20.9 बंदी
20.9 Captives
जब मुसलमान अपने शत्रु को युद्धबंदी बनाते हैं, तो इन बंदियों का मामला ख़लीफ़ा के सीधे आदेश पर छोड़ा जाता है, और जिन्होंने उन्हें पकड़ा है, उस युद्धक्षेत्र के कमांडर या सेना-प्रमुख की इसमें कोई राय नहीं होती। इसका कारण यह है कि जैसे ही कोई योद्धा युद्धबंदी बन जाता है, उसके बारे में आदेश ख़लीफ़ा की राय होती है, और ख़लीफ़ा बंदियों से संबंधित शरीअत के नियम का पालन करता है। युद्धबंदियों का नियम एक निश्चित क़ुरआनी पाठ से स्थापित है, और वह यह है कि ख़लीफ़ा को रिहाई और फ़िदये (मुक्ति-धन) के बीच चुनने का अधिकार दिया गया है, अल्लाह के इस कथन के कारण:
When the Muslims take their enemy as prisoners of war, the matter of these captives is delegated to the Khalifah’s direct command and their is no opinion for those who captured them, the battlefield commander or army leader. This is because once the fighter becomes a prisoner of war, the command regarding him is the Khalifah’s opinion and the Khalifah follows the Shari’ah rule concerning captives. The rule of the prisoners of war is established by a definite Qur’anic text which is that the Khalifah is given a choice between release and ransom due to Allah’s statement:
“जब तुम उन लोगों से मुठभेड़ करो जिन्होंने इनकार किया है, तो गर्दनें मारो, यहाँ तक कि जब तुम उनका भारी संहार कर चुको, तो (उन्हें) मज़बूती से बाँध लो। फिर इसके बाद या तो एहसान के तौर पर छोड़ देना है या फ़िदये (मुक्ति-धन) के बदले, यहाँ तक कि लड़ाई अपने बोझ उतार दे।” [TMQ 47: 4]
“When you meet those who disbelieve, strike the neck(s) until when you have inflicted severe slaughter upon them then bind strongly the fetters. Then afterwards either the release or the ransom until the war lays down its burdens” [TMQ 47: 4].
इस विषय पर यह स्पष्ट हुक्म युद्धबंदियों के नियम में है, और कई पहलुओं से यह नियम निर्धारित होता है। इन्हीं में से एक यह है कि यह स्पष्ट आयत सूरह मुहम्मद में आई है, जो युद्ध के मामले में उतरने वाली पहली सूरह है। इसका उतरना उस समय हुआ जब रसूलुल्लाह ﷺ मक्का से मदीना पहुँच चुके थे, और इसे "सूरह अल-क़िताल" (युद्ध की सूरह) कहा जाता है। यह सूरह अल-हदीद के बाद और बद्र की लड़ाई से पहले उतरी। इसने युद्धबंदियों का नियम किसी लड़ाई के होने या किसी युद्धबंदी के पकड़े जाने से पहले ही स्पष्ट कर दिया। इसके साथ यह भी जोड़ लें कि यही वह आयत है जो युद्धबंदियों के साथ किए जाने वाले व्यवहार को साफ़ तौर पर बताती है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यही युद्धबंदियों के नियम का आधार है, और इस विषय की अन्य सभी आयतें और हदीसें इसी की ओर लौटती हैं। और जिन तरीक़ों से इस नियम को निर्धारित किया गया है, उनमें से एक यह है कि इस आयत में "इम्मा" (या तो) शब्द आया है, जो दो चीज़ों के बीच चुनाव को दर्शाता है, बिना किसी तीसरी चीज़ के। आयत कहती है: "फिर या तो एहसान करके छोड़ दो, या फिर फ़िदया (मुक्ति-धन) लेकर।" जब "इम्मा" दो चीज़ों के बीच आता है, तो वह उनके बीच के चुनाव को सीमित कर देता है और इस बात को रोकता है कि उनके अलावा कोई और चीज़ हो, या कि वह उन दोनों में से न हो। अतः "इम्मा" में चुनाव को निर्धारित करने से यह निर्धारण होता है कि युद्धबंदियों के नियम में वह चीज़ अवैध है जो क़ुरआन ने चुनाव के रूप में नहीं दी। इसकी पुष्टि उस घटना से होती है जब रसूलुल्लाह ﷺ ने यमामा के सरदार समामा बिन उसाल को छोड़ दिया, कवि अबू अज़्ज़ा को छोड़ा, और अबू अल-आस बिन अर-रबीअ को छोड़ा, और बद्र के युद्धबंदियों के बारे में आपने कहा:
