14.5 इस्लामी फ़िक़्ह का पतन
14.5 The Decline Of Islamic Jurisprudence
मुजतहिदीन के शागिर्दों के दौर के बाद मज़हबों के पैरोकारों और अनुयायियों का दौर आया। उन्होंने न तो इज्तिहाद और अहकाम के इस्तिंबात में उस रास्ते को जारी रखा जिस पर मज़हबों के इमाम और उलमा चले थे, और न ही दलीलों के अध्ययन, इस्तिख़राज के पहलू को स्पष्ट करने, अहकाम की शाखाएँ निकालने और मसाइल की व्याख्या के मामले में उस रास्ते को अपनाया जिस पर मुजतहिदीन के शागिर्द चले थे। हर इमाम के अनुयायी या हर मज़हब के उलमा का सारा ध्यान केवल अपने मज़हब का समर्थन करने पर था, यानी तमाम मसाइल में उसकी फ़ुरू और उसूल की हिमायत करना। उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं था कि दलील की मज़बूती को परखें और कमज़ोर दलील पर मज़बूत दलील को प्राथमिकता दें, चाहे वह उनके अपने मज़हब के ख़िलाफ़ ही क्यों न जाती हो।
After the era of the students of mujtahidin came the adherents and followers of the mazhabs. They did not continue on the path which the imams and scholars of mazahib followed in Ijtihād and in the inference (istinbat) of rules. Nor did they continue on the path taken by the students of the mujtahidin in terms of studying the evidence, clarifying the angle of eduction and the branching out of the rules and exposition of issues. The followers of each imam or the scholars of each mazhab were only concerned about supporting their own mazhab, supporting its furu’ and usul in all of the issues. They were not interested in studying the soundness of the dalīl and outweighing the preponderant evidence over the weaker evidence even if it went against their mazhab.
कभी-कभी उनका ध्यान अपने अपनाए गए मत की सत्यता के प्रमाण स्थापित करने और उसके विरुद्ध के प्रमाणों को निरस्त करने में लगा होता था, और कभी-कभी उनकी रुचि इमामों और मज़हबों के विद्वानों की प्रशंसा करने में लगी रहती थी। इसने मज़हबों के विद्वानों को व्यस्त रखा और उन्हें प्राथमिक स्रोत, यानी कुरआन और सुन्नत, से दूर कर दिया। उनमें से कोई व्यक्ति कुरआन या सुन्नत के पाठ की ओर केवल इसलिए लौटता था ताकि अपने इमाम के मज़हब का समर्थन करने वाली कोई बात खोज सके। इस प्रकार उनका अध्ययन अपने मज़हबों तक ही सीमित रह गया। पूर्ण इज्तिहाद के प्रति उनका उत्साह और उससे नियम निकालने के लिए प्राथमिक स्रोतों की ओर लौटने की प्रवृत्ति कमज़ोर पड़ गई। उनकी इज्तिहाद की लालसा या तो उनके मज़हब तक सीमित रह गई, या किसी एक मसले तक, या बस बिना जाँच-पड़ताल के तक़लीद करने तक। उनकी तक़लीद पर निर्भरता इस हद तक पहुँच गई कि वे कहने लगे: कोई भी आयत या हदीस जो हमारे विद्वानों के कथन के विरुद्ध हो—यानी हमारे मज़हब के विरुद्ध हो—उसकी व्याख्या (हमारी बात के अनुरूप) की जाएगी या उसे मंसूख़ (निरस्त) माना जाएगा। उन्होंने किसी एक मज़हब का अनुसरण मुसलमान पर अनिवार्य ठहराया। और वे अल-अज़हर जैसी इस्लामी संस्थाओं में यह कथन पढ़ाने लगे, जो जौहरा अल-तौहीद फ़ी वुजूब अल-तक़लीद के लेखक का है:
Sometimes they were concerned with establishing the proofs for the correctness of the view they have adopted and invalidate the proofs against it and at other times their interest was devoted to extolling the imams and the scholars of the mazhabs. This preoccupied the scholars of the mazahib and distracted them from the primary source which is the Qur’ān and Sunnah. A person among them did not refer to the text of the Qur’ān or Sunnah except for the purposes of finding anything that will support the mazhab of his imam. Accordingly, their studies were confined to their mazhabs. And their zeal for absolute Ijtihād and reference to the primary sources in order to derive rules from them became weak. Their eagerness for Ijtihād was restricted to their mazhab or to one issue or simply to make Taqlīd without scrutiny. Their dependence on Taqlīd reached the point where they said: any ayah or hadīth which goes against what our scholars have said – i.e, our mazhab- it is to be interpreted (to accord with what we say) or it has been abrogated. They made the following of a mazhab an obligation on the Muslim. And they began to study in Islamic institutions such as al-Azhar, the saying of the author of Jawhara al-Tawheed fi wujub al-Taqlīd:
उनमें से विद्वानों का अनुसरण करना अनिवार्य है। इस प्रकार लोग उस भाषा में बोलते थे जिसे वे स्वयं समझते थे।
An obligation it is to follow the learned amongst them. Thus the people spoke in a language understood by them.
बल्कि, उनका मानना था कि मुसलमानों के लिए इज्तिहाद का दरवाज़ा बंद कर दिया जाना चाहिए। उनका विचार था कि इज्तिहाद तब तक जायज़ नहीं है जब तक इज्तिहाद के योग्य और इज्तिहाद की क्षमता रखने वाले बहुत से उलेमा इज्तिहाद करने की हिम्मत न करें या यह न कहें कि वे मुज्तहिद हैं। यह पतन हिजरी चौथी सदी के अंत की ओर शुरू हुआ, हालांकि आरंभ में हिजरी छठी सदी के अंत और सातवीं सदी की शुरुआत तक कुछ प्रगति हुई। मुज्तहिदीन और विद्वान उस समय मौजूद थे जब अल-क़फ़्फ़ाल जैसे विद्वान इज्तिहाद का दरवाज़ा बंद करने की वकालत कर रहे थे। फिर भी, हिजरी सातवीं सदी के आरंभ से लेकर हिजरी तेरहवीं सदी के अंत तक पतन पूरी तरह हो चुका था, लेकिन वह इस्लाम की सीमाओं के भीतर ही था। पतन विचार में था, परंतु फ़िक़्ही राय इस्लामी बनी रहीं। जहाँ तक तेरहवीं सदी के बाद की बात है, यानी हिजरी 1274 से लेकर अब तक, पतन उस बिंदु तक पहुँच गया है जहाँ शरीअत के आदेश गैर-इस्लामी कानूनों के साथ मिल गए हैं, और स्थिति पतन की सबसे बुरी हालत तक पहुँच गई है।
Rather, they believed that the door of Ijtihād should be closed for the Muslims. They held that Ijtihād was not permitted until many of the ‘Ulamā from amongst those who were qualified for Ijtihād and who had the aptitude for Ijtihād did not dare to perform Ijtihād or say that they were mujtahids. This decline started towards the end of the 4th century A.H, although in the beginning until the end of the 6th century and the beginning of the 7th there was some progress. Mujtahidin and scholars were present at a time when the likes of al-Qaffal were advocating the closing of the door of Ijtihād. However, from the beginning of the 7th century until the end of the 13th century A.H the decline was complete but it was within the limits of Islam. The decline was in thought but the jurisprudential opinions remained Islamic. As for after the 13th century i.e, from 1274 A.H. till now, the decline has reached the point where the Sharī’ah rules have become mixed with unIslamic laws and the situation reached the worst possible state of decline.
