21.7 संधियों को निरस्त करना
21.7 Annulling Treaties
इस्लामी राज्य द्वारा हस्ताक्षरित सभी संधियाँ एक निश्चित अवधि तक सीमित होनी चाहिए। लेकिन किसी संधि को अनुबंधित करने का अर्थ यह नहीं है कि सभी परिस्थितियों में मुसलमानों को उससे बाध्य किया जाए, जैसे उसका अर्थ विश्वासघात और संधि का उल्लंघन भी नहीं है। बल्कि शरीअत द्वारा बताई गई विशेष परिस्थितियों में संधि को रद्द करना जायज़ है, और शरीअत द्वारा बताई गई परिस्थितियों के अतिरिक्त अन्य परिस्थितियों में उसे रद्द करना जायज़ नहीं है। जिन परिस्थितियों में शरीअत ने दुश्मन के साथ की गई संधि को रद्द करने की अनुमति दी है, वे इस प्रकार हैं:
All treaties signed by the Islamic State must be limited to a specific period. However, contracting a treaty does not mean compelling Muslims with it in all situations just as it does not mean betrayal and violation of the treaty. Rather it is allowed to annul the treaty in specific situations stated by the Shar’a, and it is not allowed to annul it in other than the situations the Shar’a stated. The situations for which the Shar’a stated the permissibility of annulling the treaty with the enemy are:
पहला: यदि अनुबंधित व्यक्ति (या व्यक्ति) मुसलमानों के किसी शत्रु की सहायता करें और मुसलमानों के विरुद्ध उसका समर्थन करें। जैसे कि जब इस्लामी राज्य और किसी अन्य राज्य के बीच सक्रिय युद्ध की स्थिति हो, और जिस राज्य के साथ इस्लामी राज्य की संधि हो, वह इस शत्रु की हथियारों, धन या सैनिकों से सहायता करे और हमारे विरुद्ध उसकी मदद करे। ऐसी स्थिति में इस्लामी राज्य के लिए संधि को रद्द करना जायज़ है, क्योंकि अल्लाह (SWT) फ़रमाता है: