37.4 जो चीज़ किसी वाजिब को पूरा करने के लिए ज़रूरी हो, वह स्वयं भी वाजिब है।
37.4 That which is required to fulfill a wājib is itself wājib
किसी वाजिब को पूरा करने के लिए आवश्यक किसी चीज़ के दो प्रकार हो सकते हैं: (i) वह ऐसी हो सकती है कि वाजिब का दायित्व उस पर सशर्त हो, या (ii) वह ऐसी हो सकती है कि वाजिब का दायित्व उस पर सशर्त न हो। यदि दायित्व उस पर सशर्त है, तो इसमें कोई अंतर नहीं कि उस शर्त को पूरा करना वाजिब नहीं है। बल्कि वाजिब वह है जिसका दायित्व प्रमाण द्वारा स्थापित हो। इसका एक उदाहरण किसी विशेष सलात का दायित्व है, जो तहारत (पवित्रता) की प्राप्ति पर सशर्त है। फिर भी तहारत उस आदेश की दृष्टि से दायित्व नहीं है जो सलात के दायित्व को स्थापित करता है। बल्कि वह उस दायित्व के पालन के लिए एक शर्त है, और सलात का वह दायित्व तभी है जब शर्त मौजूद हो। जहाँ तक उस चीज़ की बात है जो किसी वाजिब को पूरा करने के लिए आवश्यक है, परंतु (विधिक) शर्त के रूप में नहीं, बल्कि वास्तविकता की शर्त के रूप में, तो यह दो प्रकार की है: (i) वह जो मुकल्लफ़ की क्षमता के भीतर है, और (ii) वह जो मुकल्लफ़ की क्षमता के बाहर है। पहली प्रकार की चीज़ उसी आदेश से वाजिब होती है जो मूल वाजिब को स्थापित करता है, और उसका दायित्व पूरी तरह से उस विषय के दायित्व जैसा है जिसे शारेअ (विधायक) के आदेश ने लाया है। इसका एक उदाहरण है कोहनियों [मिरफ़क़ैन] तक हाथ धोना, जिसके बिना कोहनियों तक हाथ धोने का वाजिब पूरा नहीं हो सकता। इसका पूरा होना कोहनियों के कम से कम एक भाग को धोने पर निर्भर है; अतः कोहनियों का एक भाग धोना भी वाजिब है, भले ही आदेश ने इसे स्पष्ट रूप से न कहा हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि आदेश उस चीज़ के साथ आया जिसका पूरा होना इस पर निर्भर है, अतः वह आदेश मूल वाजिब के साथ-साथ उस चीज़ को भी शामिल करता है जिस पर उसका पालन निर्भर है। इस बाद वाले दायित्व पर आदेश का संकेत एक आवश्यक संकेत [दलालत अल-इल्तिज़ाम] है। एक और उदाहरण है ख़लीफ़ा की स्थापना के लिए, जब वह मौजूद न हो, कोई राजनीतिक ढाँचा खड़ा करना, या शासकों का हिसाब लेने के लिए ऐसा करना। ख़िलाफ़त की स्थापना और शासकों का हिसाब लेना एक फ़र्ज़ है। ये फ़र्ज़ अकेले व्यक्तियों द्वारा ठीक से पूरे नहीं किए जा सकते, इसलिए मुसलमानों के एक ऐसे समूह के गठन की आवश्यकता है जो सामूहिक रूप से इन्हें पूरा करने में सक्षम हो। अतः मुसलमानों पर ऐसे समूह की स्थापना वाजिब हो जाती है जो ख़िलाफ़त की स्थापना या शासकों का हिसाब लेने में सक्षम हो। अगर वे ऐसा नहीं करते तो सब गुनहगार होंगे, क्योंकि उन्होंने उस चीज़ को पूरा नहीं किया जो एक वाजिब को पूरा करने के लिए आवश्यक थी। और अगर वे एक समूह तो स्थापित करते हैं, परंतु ऐसा जो अपेक्षित कार्यों को पूरा करने में असमर्थ है, तब भी वे गुनहगार रहेंगे और उन्होंने फ़र्ज़ पूरा नहीं किया। इसका कारण यह है कि फ़र्ज़ केवल किसी समूह की स्थापना नहीं, बल्कि ऐसे समूह की स्थापना है जो अपेक्षित फ़र्ज़ को पूरा करने में सक्षम हो।