इसी फ़िक़्ही पतन के कारण लोगों के लिए शरीअत के अहकाम पर अमल करना कठिन हो गया। अतः जब इस्लामी शरीअत पूरी दुनिया के लिए पर्याप्त थी, तब उन्होंने इसे इसके अनुयायियों के लिए भी कठिन बना दिया, यहाँ तक कि वे ऐसे दूसरे क़ानूनों को अपनाने पर मजबूर हो गए जो इसके समान नहीं थे। बहुत-से धर्मपरायण मुसलमान ऐसी शरीअत की चर्चा करने लगे जो इस्लामी शरीअत नहीं थी। ‘उस्मानी राज्य के अंतिम दौर में मुसलमानों के पिछड़ेपन और उनके राज्य के अंत का मुख्य कारण इस्लाम का अज्ञान और अज्ञानी फ़ुक़हा थे। कुछ फ़ुक़हा कट्टर थे और हर नई चीज़ को हराम ठहराने के लिए तैयार रहते थे, तथा किसी भी चिंतक के विचारों को प्रतिबंधित करते थे। एक विचित्र और हास्यास्पद तथा दुखद घटना यह हुई कि जब कॉफ़ी आई तो कुछ उलेमा ने उसे हराम ठहराने का फ़तवा दिया, जब धूम्रपान आया तो उन्होंने उसे भी हराम ठहराया, जब लोगों ने फ़ेज़ (टोपी) पहनी तो फ़ुक़हा ने उसे पहनना हराम बताया, और जब छापाखाना आया और राज्य ने क़ुरआन की प्रतियाँ छापने का निर्णय लिया तो कुछ फ़ुक़हा ने उसके छापे जाने को भी मना कर दिया। टेलीफ़ोन का आविष्कार हुआ तो कुछ फ़ुक़हा ने लोगों को उस पर बात करने से रोका, और इसी तरह के अन्य मामले भी सामने आए। परिणामस्वरूप इस्लामी फ़िक़्ह के विषय में मुसलमान पूरी तरह अनजान हो गए। मामला शरीअत के अहकाम का अध्ययन करने से बदलकर पश्चिमी क़ानूनों का अध्ययन करने का हो गया। क़ानून के स्कूल स्थापित हुए; ऐसे स्कूल जिनकी मुस्लिम देशों में मौजूदगी उनके लिए शर्मनाक धब्बा थी, और ‘उस्मानी राज्य के अंत के समय इस्लामी राज्य और मुसलमानों के ख़लीफ़ा ने क़ानून के संहिताकरण में पश्चिमी न्यायशास्त्र की नक़ल करने का निर्णय लिया। इस प्रकार उन्होंने 1282 हिजरी में नागरिक क़ानून के रूप में ‘मजल्ला’ लागू किया, और 1293 हिजरी में उसे प्रभावी करने के लिए एक बड़ा फ़रमान जारी किया गया, और इससे पहले 1274 हिजरी में उन्होंने ‘उस्मानी दंड संहिता’ तैयार कर ली थी। उन्होंने उसे हुदूद, आपराधिक (जिनायात) और विवेकाधीन दंडों (ता’ज़ीर) के स्थान पर लागू किया। और 1276 हिजरी में... एच. उन्होंने व्यापार और अधिकारों का कानून लागू किया। फिर उन्होंने 1294 हिजरी में ख़िलाफ़त व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करने के लिए संविधान लागू किया। लेकिन वह समाप्त कर दी गई और फिर 1326 हिजरी (1908 ईस्वी) में दोबारा स्थापित कर दी गई। फिर भी उन्होंने उसे इस्लाम के अनुरूप बनाने की कोशिश की और ख़िलाफ़त व्यवस्था को बनाए रखा। इस तरह फ़िक़्ह (समझ) का पतन हुआ और वह केवल कुछ नियमों का जड़ पालन (कैनन) बनकर रह गया, शरीयत के नियम छोड़ दिए गए और इस्लाम से भिन्न नियम इस बहाने अपनाए गए कि वे इस्लाम के अनुरूप हैं। एक गलत धारणा फैल गई कि जो कुछ इस्लाम के अनुरूप हो, उसे किसी भी इंसान से लिया जा सकता है, और उलमा का जोश ठंडा पड़ गया और वे सभी मुक़ल्लिद (अनुयायी) बन गए। फिर भी इसे इस्लाम की छाया में आना समझा गया। लेकिन ख़िलाफ़त के अंत और काफ़िरों, अंग्रेज़ और फ़्रांसीसी, के मुस्लिम भूमि पर कब्ज़े के बाद मुस्लिम देश राष्ट्रवादी आधार पर बने राज्य बन गए, चाहे वे अरब हों, तुर्क हों या ईरानी आदि। इस्लामी फ़िक़्ह लोगों के आपसी संबंधों से और शिक्षा व ज्ञान से मिटा दी गई। यह केवल कुछ देशों में पढ़ी जाती थी, जैसे मिस्र में अल-अज़हर, इराक़ में नजफ़, तूनिस में ज़ैतूना, लेकिन इन्हें उसी तरह पढ़ाया जाता था जैसे यूनानी दर्शन पढ़ाया जाता है। पतन इतना भयावह स्तर तक पहुँच गया कि इस्लामी फ़िक़्ह लोगों के संबंधों से लुप्त हो गई।