48. कुरआन के संबंध में सुन्नत का स्थान
48. The Status Of The Sunnah In Relation To The Qur'aan
सुन्नत शरई दलील है, उस निश्चित प्रमाण के लिए जो हमारे आक़ा मुहम्मद ﷺ की नबुव्वत (पैग़म्बरी) और उनके रिसालत (संदेश) को सिद्ध करता है, और उस निश्चित प्रमाण के लिए जो नक़्ल और अर्थ दोनों में यह सिद्ध करता है कि वह ﷺ अपनी इच्छा से नहीं बोलते, वह तो केवल एक उतारी गई वह़्य है, और जिससे वह डराते हैं वह केवल अल्लाह तआला की ओर से वह़्य है। अतः सुन्नत अल्लाह तआला की ओर से वह़्य है, परंतु वह वह़्य सुन्नत की विषय-वस्तु और अर्थ हैं, उसके शब्द नहीं। अल्लाह तआला ने यह वह़्य उन ﷺ पर उतारी और उन्होंने इस वह़्य को अपने शब्दों, अपने कर्मों या अपनी स्वीकृति अर्थात् मौन के द्वारा व्यक्त किया।
The Sunnah is shari'ahi evidence for the decisive evidence of the prophet-hood of our master Muhammad (pbuh) and his message (risaalah), and for the decisive evidence in both transmission and denotation that He (pbuh) speaks not after His own desire, it is but a revealed revelation, and that what he warns with is only revelation from Allah Ta'ala. So the Sunnah is revelation from Allah Ta'ala, except that the revelation is the contents and meanings of the Sunnah not its words. Allah Ta'ala revealed it to Him (pbuh) and He expressed this revelation by His own words or actions or approvals i.e. silence.
सुन्नत भी किताब (कुरआन) की तरह एक दलील है और उससे कम नहीं है, क्योंकि उसके लिए भी वही निर्णायक प्रमाण स्थापित हैं जो कुरआन के लिए स्थापित हैं। और केवल किताब तक सीमित रखने का मत उन मुर्तदों (धर्मत्यागियों) का मत है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया: {और रसूल जो कुछ तुम्हें दें उसे ले लो, और जिस चीज़ से वह तुम्हें रोकें उससे रुक जाओ...} (सूरतुल हश्र, 7)। और उसने फ़रमाया: {जिसने रसूल की आज्ञा मानी, उसने वास्तव में अल्लाह की आज्ञा मानी...} (सूरतुन निसा, 80)। और उसने फ़रमाया: {जो लोग रसूल के आदेश के विरुद्ध चलते हैं उन्हें डरना चाहिए कि कहीं उन पर कोई फ़ितना न आ पड़े, या उन पर कोई दर्दनाक यातना न आ जाए।} (सूरतुन नूर, 63)। और उसने फ़रमाया: {किसी मोमिन मर्द और मोमिन औरत के लिए उचित नहीं कि...}
The Sunnah is an evidence similar to the Book and not less then it for the established decisive evidence for it, as it is established for the Qur'aan, and the limiting (of the taking) to the Book is the opinion of the apostates, Allah Ta'ala said ُ Messenger the what take So} assigns to you, and abstain from that which He withholds you from...) 7 Surat Al Hashr, and He Ta'ala said: the obeys who He Messenger, indeed obeys Allah…) 80 Surat Al Nisaa', and he said: who beware those Let... withstand the Messenger's order, lest some trial befall them, or a grievous Punishment be inflicted on them.) 63 Surat Al Nour, and he said: a for fitting not is It...
ईमान वाला पुरुष हो या स्त्री, जब किसी मामले का फ़ैसला अल्लाह और उसका रसूल कर दें, तो उनके लिए अपने मामले में कोई इख़्तियार बाक़ी नहीं रहता…) 36 सूरतुल-अहज़ाब, और उसने कहा: {पर नहीं, तेरे रब की क़सम, वे (वास्तविक) ईमान वाले नहीं हो सकते, जब तक वे अपने आपसी झगड़ों में तुझ (ﷺ) को फ़ैसला करने वाला न मानें, और जो फ़ैसला तू करे उससे अपने दिलों में कोई तंगी न पाएँ, बल्कि उसे पूरी तरह मान लें…} 65 सूरतुन-निसा, और उसने कहा: {अगर तुम किसी चीज़ में आपस में मतभेद करो, तो उसे अल्लाह और रसूल (ﷺ) की ओर लौटाओ…} 59 सूरतुन-निसा, और रसूल ﷺ की वफ़ात के बाद उनकी ओर लौटना उनकी सुन्नत की ओर लौटना है, और अल्लाह त'आला ने कहा: {कह दो: अल्लाह की इताअत करो और रसूल (ﷺ) की इताअत करो…} 32 सूरत आले-इमरान, और उसने कहा: {कह दो: (ऐ मुहम्मद ﷺ) अगर तुम अल्लाह से मुहब्बत रखते हो, तो मेरी पैरवी करो, अल्लाह तुमसे मुहब्बत करेगा…} 31 सूरत आले-इमरान। अतः ये निर्णायक आयतें अपने प्रसारण और अपने अर्थ, दोनों में स्पष्ट रूप से यह अनिवार्य करती हैं कि सुन्नत को किताब की तरह ग्रहण किया जाए, और सुन्नत का इनकार करने वाला निश्चित रूप से काफ़िर है। इसलिए सुन्नत को वैसे ही लेना होगा जैसे क़ुरआन को लिया जाता है, दोनों में बिना किसी भेद के। यह कहना जायज़ नहीं कि "हमारे पास अल्लाह की किताब है, हम जो उसमें है वही लेते हैं," क्योंकि इसे सुन्नत को छोड़ देने के अर्थ में समझा जा सकता है; बल्कि सुन्नत और किताब को मिलाना अनिवार्य है। और रसूल ﷺ ने अपनी हदीस में इससे सावधान किया है: "क़रीब है कि एक आदमी अपने तकिए पर टेक लगाए बैठा हो और उससे मेरी कोई हदीस कही जाए, तो वह कहे: हमारे और तुम्हारे बीच अल्लाह की महान और सर्वशक्तिमान किताब है, जो कुछ हम उसमें हलाल पाएँ उसे हलाल मानते हैं, और जो कुछ उसमें हराम पाएँ उसे हराम मानते हैं। सुनो, जिसे रसूल ﷺ ने हराम ठहराया वह भी वैसा ही है जैसा अल्लाह ने हराम ठहराया।" इब्न … ने यह भी कहा। इब्न माजह में वर्णित है: "यह समय निकट आ जाएगा कि तुम में से कोई कहेगा: यह अल्लाह की किताब है, इसमें जो हलाल है उसे हम हलाल मानेंगे और जो हराम है उसे हम हराम मानेंगे। निस्संदेह, जो व्यक्ति उस हदीस को इनकार करेगा जो उस तक पहुँची है, तो उसने अल्लाह और उसके रसूल ﷺ को झुठलाया, और जिसने उसे हदीस पहुँचाई।" इब्न अब्दुल बर्र ने इसे वर्णित किया है। सुन्नत किताब (क़ुरआन) का फ़ैसला करती है, क्योंकि किताब के दो या उससे अधिक अर्थ हो सकते हैं, फिर सुन्नत आकर उनमें से एक अर्थ निश्चित करती है, इसलिए मामला सुन्नत की ओर लौटाया जाएगा और जो किताब का स्पष्ट (ज़ाहिर) अर्थ बनता है उसे छोड़ दिया जाएगा। अल्लाह तआला ने फ़रमाया: "और इनके अतिरिक्त जो हैं, वे तुम्हारे लिए हलाल हैं, बशर्ते कि तुम अपने माल के द्वारा (उन्हें निकाह में लाने की) इच्छा करो..." (सूरह अन-निसा 24) — इससे पहले और बाद में यह आयत है: "तुम पर हराम की गई हैं: तुम्हारी माताएँ, तुम्हारी बेटियाँ, तुम्हारी बहनें; तुम्हारी फूफियाँ, तुम्हारी खालाएँ; भाई की बेटियाँ, बहन की बेटियाँ; तुम्हारी दूध पिलाने वाली माताएँ, दूध की बहनें; तुम्हारी पत्नियों की माताएँ; तुम्हारी गोद में पलने वाली तुम्हारी पत्नियों की बेटियाँ जिनसे तुमने संबंध किया हो (यदि संबंध न किया हो तो कोई दोष नहीं); तुम्हारे सगे बेटों की पत्नियाँ; और दो बहनों को एक साथ निकाह में रखना, सिवाय उसके जो पहले हो चुका; निस्संदेह अल्लाह अति क्षमाशील, अत्यंत दयावान है। और विवाहित स्त्रियाँ (भी हराम हैं), सिवाय उनके जो तुम्हारे दाहिने हाथ की मिल्कियत में हों; यह अल्लाह का आदेश है जो तुम पर लागू किया गया है। इनके अतिरिक्त शेष सब तुम्हारे लिए हलाल हैं, बशर्ते कि तुम अपने माल के द्वारा (उन्हें निकाह में लाने की) इच्छा करो..." (सूरह अन-निसा 23-24)। यह आयत उन सबके जायज़ होने को दर्शाती है जो उल्लेख में नहीं आईं। फिर सुन्नत आई और उसने इससे उस स्त्री के साथ निकाह को अलग कर दिया जिसकी फूफी या खाला हो, क्योंकि रसूल ﷺ ने फ़रमाया: "किसी स्त्री का निकाह उसकी फूफी पर और न उसकी खाला पर किया जाए।" इसे मुस्लिम ने वर्णित किया है। अतः यह किताब के ज़ाहिर अर्थ को छोड़कर सुन्नत को उस पर प्राथमिकता देना है। किताब का ज़ाहिर अर्थ किसी बात को दर्शा सकता है, फिर सुन्नत आकर उसे उस ज़ाहिर अर्थ से बाहर निकाल देती है। ऐसा प्रतीत होता है कि क़ुरआन में सभी संपत्तियों से ज़कात लेने का आदेश आया था, फिर सुन्नत ने उसे कुछ विशेष संपत्तियों के लिए निर्दिष्ट किया, और ज़कात लेने को केवल उन्हीं संपत्तियों तक सीमित कर दिया, ताकि उनके अलावा किसी अन्य से वह न ली जाए।
कुरआन की तुलना में सुन्नत आम तौर पर उसकी व्याख्या करने वाली है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया: "और हमने आप पर यह ज़िक्र (क़ुरआन) उतारा, ताकि आप लोगों के लिए वह स्पष्ट कर दें जो उनकी ओर उतारा गया है..." (सूरह अन-नहल 44) इसका कारण यह है कि क़ुरआन शरई हुक्मों की सूचना अधिकतर पूर्ण रूप से देता है, आंशिक रूप से नहीं; और जहाँ सूचना आंशिक रूप में आती है, वहाँ उसे पूर्ण आधार पर ही लिया जाना चाहिए। क़ुरआन व्यापक है, और उसमें जो कुछ संकलित है वे सामान्य बातें ही हो सकती हैं, क्योंकि शरीअत उसके अवतरण के पूरा होने से पूर्ण हुई। और सुन्नत की व्यापकता तथा उसके मसलों की अधिकता के कारण, वह किताब (क़ुरआन) की व्याख्या करने वाली है। सुन्नत में जो कुछ भी है, उसकी जड़ें किताब में हैं, चाहे किताब ने उसे संक्षेप में स्पष्ट किया हो, या विस्तार से, या दोनों तरीकों से; सुन्नत ने स्पष्ट करने और समझाने के द्वारा उन सब पर फ़ैसला दिया। सुन्नत ने बहुत से ऐसे हुक्म लाए जो क़ुरआन करीम में शाब्दिक रूप से उल्लिखित नहीं हैं, किन्तु ये हुक्म उन मूलों के पूरक के रूप में आए जो क़ुरआन में बताए गए हैं, और ये क़ुरआन में जो है उसकी एक प्रकार की व्याख्या हैं। अतः सुन्नत किताब की व्याख्या करने वाली है।
In comparison with the Qur'aan, the Sunnah most generally is a clarifier for It, Allah Ta'ala said:.And We have sent down unto you the Message; that you may explain clearly to the mankind what is sent for them...) 44 Surat Al Nahl that is because the informing of the Qur'aan about the shari'ahi verdicts is mostly totally not partially, and where the informing comes as partially; it is to be taken on the total basis, and the Qur'aan in comprehensive and it can not be as such except that what is gathered in it are general matters, because the shari'ah was completed by the completion of Its descent. And because of the numerousness of the Sunnah and the multitude of its issues; It is a clarifier for the Book. All that is in the Sunnah have origins in the Book, whether It (The Book) clarifies it either in summing up or in details or in both ways the Sunnah came adjudging all that by clarifying and explaining. The Sunnah brought many verdicts that are not textually mentioned in the Qur'aan Al Kareem, but these verdicts came as supplements for origins for them mentioned in the Qur'aan, and they are a kind of clarification for what is in the Qur'aan. So the Sunnah is a clarifier for the Book.
किताब (कुरआन) की व्याख्या सुन्नत द्वारा होती है, और इसका सार इस प्रकार है:
The clarification of the Book by the Sunnah is summed up by the following:
1. विवरण का सारांश उससे यह निकलता है कि अल्लाह तआला ने किताब में नमाज़ पढ़ने का आदेश दिया, लेकिन उसके समयों, रुकनों और रकअतों की संख्या का स्पष्टीकरण नहीं किया; सुन्नत ने उसे स्पष्ट किया। नबी ﷺ ने फ़रमाया: "नमाज़ ऐसे पढ़ो जैसे मुझे नमाज़ पढ़ते हुए देखते हो" (इसे अल-बुख़ारी ने रिवायत किया है)। और किताब में हज का अनिवार्य होना आया, लेकिन उसके अरकान (मनासिक) का स्पष्टीकरण नहीं किया गया; सुन्नत ने उसे स्पष्ट किया, और नबी ﷺ ने फ़रमाया:
1. Detailing Its summed up From that, is that Allah Ta'ala commanded in the Book to perform the prayer, without a clarification of its times, pillars, and the number of its prostration (Rak'ah); the Sunnah clarified that. The Messenger (pbuh) said: do pray as you see me praying" narrated by Al Bukhari. And there came in the Book the obligation of the pilgrimage (hajj), without clarifying its ceremonies (manaasik), the Sunnah clarified that, and He (pbuh) said:
"...Do your best to take your manaasik from me" — अहमद ने इसे रिवायत किया है। और किताब (क़ुरआन) में ज़कात का वाजिब होना आया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि किन संपत्तियों पर यह वाजिब है, और न ही इसके वाजिब होने का निसाब बताया गया; सुन्नत ने इसे स्पष्ट किया। इसी तरह (सामान्य को विशिष्ट करना): क़ुरआन में कुछ सामान्य (आम) बातें हैं और सुन्नत उन्हें विशिष्ट करने के लिए आई। इनमें से एक यह है कि अल्लाह तआला ने आदेश दिया कि संतान माता-पिता की विरासत पाए, जैसा कि अल्लाह तआला ने अपने इस फ़रमान में स्पष्ट किया: "अल्लाह तुम्हारी संतान के बारे में तुम्हें आदेश देता है: पुरुष के लिए दो स्त्रियों के बराबर हिस्सा है..." (सूरह अन-निसा, 11)। तो यह हर उस पिता के लिए आम है जिसकी विरासत बची हो और हर उस संतान के लिए जो विरासत पाती हो। फिर सुन्नत ने विरासत छोड़ने वाले पिता को नबियों के सिवा दूसरों तक सीमित कर दिया, नबी ﷺ के इस फ़रमान से: "...हम विरासत नहीं छोड़ते, हम जो छोड़ते हैं वह सदक़ा है।" इसे बुख़ारी, मुस्लिम और अहमद ने रिवायत किया है। और सुन्नत ने विरासत पाने वाले को हत्यारे के सिवा दूसरों तक सीमित कर दिया, नबी ﷺ के इस फ़रमान से: "हत्यारा कुछ भी विरासत में नहीं पाएगा।" इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। इसी में से अल्लाह तआला का यह फ़रमान भी है: "तुम में से जो लोग मर जाएँ और पत्नियाँ छोड़ें, तो वे (पत्नियाँ) अपने आप को चार महीने दस दिन तक रोके रखें..." (सूरह अल-बक़रा, 234)। यह आयत इद्दत की उस अवधि को बताती है जिसमें विधवा दोबारा निकाह नहीं कर सकती। फिर इस आयत को सुबैअह अल-अस्लमिय्या की हदीस ने विशिष्ट कर दिया, जब उन्होंने अपने पति की मृत्यु के पच्चीस दिन बाद बच्चे को जन्म दिया, तो नबी ﷺ ने उनसे कहा कि अब वे (दोबारा निकाह के लिए) हलाल हो गईं। इससे यह स्पष्ट हुआ कि यह आयत उस स्त्री के लिए है जो गर्भवती न हो। (मुत्लक़ को मुक़य्यद करना): क़ुरआन में कुछ ऐसी आयतें आईं जो बिना शर्त (मुत्लक़) हैं, तो सुन्नत आई और इस बिना-शर्त को एक निश्चित शर्त से सीमित कर दिया। इसी में से अल्लाह तआला का यह फ़रमान है: "और जब तक क़ुर्बानी का जानवर अपने स्थान पर न पहुँच जाए, तब तक अपने सिर न मुंडवाओ।" और यदि तुम में से कोई बीमार हो, या उसके सिर में कोई तकलीफ़ हो (जिससे सिर मुंडवाना पड़े), (तो उसे) उसके बदले में या तो रोज़ा रखना होगा, या सदक़ा देना होगा, या क़ुर्बानी करनी होगी…) सूरह अल-बक़रा, 196। तो ये तीनों: रोज़ा, सदक़ा और क़ुर्बानी, अनिश्चित रूप से पुष्ट हैं, ये अप्रतिबंधित शब्द हैं, लेकिन इन्हें उस हदीस ने सीमित कर दिया जिसे मुस्लिम ने का'ब बिन उजरा से रिवायत किया है, कि (नबी ﷺ ने) फ़रमाया: "छह मिस्कीनों को खाना खिलाओ, एक फ़रक़ (के हिसाब से), और अपना सिर मुंडवा लो; और फ़रक़ तीन साअ है, या तीन दिन रोज़े रखो, या नुसुक (क़ुर्बानी) करो।" तो उन्होंने अप्रतिबंधित रोज़े को तीन दिनों तक सीमित कर दिया, और अप्रतिबंधित सदक़े को छह मिस्कीनों के लिए एक फ़रक़ तक सीमित कर दिया, और फ़रक़ तीन साअ है, और अप्रतिबंधित नुसुक को एक मादा भेड़ की क़ुर्बानी तक सीमित कर दिया।
Do your best to take your manaasik from me" narrated by Ahmad. And there came in the Book the obligation of the Zakaat without clarifying for which properties the obligation is, nor does it clarify the nisaab for its obligation, the Sunnah clarified that, and as such. (Specifying Its general: there are generalities in the Qur'aan and the Sunnah came to specify them, and of that, is that Allah Ta'ala commanded that the children inherit the parents the way He Ta'ala clarified in :saying His you commands Allah regarding your children's (inheritance): to the male, a portion equal to that of two females...) 11 Surat Al Nisaa', so this is general for every father got inherited and every child that inherits, the Sunnah then specified the inherited father by other then the prophets for His (pbuh) saying: "…We do not get inherited, what We left is sadaqah" Al Bukhari, Muslim and Ahmad narrated it. And the Sunnah specified the inheritor by other then the killer by His (pbuh) saying: not does killer the And... inherit anything" Abu Dawood narrated it. And of that is Allah Ta'ala's saying: {If any of you die and leave widows behind, they shall wait concerning themselves four months and ten days....) 234 Surat Al Baqarah this verse denoted the (iddah) period in which the widow may not remarry then the verse got specified by the Hadeeth of Subay'ah Al Aslamyah, when she gave birth 25 days after the death of her husband, then the Prophet (pbuh) told her that she became allowed (to remarry) so that showed that the verse is specific for the non pregnant. َِ(Limiting Its unrestricted (absolutes): There came in the Qur'aan verses that are unrestricted, so the Sunnah came and limited this unrestricting with determined restriction, and from that is His Ta'ala's saying: And do not shave your heads until the offering reaches the place of sacrifice. And if any of you is ill, or has an ailment in his scalp, (necessitating shaving), (he should) in compensation either fast, or donation, or offer sacrifice…) 196 Surat Al Baqarah, so these three: fasting, donation, or sacrifice, are confirmed indefinite, they are unrestricted words, but they became limited by the Hadeeth that Muslim narrated from the way of Ka'ab Ibn Ajrah him to said) pbuh (Prophet the that needy six to faraq one feed or head your Shave and the faraq is three saa' or fast three days or do a nusuk" so He limited the unrestricted fasting by three days, and the unrestricted donation by one faraq for six needy, and the faraq is three saa', and the unrestricted nusuk by slaughtering one female sheep.
4. किसी शाखा-आदेश को उसके मूल से जोड़ना, जो कुरआन में आया है। यह शाखा नया विधान प्रतीत होती है, किंतु गहराई से जांचने पर स्पष्ट होता है कि यह कुरआन में आए अपने मूल से जुड़ी हुई है, और इस प्रकार के उदाहरण बहुत हैं। इसी तरीके से है कि अल्लाह तआला ने (विरासत में) निर्धारित अंश तो बताए, किंतु (असबात) (पिता की ओर के रिश्तेदारों और चचेरे भाइयों) की विरासत का उल्लेख नहीं किया, सिवाय उस के जो उसके इस कथन में आया: (अल्लाह तुम्हें तुम्हारी संतान के बारे में आदेश देता है: पुरुष के लिए दो स्त्रियों के बराबर हिस्सा है…) सूरह अन-निसा 11, और उसका यह कथन: यदि वे भाई-बहन हों, (तो वे बांटेंगे), पुरुष का हिस्सा स्त्री के दोगुना होगा…) सूरह अन-निसा 176। इससे यह आवश्यक होता है कि असीब (पैतृक रिश्तेदार) के लिए संतान और भाइयों के अलावा कोई निर्धारित अनिवार्य अंश नहीं है, बल्कि वह निर्धारित हिस्सों को देने के बाद बचा हुआ लेता है। अल्लाह के रसूल ﷺ ने इसे स्पष्ट किया, जब आपने फ़रमाया: "निर्धारित अंश उनके हक़दारों को दो, फिर जो बचे वह सबसे निकट के पुरुष का है।" इसे बुखारी ने रिवायत किया है। अतः आप ﷺ ने संतान के अलावा असीब को भाइयों और संतान के साथ जोड़ दिया। बहनों को