This is explicit in the rule of the prisoners of war and it is a specified rule in numerous ways: Of these (ways) is that this explicit text came in Surah Muhammad which is the first Surah revealed regarding the matter of fighting. Its revelation was after the Messenger (saw) arrived in Madinah from Makkah, and it is called the Surah of fighting. It was revealed after Surah Al-Hadeed and before the battle of Badr. It clarified the rule of prisoners of war before any battle had occurred or any prisoners of war had been captured. If added to this is that this is the ayah which clarifies explicitly what is done to prisoners of war, it becomes clear that it is the text of the rule of prisoners of war and the basis to which return all other texts regarding the subject. And from these ways which specify this rule on prisoners of war is that the ayah came with the language of “imma” which indicates the choice between two things without any third to them. It said: “Then bind strongly the fetters. Then afterwards either the release or the ransom.” When “imma” comes between two things, it restricts the choice between them and prevents there being other than them or that it is not one of them two. So there is specification due to specifying the choice in “imma” the impermissibility of there being other than what the Qur’an gave as a choice in the rule of captives. This is strengthened in when the Messenger (saw) released Thamama bin Wail, the chief of the people of Yamamah, Abu ‘Uzzah the poet, Abu Al-‘As bin Ar-Rabi’ and he said about the prisoners of war from the Battle of Badr:
"अगर मुतइम बिन अदी ज़िंदा होते और मुझसे इन (कैदियों) के बारे में बात करते, तो मैं उन्हें उनकी ख़ातिर छोड़ देता।"
“If Mut’im bin Adiyy was alive and he talked to me about these, I would release them to him.”
उन्होंने बद्र के युद्धबंदियों को फ़िदये (मुक्ति-शुल्क) लेकर छोड़ा, और वे तिहत्तर पुरुष थे। और उन्होंने बद्र के दिन दो पुरुषों के बदले एक पुरुष का फ़िदया लिया। यह हज़रत आइशा (रज़ि०) से रिवायत है, जिन्होंने कहा:
He ransomed the prisoners of war from Badr and they were seventy three men, and he ransomed the day of Badr two men for one man. It is narrated from Aisha (ra) who said:
जब मक्का के लोगों ने अपने युद्धबंदियों को छुड़ाने के बारे में संदेश भेजा, तब ज़ैनब ने अबुल-आस को छुड़ाने के लिए धन भेजा। उन्होंने इसे एक हार में रखकर भेजा, जो ख़दीजा का था और जिसे उन्होंने (अबुल-आस को दिया था)। उन्होंने कहा: जब अल्लाह के रसूल ﷺ ने उसे देखा, तो वे उस पर बहुत दयालु हो गए और कहा: यदि तुम्हें ठीक लगे कि तुम उसके बंदी को उसके लिए छोड़ दो और जो उसका है वह उसे लौटा दो? उन्होंने कहा: हाँ।
“When the people of Makkah sent about ransoming their prisoners of war, Zaynab sent money to ransom Abu Al-‘Aas. She sent in in a necklace that was for Khadijah which she (adkhalat) upon Abu Al-‘As. She said: When the Messenger of Allah (saw) saw it, he was verycompassionate about it and said: If you see that can release her captive for her and return that which is hers? They said: Yes.”
इमरान बिन हुसैन से रिवायत है
It has been narrated from Imran bin Hussein
यह कि नबी ﷺ ने मुसलमानों में से दो व्यक्तियों को मुश्रिकों के एक व्यक्ति के बदले में छुड़ाया, जो बनू उक़ैल से थे।
“That the Prophet (saw) ransomed two men from the Muslims for one man of the polytheists from Banu ‘Aqeel.”
इब्न अब्बास (रज़ि.) से रिवायत है, उन्होंने कहा:
It has been narrated from ibn Abbas (ra) who said:
बद्र के युद्धबंदियों में कुछ ऐसे लोग थे जिनके पास फ़िदया देने के लिए कुछ नहीं था, तो अल्लाह के रसूल ﷺ ने उनका फ़िदया यह रखा कि वे अंसार के बच्चों को पढ़ना सिखाएँ।
“There were people of the prisoners of war from Badr who had no ransom, so the Messenger of Allah (saw) made their ransom to teach reading to the children of the Ansar.”
इन अहादीस के साथ-साथ यह आयत स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि युद्धबंदियों के बारे में नियम यह है कि उन्हें छोड़ दिया जाए या फिदये (मुक्ति-मूल्य) के बदले रिहा किया जाए। अल-हसन, अता और सईद बिन जुबैर से रिवायत है कि वे युद्धबंदियों के कत्ल को नापसंद करते थे और कहते थे: काश, उसे छोड़ दिया जाता या फिदये पर रिहा कर दिया जाता, जैसा कि बद्र के युद्धबंदियों के साथ किया गया था, और इसलिए भी कि अल्लाह (SWT) ने फ़रमाया:
These ahadith together with the ayah indicate explicitly that the rule of prisoners of war is release or ransom. It is ascribed to Al-Hasan, ‘Ata and Said bin Jubayr that they disliked the killing of prisoners of war and said: If only he released or ransomed him as was done with the prisonsers of war of Badr, and because Allah (swt) said:
फिर बंधन को मज़बूती से बाँधो, फिर इसके बाद या तो एहसान करके छोड़ देना या फ़िदया (मुक्ति-धन) लेना।
“Then bind strongly the fetters, then afterwards either the release or the ransom”
तो उन्होंने (SWT) युद्धबंदी बनाए जाने के बाद इन दोनों के बीच ही चुनाव दिया, और इसके अलावा कुछ नहीं। यह सब स्पष्ट करता है कि युद्धबंदियों के मामले में ख़लीफ़ा इन दो बातों में से ही चुनता है, इसके सिवा कुछ नहीं: या तो रिहाई या फिरौती। जहाँ तक उस बात का संबंध है जो वर्णित है कि नबी (ﷺ) ने बनू क़ुरैज़ा के पुरुषों को मार डाला, तो यह सब मध्यस्थ के फ़ैसले के कारण था, न कि इसलिए कि वे युद्धबंदी थे। जहाँ तक उस बात का संबंध है जो वर्णित है कि उन्होंने (ﷺ) बद्र के दिन हिरासत में अन-नज़्र बिन अल-हारिस और उक़बा बिन अबी मुऐत को मार डाला, और उहुद के दिन अबू इज़्ज़ा को, तो यह इस बात का संकेत नहीं करता कि यही युद्धबंदियों का नियम है, क्योंकि उन्होंने ऐसा सभी बंदियों के साथ या हर युद्ध में नहीं किया। बल्कि उन्होंने ऐसा कुछ युद्धों में कुछ विशेष व्यक्तियों के साथ किया, जबकि रिहाई और फिरौती ऐसे थे जो उन्होंने सभी युद्धों में सभी युद्धबंदियों के साथ किए। इन विशेष व्यक्तियों की हत्या का कारण यह था कि रसूलुल्लाह (ﷺ) ने उनके व्यक्तित्वों में मुसलमानों के लिए निश्चित ख़तरा देखा; अतः यह उन विशेष व्यक्तियों की, उनके लिए बताए गए विशेष कारणों से हत्या थी, न कि युद्धबंदियों की हत्या थी। अहमद और अल-बुख़ारी ने अबू हुरैरा (रज़ि०) से रिवायत किया, जिन्होंने कहा: रसूलुल्लाह (ﷺ) ने हमें एक अभियान पर भेजा और कहा:
So He (swt) gave a choice between these two after the captivity and nothing else. All this is explicit that the Khalifah chooses in the prisoners of war between two matters nothing else, which is release or ransom. As for what is narrated that the Prophet (saw) killed the men of Banu Quraydha, all this is because of the ruling of the arbitrator in arbitration not that they were prisoners of war. As for what is narrated that he (saw) killed An-Nadhr bin Al-Harith and ‘Uqbah bin Abu Mu’ayt in custody on the day of Badr, and Abu ‘Uzzah on the day of Uhud, this does not indicate that this is the rule of prisoners of war as he did not do this for all captives or in every battle. Rather he did this in some battles with some persons, contrary to release and ransom which he did for all prisoners of war in all battles. What caused the killing of these persons specifically is that the Messenger (saw) saw in their personalities definite danger for Muslims; so it is the killing of specific persons for reasons specified to them, nor was it the killing of prisoners of war. Ahmad and Al-Bukhari narrated from Abu Hurairah (ra) who said: The Messenger of Allah (saw) sent us on an expedition and said:
“अगर तुम कुरैश के फलां और फलां दो व्यक्तियों को पाओ, तो उन्हें आग में जला देना।” फिर जब हम प्रस्थान करने का इरादा कर रहे थे, तो अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: “मैंने तुम्हें हुक्म दिया था कि फलां और फलां को जला देना। बेशक आग से सज़ा कोई नहीं देता सिवाय अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल के, इसलिए अगर तुम उन्हें पाओ, तो उन दोनों को क़त्ल कर देना।”
“If you find so and so for two men of Quraysh, then burn them with fire. Then the Messenger of Allah (saw) said when we intended to depart: I had commanded you to burn so and so and so and so. Verily none punishes with fire except Allah ‘azza wa jall so if you find them, then kill both of them.”
अतः यह स्पष्ट किया जाता है कि युद्धबंदियों के संबंध में शरीयत के नियमों में से हत्या नहीं है; बल्कि हत्या शरीयत का वह नियम है जो कुछ विशेष लोगों पर लागू होता है, जिनसे खलीफा खतरा समझता है, इसलिए वह उनके क़त्ल का आदेश देता है, भले ही वे युद्धबंदी हों। जहाँ तक इस आयत के उतरने के बाद रसूलुल्लाह ﷺ द्वारा गुलाम बनाने की बात है जो वर्णित है, वह बंदी बनाए गए लोगों (सबाया) को गुलाम बनाना था, न कि युद्धबंदियों को, यानी वे स्त्रियाँ और बच्चे जो युद्धभूमि में सेना के साथ थे और लड़ने वाले पुरुष नहीं थे, उन्हें आप ﷺ गुलाम बनाते थे। यदि लड़ने वाले पुरुषों को गुलाम बनाना स्थापित होता, तो यह आप ﷺ की ओर से होता, परंतु इसका कोई प्रमाण नहीं है कि ऐसा हुआ, जबकि आप ﷺ के समय में अरबों में से बहुत से बंदी पकड़े गए थे। रही बात इतिहास की कुछ पुस्तकों में वर्णित उस घटना की, कि रसूलुल्लाह ﷺ ने क़ुरैश के बनी नाजिया को, उनके पुरुषों और स्त्रियों सहित, गुलाम बनाया था, तो यह हदीस की किताबों में वर्णित नहीं है, और सीरत की कुछ किताबों, जैसे इब्न हिशाम की सीरत, में भी नहीं है, इसलिए इसे प्रमाण के रूप में प्रयोग नहीं किया जाता। यदि यह प्रामाणिक भी होती, तो भी वर्णन के शब्द हैं: "उन्होंने बनी नाजिया को, उनके पुरुषों और स्त्रियों सहित, गुलाम बनाया", अतः इसमें "पुरुषों और स्त्रियों" का उल्लेख है। वर्णन यह नहीं कहता कि "उनके मर्द और औरतें", इसलिए इसका अर्थ सबाया लिया जाएगा, यानी बच्चे, लड़के और लड़कियाँ, और यह जायज़ है। इस प्रकार रसूलुल्लाह ﷺ ने किसी पुरुष को गुलाम नहीं बनाया; बल्कि उन्होंने सबाया, लड़कों और लड़कियों, को गुलाम बनाया। प्रमाण माने जाने वाली हदीसों में स्थापित तथ्य इसकी पुष्टि करते हैं। जो व्यक्ति रसूलुल्लाह ﷺ के कार्यों का अनुसरण करता है, वह पाएगा कि आप ﷺ ने युद्धबंदी बनाए गए किसी पुरुष को गुलाम नहीं बनाया, न अरबों में से और न ही उनके अलावा किसी को। बल्कि उनसे जो वर्णित है वह यह है कि आप ﷺ ने सबाया को गुलाम बनाया। बद्र की लड़ाई में दुश्मन के साथ कोई स्त्रियाँ नहीं थीं, इसलिए उसमें कोई सबाया नहीं पकड़ी गई। बल्कि युद्धबंदी पकड़े गए, तो रसूलुल्लाह ﷺ ने उनके विषय में फिदये (मुक्ति-धन) का निर्णय दिया। हुनैन की लड़ाई में हवाज़िन रसूलुल्लाह ﷺ से लड़ने निकले और उनकी औरतें भी उनके साथ निकलीं। जब मुसलमान जीत गए, तो हवाज़िन भाग निकले और अपनी औरतों को पीछे छोड़ गए, इसलिए उन्हें सबाया (बंदी) बनाया गया और उन्हें माल-ए-ग़नीमत के साथ रखा गया। बनू मुस्तलिक़ में दुश्मन अपनी औरतों को पीछे छोड़ गया, इसलिए उन्हें सबाया बनाया गया। ख़ैबर में उनसे लड़ाई हुई और उनके क़िले फ़तह किए गए। जो औरतें लड़ने वालों के साथ थीं, उन्हें सबाया बनाया गया, जबकि बाक़ी लोगों को वैसे ही छोड़ दिया गया जैसे मर्दों को छोड़ा गया था। ये सभी घटनाएँ इस बात की ओर इशारा करती हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ लड़ने वाले मर्दों को क़ैद करते थे, और जो औरतें लड़ने वालों के साथ होती थीं उन्हें सबाया बनाया जाता था, और इसी तरह बच्चों को भी। लेकिन जो दूसरे मर्द और औरतें जंग में शामिल नहीं थे, उन्हें न युद्धबंदी बनाया गया और न सबाया। इससे यह साबित होता है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने युद्धबंदियों को ग़ुलाम नहीं बनाया। यह स्पष्ट होता है कि युद्धबंदियों के संबंध में रसूलुल्लाह ﷺ का अमल आयत के बताए गए पाठ के अनुसार था। बेशक आप ﷺ ने कुछ समय पर उन्हें रिहा किया और कुछ समय पर फ़िदये (मुक्ति-धन) लिया। आप ﷺ ने न युद्धबंदियों को ग़ुलाम बनाया और न उन्हें क़त्ल किया; बल्कि आप ﷺ ने केवल औरतों और बच्चों को बंदी बनाया, और कुछ विशेष व्यक्तियों को उनके मुसलमानों के लिए ख़तरा होने की विशेषता के कारण क़त्ल किया। जहाँ तक उन क़ैदियों की क़ैद का सवाल है जो युद्धबंदियों के समान हो गए, उस समय के लोग लड़ने वालों के साथ निकलने वाली औरतों और बच्चों को युद्ध की तकनीकी परिभाषा में माल की तरह मानते थे, अरबों और दूसरों के बीच बिना किसी भेद के। युद्ध की तकनीकी परिभाषा ग़नीमत के माल और क़ैदियों को संपत्ति मानती थी। रसूलुल्लाह ﷺ ने आकर उस परिभाषा को स्वीकार किया, इसलिए आप ﷺ ने लड़ने वालों के साथ निकली औरतों और बच्चों को ग़नीमत के माल में माल की तरह माना। तो वे गुलाम बना लिए गए और उन पर माल-ए-गनीमत (लूट) का हुक्म लागू हुआ, न