यह मत मनमाना है और इसका कोई प्रमाण नहीं। न भाषा में और न वह्य में कोई चीज़ है जो इसे सिद्ध करे, और न यह सही है कि जो लोग यह मत रखते हैं उनके लिए यह कोई पारिभाषिक मत हो, क्योंकि इस्तिलाह तो नामों को उनके अर्थों (मुसम्माયात) पर लागू करना है, जबकि यह मसला उस प्रकार का नहीं है। यह तो एक विशेष अर्थ की परिभाषा का मामला है, इसलिए इसे वास्तविकता के अनुरूप होना चाहिए। इस अर्थ की वास्तविकता यह है कि शरीअत देने वाले ने जिस चीज़ की निश्चित रूप से माँग की हो, चाहे वह माँग किसी क़तई प्रमाण से सिद्ध हो या किसी ज़न्नी प्रमाण से। यह मसला संबोधन के संकेत से संबंधित है, उसके सिद्ध होने से नहीं। पालन के दृष्टिकोण से फ़र्ज़ दो प्रकार का है: विस्तृत फ़र्ज़ (फ़र्ज़ मुवस्सा') जैसे नमाज़, और संकुचित फ़र्ज़ (फ़र्ज़ मुज़य्यक़) जैसे रोज़ा। यदि किसी फ़र्ज़ के अदा करने के लिए दिया गया समय उसे अदा करने के लिए आवश्यक समय से अधिक हो, जैसे ज़ुहर की नमाज़, तो वह विस्तृत फ़र्ज़ है। उस समय के सभी भाग उस फ़र्ज़ को अदा करने का समय हैं, जिससे फ़र्ज़ पूरा होता है और उसका लाभ प्राप्त होता है। विस्तृत फ़र्ज़ का प्रमाण यह है कि ज़ुहर की नमाज़ का आदेश, और नबी ﷺ का वह कथन जो अबू दाऊद ने रिवायत किया है कि, "जिब्रील ने काबा के पास दो बार मुझे नमाज़ पढ़ाई। उन्होंने मुझे ज़ुहर की नमाज़ उस समय पढ़ाई जब सूरज अपने शिखर से एक जूते के फीते के बराबर ढल गया था…" यहाँ तक कि उन्होंने कहा, "और असर की नमाज़ उस समय पढ़ाई जब किसी चीज़ की छाया उसकी दोगुनी हो गई थी।" इसमें उल्लिखित समय के सभी भाग शामिल हैं। इस हदीस का उद्देश्य न तो यह है कि नमाज़ के पहले कार्य को उसके पहले समय में और आख़िरी को उसके आख़िरी समय में अदा किया जाए, न ही यह है कि उस बताए गए समय के हर भाग में नमाज़ अदा की जाए, ताकि समय का कोई भी हिस्सा नमाज़ से खाली न रहे, और न ही यह है कि फ़र्ज़ की अदायगी के लिए समय का कोई एक विशेष भाग निश्चित किया गया हो। इसका कारण यह है कि शब्दों में इनमें से किसी भी अर्थ का कोई संकेत नहीं है। अतः इसका केवल यही अर्थ शेष रहता है कि समय का हर भाग नमाज़ अदा करने के लिए स्वीकार्य है, और मुकल्लफ़ (शरई दायित्व वाले व्यक्ति) को इन भागों में से किसी भी भाग में नमाज़ अदा करने का अधिकार है।