भी बेटियों के साथ असबा के रूप में जोड़ा गया, और इसके प्रमाण में मुआज़ बिन जबल का वह अधिकार है, जो अल-अस्वद से वर्णित है कि मुआज़ बिन जबल ने यमन में रहते हुए एक बहन और एक बेटी की विरासत का फ़ैसला किया, और उन्होंने दोनों में से हर एक को आधा दिया, उस समय अल्लाह के रसूल ﷺ जीवित थे। इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। मुआज़ नबी ﷺ के जीवनकाल में यह फ़ैसला तभी देते जब उन्हें इसका कोई प्रमाण (दलील) मालूम होता; यदि उन्हें दलील मालूम न होती तो वे इस मामले में जल्दबाज़ी न करते। इसी तरीके से है कि अल्लाह तआला ने दो बहनों को (निकाह में) एक साथ रखने से यह कहकर मना फ़रमाया: "और यह कि तुम दो बहनों को एक साथ निकाह में रखो..." (सूरत अन-निसा, 23)। लेकिन उसने महिला को उसकी फूफी या ख़ाला के साथ एक साथ रखने का ज़िक्र नहीं किया, बल्कि रसूल ﷺ ने इसकी व्याख्या अपने इस फ़रमान से की: "अल्लाह के रसूल ﷺ ने किसी औरत से उसकी फूफी या ख़ाला पर निकाह करने से मना फ़रमाया, और फ़रमाया: यदि तुम औरतें ऐसा करोगी तो तुम अपने रिश्तों (अरहाम) को तोड़ दोगी।" तो इस तरह इन सबको दो बहनों को एक साथ निकाह में रखने की मनाही के साथ जोड़ दिया गया। इसी तरीके से है कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया: "वह उनके लिए वह चीज़ें हलाल करता है जो पाक हैं और उन पर उन चीज़ों को हराम ठहराता है जो नापाक हैं..." (सूरत अल-आराफ़, 157), और इसकी तफ़सील (विवरण) ज़िक्र नहीं की। फिर सुन्नत के नस (स्पष्ट वचन) ने वह चीज़ें बताईं जो मुजतहिद को उन चीज़ों के हुक्म जानने में मदद करती हैं जो नापाक और पाक में से लगती हैं, और उन्हें उनके साथ जोड़ दिया। सुन्नत ने गधों का मांस, नुकीले दांत वाले हर दरिंदे और पंजे वाले हर परिंदे को खाने से मना किया और उन्हें नापाक चीज़ों के साथ जोड़ दिया। इब्ने अब्बास ने कहा: "अल्लाह के रसूल ﷺ ने नुकीले दांत वाले हर दरिंदे और पंजे वाले हर परिंदे से मना फ़रमाया," (मुस्लिम ने रिवायत किया)। जाबिर ने कहा: "अल्लाह के रसूल ﷺ ने ख़ैबर के दिन गधों, खच्चरों के मांस, नुकीले दांत वाले दरिंदों और पंजे वाले परिंदों से मना फ़रमाया," (तिर्मिज़ी ने रिवायत किया)। सुन्नत ने गोह (दब्ब), खरगोश और इन जैसी चीज़ों के खाने की इजाज़त दी और उन्हें पाक चीज़ों के साथ जोड़ दिया। इब्ने उमर ने कहा: "एक व्यक्ति ने अल्लाह के रसूल ﷺ से गोह खाने के बारे में पूछा। उन्होंने ﷺ फ़रमाया: मैं उसे न खाता हूं और न उससे मना करता हूं," (मुस्लिम ने रिवायत किया)। अबू हुरैरा ने कहा: "एक बद्दू अल्लाह के रसूल ﷺ के पास एक खरगोश लाया, जिसे उसने भूनकर उसके साथ उसकी सिनाब और अदम लाया, और उसे (नबी ﷺ के) हाथों में रखा, फिर रसूल ﷺ ने उससे परहेज़ किया और नहीं खाया, और अपने साथियों को खाने का आदेश दिया।" इसे अहमद ने रिवायत किया है। सिनाब सरसों और किशमिश से बनी एक चटनी है। इसी तरह अल्लाह तआला ने शिकार के बारे में अनुमति दी है कि जो कुछ प्रशिक्षित शिकारी जानवर पकड़ें वह हलाल है: "कहो: तुम्हारे लिए सारी पाक चीज़ें हलाल हैं, और जो कुछ तुमने अल्लाह के सिखाए हुए तरीके से प्रशिक्षित शिकारी जानवरों को सिखाया है (कि वे पकड़ें), तो जो वे तुम्हारे लिए पकड़ें उसे खाओ, परन्तु उस पर अल्लाह का नाम लो..." (सूरह अल-माइदा 4)। इससे हम जानते हैं कि यदि जानवर प्रशिक्षित न हो तो उसका शिकार हराम है, क्योंकि वह केवल अपने लिए पकड़ता है। इस प्रकार दो मूल सिद्धांतों के बीच टकराव होता है: यदि शिकारी जानवर प्रशिक्षित है, तो प्रशिक्षण इस बात का तकाज़ा करता है कि उसने तुम्हारे लिए पकड़ा, और उसका शिकार में से खाना इस बात का तकाज़ा करता है कि उसने अपने लिए शिकार किया, न कि तुम्हारे लिए। तो दोनों मूल सिद्धांत एक-दूसरे से टकराते हैं, फिर सुन्नत ने इसका स्पष्टीकरण दिया। रसूल ﷺ ने फरमाया: "यदि (प्रशिक्षित कुत्ता) उसमें से खा ले तो तुम न खाओ, मुझे डर है कि उसने अपने लिए पकड़ा है…" इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। इसी तरह अल्लाह तआला ने दूध पिलाने (रज़ाअत) के कारण जिनसे निकाह हराम है, उनका उल्लेख किया है, उसके इस कथन में: "तुम्हारी वे माताएँ जिन्होंने तुम्हें दूध पिलाया, और तुम्हारी दूध की बहनें..." (सूरह अन-निसा 23)। फिर नबी ﷺ ने इन दोनों के साथ उन बाकी रिश्तेदारों को भी जोड़ दिया जो दूध पिलाने से हराम हैं, जैसे चाची, मौसी, भाई और बहन की बेटी आदि, आपने फरमाया: "दूध पिलाने से वह हराम होता है जो वंश (नसब) से हराम होता है।" इसे बुखारी ने रिवायत किया है। इसी तरह अल्लाह तआला ने फरमाया:
और दो पुरुष गवाहों को अपने में से गवाह बनाओ, और अगर दो पुरुष न हों तो एक पुरुष और दो स्त्रियाँ, जिन गवाहों को तुम पसंद करो... (सूरतुल बक़रा 282)। तो माल के मामले में अल्लाह ने एक पुरुष की गवाही के साथ स्त्रियों की गवाही लेने का आदेश दिया। फिर उसके साथ सुन्नत ने भी यह बात जोड़ी कि गवाह के साथ क़सम भी ली जा सकती है, जैसा कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़ैसला किया। अली (रज़ि.) से रिवायत है कि नबी ﷺ ने एक गवाह और क़सम के आधार पर फ़ैसला किया, जिसे दारक़ुतनी ने रिवायत किया है। तो एक गवाह और क़सम का तरीक़ा वैसा ही होगा जैसे दो पुरुष गवाह, या एक पुरुष और दो स्त्रियाँ गवाह। इसी तरीक़े से सुन्नत ने बहुत से ऐसे फ़ैसले बताए जो किताब में नहीं आए; वे नई शरई बातें हैं, लेकिन अपनी मूल बुनियाद से जुड़ी हुई हैं। इसका मतलब यह नहीं कि रसूलुल्लाह ﷺ कोई नया हुक्म तब तक नहीं लाते थे जब तक वह क़ुरआन की किसी आयत से न जुड़ा हो, और न ही यह कि आप ﷺ का लाया हर नया हुक्म क़ुरआन की किसी बुनियाद से जुड़ा होना ज़रूरी है; बल्कि अधिकांश मामलों में ऐसा ही है। फिर भी रसूलुल्लाह ﷺ कोई नया हुक्म ऐसा भी ला सकते थे जो क़ुरआन की किसी बुनियाद से न जुड़ा हो। इसका एक उदाहरण सार्वजनिक सुविधाओं का सार्वजनिक मिल्कियत में शामिल होना है, जब आप ﷺ ने फ़रमाया: "मुसलमान तीन चीज़ों में साझेदार हैं: चरागाह, पानी और आग" — इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। यह क़ुरआन की किसी मूल बुनियाद से नहीं जुड़ता। इसी तरह आप ﷺ का वह हुक्म भी है जिसमें आप ﷺ ने महसूल (चुंगी/कस्टम टैक्स) वसूलने से मना फ़रमाया और कहा: "जो शख़्स महसूल वसूल करेगा वह जन्नत में दाख़िल नहीं होगा" — इसे अहमद ने रिवायत किया है। यह भी क़ुरआन की किसी मूल बुनियाद से नहीं जुड़ता। ये उदाहरण थोड़े हैं; अधिकतर मामलों में रसूलुल्लाह ﷺ के लाए नए हुक्म क़ुरआन की अपनी बुनियाद से जुड़े हुए होते हैं।
َAnd get two witnesses, from your own men, and if there are not two men, then a man and two women, such as you choose, for witnesses…) 282 Surat Al Baqarah, so in the money issue He commanded to take the testimony of women joined with a testimony of a man, then the Sunnah attached to that the oath with the witness, as the messenger (pbuh) decreed, it is narrated on the authority of Ali (MABPWH): decreed) pbuh (prophet The after a testimony of one witness and an oath" narrated by Al Daraqutny, so the witness and the oath would have the manner as the two male witnesses, or one male and two female witnesses. On this manner the Sunnah brought many verdicts that did not come in the Book, they are new legislation but attached to their origins. That does not mean that the Messenger (pbuh) did not bring new legislation unless it is attached to it's origin in the Qur'aan, nor does it mean that every new legislation the messenger brought must be attached to its origin in the Qur'aan, but that is the majority in most cases. However, The Messenger (pbuh) may bring a new legislation not attached to its origin in The Qur'aan, but it may not have an origin in The Qur'aan. An example for this, the affirmation of the public utilities to be from among the public ownership is a new legislation The Messenger (pbuh) brought when He said: " " The Muslims are partners in three: in the pasture, the water and the fire" Abu Dawood narrated it. This is not attached to its origin in The Qur'aan. And from that is the prohibition to take the custom tax which is َ :saying) pbuh (His by affirmed َّ max imposes whoever" (custom tax) does not enter paradise" narrated by Ahmad. It is not attached to its origin in The Qur'aan. This is only few, but the majority in most cases the new legislations the Messenger (pbuh) brought are attached to their origin in the Qur'aan.
इस प्रकार हम पाते हैं कि सुन्नत का आधार किताब (क़ुरआन) है, और उसमें जो कुछ आया है वह किताब के आदेशों और अर्थों की एक प्रकार की व्याख्या और स्पष्टीकरण है, जैसे उसके संक्षिप्त विषयों का विस्तार करना, उसके सामान्य (आम) आदेशों को विशिष्ट करना, उसके अनियंत्रित (मुतलक़) आदेशों को सीमित करना, और किसी शाखा (हुक्म) को उसके मूल से जोड़ना। इसके बावजूद, सुन्नत में नए विधान भी हैं जिनका कोई मूल क़ुरआन में नहीं आया। अतः सुन्नत क़ुरआन के लिए स्पष्टीकरण है, और आदेशों के लिए नया विधान भी है। जहाँ तक स्पष्टीकरण का संबंध है, वह अल्लाह तआला के इस कथन से सिद्ध होता है: "और हमने आप ﷺ की ओर भी यह ज़िक्र (क़ुरआन) उतारा है, ताकि आप लोगों के लिए स्पष्ट कर दें जो उनकी ओर उतारा गया है…" (सूरह अन-नहल, 44)। और जहाँ तक नए विधान का संबंध है, वह अल्लाह तआला के इस कथन से सिद्ध होता है:
Thus we find that the Sunnah is referable to the Book, and what came in it is a kind of explanation and elucidation of the verdicts meanings of the Book, like detailing its summed-up, specifying its general, limiting its unrestricted, and attaching a branch to its origin, and in spite of that, the Sunnah has new legislation for which no origin came in the Qur'aan. So the Sunnah is clarification for the Qur'aan, and new legislation for the verdicts. As for the clarification; it is indicated by the saying of Allah Ta'ala: and We have sent down unto you (also) the Message; that you may explain clearly to menkind what is sent to them…) 44 Surat Al Nahl, and as for the new legislation; it is indicated by His Ta'ala's saying:
َ ,yourselves among anything in differ you If (…... refer it to Allah and the Messenger…) 59 Surat Al Nisaa', and the returning to Allah is by returning to His Book, and the returning to the Messenger when He was alive, then when Allah Ta'ala made Him died; the returning became to His Sunnah. Hindi translation: यदि तुम किसी बात में आपस में मतभेद करो तो (…उसे अल्लाह और रसूल की ओर लौटाओ…) सूरतुन निसा 59। अल्लाह की ओर लौटना उसकी किताब की ओर लौटना है, और रसूल ﷺ की ओर लौटना, जब वे जीवित थे तब उनकी ओर लौटना था; फिर जब अल्लाह तआला ने उन्हें मृत्यु दी, तो लौटना उनकी सुन्नत की ओर हो गया। ﷺ
َ ,yourselves among anything in differ you If (…... refer it to Allah and the Messenger…) 59 Surat Al Nisaa', and the returning to Allah is by returning to His Book, and the returning to the Messenger when He was alive, then when Allah Ta'ala made Him died; the returning became to His Sunnah. The dispute in understanding the Qur'aan and deriving the verdicts is unrestricted, and the returning to the Sunnah is also unrestricted in both: what exist in the Qur'aan and what came as new legislation, therefore Allah Ta'ala said indeed he ,Messenger the obeys who He obeyed Allah…) 80 Surat Al Nisaa', and He said: (…then let those beware who withstand the Messenger's order…) 63 Surat Al Nour, and that is general, because it is an adjunct generic noun . Accordingly, the Sunnah is a shari'ahi evidence like the Book, and the Messenger of Allah (pbuh) said:I have left with you two things you will never stray if you adhere to them: the Book of Allah and the Sunnah of His Prophet" Maalik narrated it.