कि युद्धबंदियों (क़ैदियों) का हुक्म। युद्धबंदियों का हुक्म बाक़ी रहता है, जिसमें ख़लीफ़ा को या तो रिहाई या फ़िरौती के बीच चुनने का अधिकार होता है और इसके अलावा कुछ नहीं। यह हुक्म क़यामत के दिन तक बाक़ी रहेगा। अगर इस्लामी राज्य अपने दुश्मनों से लड़ता है, तो बंदियों के बारे में रिहाई और फ़िरौती के बीच विचार किया जाता है; और यदि युद्धों में उनके साथ औरतें निकलती हैं, तो जीत के बाद उन औरतों को बंदी (सबाया) बनाया जाता है और वे माल-ए-गनीमत की चीज़ों की तरह होती हैं।
"अगर अरबों पर ग़ुलामी की इजाज़त होती, तो आज भी ऐसा ही होता"
“If enslaving were allowed upon the Arabs, it would be today”
यह हदीस ज़ईफ़ (कमज़ोर) है। इसकी सनद में अल-वाकिदी है, जो बहुत ज़ईफ़ है। अत-तबरानी ने इसे दूसरे तरीक़े से भी रिवायत किया है, और उसमें यज़ीद बिन इयाद है, जो अल-वाकिदी से भी ज़्यादा ज़ईफ़ है। इस प्रकार की हदीस शरई दलील के रूप में नहीं ठहरती, इसलिए इसे शरीअत का सबूत बनाना जायज़ नहीं है। रहा वह जो रसूल ﷺ से वर्णित है कि आपने अरब की औरतों और उनके बच्चों को गुलाम बनाया, और उनके मर्दों को गुलाम नहीं बनाया, तो यह सही है, परंतु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि अरब के मर्दों को गुलाम बनाना वर्जित है और दूसरों को गुलाम बनाना जायज़ है। बल्कि यह आम है, जो अरबों और दूसरों दोनों को समाहित करता है। जहाँ तक उस घटना का संबंध है जो अरबों के साथ घटी, तो यह एक वास्तविक स्थिति का वाक़िआ है जिसका कोई अलग अर्थ नहीं निकाला जा सकता, यानी जो स्थिति पेश आई वह अरबों के साथ थी, इसलिए इसका यह अर्थ नहीं कि यह केवल उन्हीं के लिए खास है और दूसरों के लिए नहीं। इसके अलावा शरीअत का सिद्धांत यह है कि मूल्य शब्दों के सामान्य अर्थ का होता है, न कि कारण की विशेषता का। घटना, चाहे वह किसी व्यक्ति या समूह के साथ घटी हो, उस व्यक्ति या समूह के साथ खास नहीं होती, बल्कि उसका हुक्म एक सामान्य हुक्म होता है।
This is a weak hadith. In its chain is Al-Waqidi who is very weak (dhaif). At-Tabarani narrated it via another way and within it is Yazid bin ‘Iyadh who is weaker than Al-Waqidi. This type of hadith does not stand as proof so it is not allowed to be Shari’ah evidence. As for what is narrated of the Messenger (saw) enslaving Arab women and their children, and not enslaving their men, this is correct but it does not indicate the non-permissibility of enslaving Arab men and the permissibility of enslaving others. Rather it is general, encompassing Arabs and others. As for the incident occurring with Arabs, this is a reality of a situation with no understanding for it i.e. the situation which occurred was with Arabs so it does not mean it is specific to them and is not for others. Moreover, the Shari’ah principle is that the value is in the generality of the words and not the specificity of the cause. The incident, even if it occurs with a person or a group, it is not specified with this person or group. Rather its rule is a general rule.
इसी प्रकार, पुरुषों को गुलाम बनाने का अभाव अरबों के साथ इसलिए हुआ क्योंकि वास्तविकता यह थी कि रसूल (सल्ल.) अरबों से लड़ रहे थे, इसलिए यह हुक्म उन्हीं तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी लोगों के लिए आम है। जैसे अगर वे किसी विशेष कबीले, मसलन कुरैश, से लड़ते, तो हुक्म उन्हीं तक सीमित न होता। परंतु यह सब, यानी बंदी बनाने और कैद करने का हुक्म, अरब मुशरिकों के अलावा सभी लोगों पर आम है। अरब मुशरिक इससे हिजरत के नौवें वर्ष, ज़िलहिज्जा की दसवीं तारीख़ (नौवीं तारीख़ के बाद) से, चार महीने बीतने पर, क़ियामत तक के लिए अलग कर दिए गए। उनसे इस्लाम या युद्ध के सिवा कुछ स्वीकार नहीं किया जाता, और उनसे बंदी और क़ैदी नहीं लिए जाते। जहाँ तक इस तारीख़ से पहले के अरब मुशरिकों की बात है, तो हुक्म उन पर भी लागू था। इसी प्रकार अरब के गैर-मुशरिक, यहूदी और ईसाई, इस हुक्म में शामिल हैं, क़ियामत तक आयतों के अवतरण के अनुसार, क्योंकि अरब मुशरिकों का अपवाद उस दिन से है जिस दिन ये आयतें मुशरिकों तक पहुँचाई गईं, यानी ज़िलहिज्जा की नौवीं तारीख़ और उसके चार महीने बाद। इसमें अरब के अन्य लोग शामिल नहीं हैं, और न ही इस तारीख़ से पहले के मुशरिक इसमें शामिल थे। जहाँ तक अरब के इन मुशरिकों को इस उल्लेखित तारीख़ से मूल रूप से अलग करने की बात है, तो यह क़ुरआन के एक स्पष्ट पाठ से सिद्ध है। अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) ने फ़रमाया:
"आपको एक अत्यंत साहसी क़ौम की ओर बुलाया जाएगा। या तो आप उनसे लड़ेंगे, या वे इस्लाम स्वीकार कर लेंगे।" [TMQ 48:16]
“You will be called to a people of great boldness. You will fight them or they will embrace Islam” [TMQ 48:16]
और उन्होंने कहा:
And He said:
"जब पवित्र महीने समाप्त हो जाएँ, तो मुशरिकों को जहाँ कहीं पाओ मारो। उन्हें पकड़ो, घेरो और हर घात में उनके लिए बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें, नमाज़ क़ायम करें और ज़कात अदा करें, तो उनका रास्ता छोड़ दो।" [TMQ 9: 5]
“When the sacred months finish, fight the polytheists wherever you find them. Seize them, surround them and wait for them at each ambush. If they repent, and establish the prayer and pay the zakat, then free their way” [TMQ 9: 5]
और उन्होंने कहा:
And He said:
"धरती में चार महीने यात्रा करो, और जान लो कि तुम अल्लाह को विवश नहीं कर सकते!" [TMQ 9:2]
“Travel in the land for four months, and know that you do not defeat Allah!” [TMQ 9:2]
यह आयतों के सामान्य अर्थ से अरब बहुदेववादियों को स्पष्ट रूप से बाहर रखता है। इन आयतों के उतरने और चार महीने की अवधि पूरी होने के बाद अरब बहुदेववादियों से इस्लाम या युद्ध के सिवा कुछ स्वीकार नहीं किया जाएगा। जहाँ तक उस बात का संबंध है जो पैगंबर ﷺ द्वारा अरबों को दास बनाने के बारे में वर्णित है, वह यहूदियों और ईसाइयों को दास बनाना है, और उन अरब बहुदेववादियों को दास बनाना है जो इन आयतों के उतरने से पहले थे। जहाँ तक इसके बाद का संबंध है, अरब बहुदेववादियों से इस्लाम के सिवा कुछ स्वीकार नहीं किया जाता, केवल युद्ध के सिवा।
This is explicit in excluding Arab polytheists from the generality of ayat. So the Arab polytheists are not accepted, after the revelation of these ayat and finishing the new moon of four months, except Islam or war. As for what is narrated about the Messenger (saw)'s enslaving of Arabs, this is enslaving Jews and Christians and enslaving Arab polytheists before the revelation of these ayat. As for afterwards, it is not accepted from Arab polytheists except Islam or war.