5.1 विशेषज्ञ शोध (इज्तिहाद)
5.1 Expert Research (ijtihād)
भाषाई दृष्टि से इज्तिहाद का अर्थ है किसी काम को पूरा करने के लिए अपनी पूरी शक्ति और प्रयास लगाना, जिसमें कुछ कष्ट और कठिनाई उठानी पड़ती है। जहाँ तक उसूली विद्वानों की परिभाषा की बात है, तो इसका अर्थ है शरीयत के किसी हुक्म के बारे में प्रबल राय (ज़न) तक पहुँचने के लिए अपनी ऊर्जा इस हद तक लगाना कि मुज्तहिद को उससे अधिक प्रयास करने में असमर्थता महसूस होने लगे।
Linguistically Ijtihād is the exertion of ones utmost effort to realise a matter which entails a measure of discomfort and difficulty. As for the definition of the Usuli scholars, it is specifically the expenditure of ones energies in seeking a preponderant opinion (zann) about a thing from the Sharī’ah rules in a manner the mujtahid feels unable to exert any more.
इज्तिहाद की वैधता हदीस के पाठ से सिद्ध है। वर्णित है कि नबी ﷺ ने अबू मूसा (रज़ियल्लाहु अन्हु) को यमन भेजते समय उनसे फ़रमाया:
Ijtihād has been proven by the text of the hadīth. It has been narrated about the Prophet that he said to Abu Musa when he sent him to Yemen:
"अल्लाह की किताब के अनुसार फ़ैसला करो, और अगर उसमें (हल) न मिले तो अल्लाह के रसूल ﷺ की सुन्नत के अनुसार। और अगर उसमें भी न मिले तो अपना इज्तिहाद करो।"
“Judge by the book of Allah and if you do not find (solution there) then by the Sunnah of the Messenger of Allah. And if you do not find it there then exercise your own Ijtihād”
और उनसे यह वर्णन किया गया है कि उन्होंने मुआज़ और अबू मूसा अल-अश'अरी को यमन भेजते समय उनसे कहा ﷺ:
And it has been narrated about him that he said to Mu’az and Abu Musa al-Ash’ari having dispatched them to Yemen:
“आप किसके आधार पर फ़ैसला करेंगे?” उन्होंने कहा: अगर हमें हुक्म किताब और सुन्नत में नहीं मिलता, तो हम दो मामलों के बीच क़ियास करेंगे। जो बात हक़ के ज़्यादा क़रीब होगी, उसी पर हम अमल करेंगे।
“By what will you judge?’ They said: If we do not find the hukm in the Kitab and the Sunnah we will make analogy between two issues. Whatever is closer to the truth we will act upon that”
यह क़ियास (सादृश्यानुमान) इज्तिहाद है, जिसमें हुक्म निकाला जाता है, और नबी ﷺ ने उसे उनसे स्वीकार किया। यह उल्लेख किया गया है कि उन्होंने मुआज़ से कहा, जब उन्हें यमन का वाली (गवर्नर) बनाकर भेजा, ﷺ
This Analogy (qiyas) is Ijtihād by deriving the hukm and the Prophet accepted it from them. It has been reported about him that he said to Mu’az when he sent as Wali (governor) to Yemen:
“आप किस आधार पर फ़ैसला करेंगे?” उन्होंने कहा: अल्लाह की किताब के आधार पर। नबी ﷺ ने फ़रमाया: अगर आप उसमें न पाएँ तो? उन्होंने कहा: अल्लाह के रसूल ﷺ की सुन्नत के आधार पर। नबी ﷺ ने फ़रमाया: और अगर उसमें भी न पाएँ तो? उन्होंने कहा: “मैं अपनी इज्तिहाद करूँगा।” नबी ﷺ ने फ़रमाया: “उस अल्लाह की तारीफ़ है जिसने अल्लाह के रसूल के दूत को उस चीज़ की तौफ़ीक़ दी जो अल्लाह और उसके रसूल ﷺ को पसंद है।”
“By what will you pass Judgement ?’ He said: By the Book of Allah. The Prophet said: If you do not find it there ? He said: By the sunnah of the Messenger of Allah . He said: And if you do not find it ? He said: ‘I will exercise my own Ijtihād’ He said: ‘Praise be to Allah who has made the messenger of the Messeneger of Allah to accord with what Allah and His Messenger loves”
यह बात प्रॉफ़ेट की उस स्वीकृति से स्पष्ट है जो उन्होंने मुआज़ के इज्तिहाद करने के इरादे को दी, और इज्तिहाद की वैधता पर किसी का भी मतभेद नहीं है। इसके अलावा, सहाबा का इस विषय पर इज्मा' (सर्वसम्मति) हुआ कि शरीयत के प्रमाणों से निकाले गए मत के आधार पर फैसला किया जा सकता है, अर्थात् उन्होंने इस पर सहमति जताई कि जब कोई ऐसी घटना सामने आए जिसके लिए कोई (स्पष्ट) नस न मिले, तो उस पर इज्तिहाद का प्रयोग किया जाए। और यह बात हम तक तवातुर (लगातार पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रसारित होने वाली रिवायतों) के रूप में पहुँची है, जिसमें कोई संदेह नहीं है। ऐसी ही एक रिवायत अबू बक्र की वह बात है जो उन्होंने कलाला के बारे में पूछे जाने पर कही। उन्होंने कहा: 'मैं इस बारे में अपनी राय के अनुसार बोलूँगा। यदि यह सही है तो अल्लाह की ओर से है, और यदि गलत है तो मेरी ओर से और शैतान की ओर से है, और अल्लाह इससे बरी है। कलाला वह है जिसके न कोई संतान हो और न माता-पिता जीवित हों।' उनका कथन 'मैं इस बारे में अपनी राय के अनुसार बोलूँगा' इसका यह अर्थ नहीं कि यह राय उनकी अपनी है। बल्कि इसका अर्थ है कि मैं आयत में आए शब्द 'कलाला' से जो समझता हूँ, उसके अनुसार कहूँगा। अरबी भाषा में 'कलाला' तीन प्रकार के लोगों पर लागू होता है: वह जिसने न कोई संतान छोड़ी हो और न माता-पिता, या वह जिसके वंश में बेटा या पिता न हो, और संतान या पिता की दिशा के अलावा के रिश्तेदार। तो आयत में 'कलाला' शब्द पर इनमें से कौन-सा अर्थ लागू होगा? अबू बक्र ने उसे इन्हीं अर्थों में से एक समझा, और उनका कथन है:
This is clear in the Prophet’s acceptance of Mu’az’s intention to practise Ijtihād and there is no one who disputes the legality of Ijtihād. Furthermore, an ijma’ (consensus) of the Sahabah took place on the issue of judging by an opinion which has been deduced from the Sharī’ah evidence i.e, they have agreed on the use of Ijtihād on any incident that takes place for which no (clear) text has been found. And this is what has reached us in successive reports (tawatur) in which there is no doubt. One such report is the saying of Abu Bakr when he was asked about the Kalala. He said: ‘I will speak about it according to my opinion. If it is correct then it is from Allah . If it is a mistake then it is from me and from Shaytan and Allah has nothing to do with it. Kalala is the one who has no children or parents left.’ His statement: ‘I will speak about it according to my opinion’ does not mean this opinion is from him. Rather it means I will say according to what I understand from the expression ‘Kalala’ in the verse. Kalala in the Arabic language applies to three people; the one who did not leave a child or parent or the one who does not have a son or a father from his descendants and the relatives from other than the direction of the child or father. So which of these meanings would apply to the word kalala in the verse ? Abu Bakr understood it to have one of those meanings in His saying:
"यदि वह पुरुष या स्त्री, जिसकी विरासत का प्रश्न है, न कोई पूर्वज (उसल) छोड़ गया हो और न कोई वंशज (फ़रअ)" [TMQ Nisā’: 12]
“If the man or woman whose in hereitence is in question has left niether ascendents or descendents” [TMQ Nisā’: 12]
कलाला, कान (kāna) क्रिया का ख़बर (khabar) है, यानी अगर वह आदमी अपने पीछे कोई पूर्वज (ascendents) या वंशज (descendents) विरासत पाने के लिए नहीं छोड़ता। शायद उसने यह दूसरी आयत से भी समझा होगा:
Kalala is the predicate (khabar) of the verb ‘to be’ (kana) i.e, if the man leaves no ascendents or descendents to inherit after him. He probably understood this also from the second verse:
"कहो: "अल्लाह कलाला (वह व्यक्ति जो न संतान छोड़े न माता-पिता या ऊपर की पीढ़ी के वारिस) के बारे में इस प्रकार आदेश देता है। यदि कोई पुरुष मरे और उसकी कोई संतान न हो""
“Say: “ Allah directs (thus) about al-Kalala (those who leave niether descendents nor ascendents as heirs). If it is a man that dies leaving no child”
और उस हदीस से भी जो आयत के कारण (सबब-ए-नुज़ूल) के बारे में रिवायत की गई है।
And also from the hadīth which has been reported about the cause of the verse:
कहो: "निश्चय अल्लाह ही (सीधा) मार्गदर्शन देता है।" [TMQ Nisā’: 176]
“Say: “ Allah directs (thus).” [TMQ Nisā’: 176]
यह वर्णित है कि रसूलुल्लाह ﷺ जाबिर इब्न अब्दुल्लाह के पास गए जो बीमार थे। उन्होंने कहा: मेरे कोई पूर्वज (माता-पिता, दादा आदि) या वंशज (संतान) नहीं हैं। तो मैं अपने धन का क्या करूँ? इसी पर यह आयत उतरी:
It has been reported that the Messenger visited Jabir ibn ‘Abd Allah who was ill. He said: I leave no ascendents or descendants. What shall I do with my wealth? Thus the verse:
"अगर किसी मर्द की मौत हो जाए" [TMQ Nisā’: 176]
“If it is a man that dies” [TMQ Nisā’: 176]
वह आयत जाबिर के प्रश्न के उत्तर में उतरी थी। अबू बक्र (रज़ि.) ने जो राय व्यक्त की वह इज्तिहाद है और यह उनकी अपनी ओर से नहीं निकली। इसी इज्तिहाद से अबू बक्र (रज़ि.) ने नानी को विरासत में शामिल किया और दादी को उसमें से बाहर रखा। अंसार में से कुछ लोगों ने उनसे कहा:
was revealed in response to the question of Jabir. This opinion which Abu Bakr stated is an Ijtihād and it does not emanate from himself. Also from this Ijtihād Abu Bakr included the mothers mother in the inheritance to the exclusion of the father’s mother. Some of the Ansar said to him:
"आप एक महिला को मृत व्यक्ति की विरासत देते हैं, जबकि वही व्यक्ति, यदि वह महिला मर जाती, तो उसकी विरासत नहीं पाता। फिर भी आपने एक ऐसी महिला की अनदेखी की, जिसके मरने पर वह व्यक्ति उसकी छोड़ी हुई पूरी संपत्ति का उत्तराधिकारी होता।"
‘You give inheritance to a woman from a deceased person who would not inherit from her if she died. Yet you ignored a woman, who if she had died, he would have inherited everything she left behind.’
तो अबू बक्र ने दोनों दादियों को विरासत में बराबर हिस्सा दिया। अबू बक्र सभी मुसलमानों को बराबर उपहार भी दिया करते थे। इस मामले में उमर ने उनसे कहा:
So Abu Bakr gave both grandmothers equal shares in the inheritance. Abu Bakr also used to give equal gifts to the Muslims. ‘Umar said to him concerning this matter:
‘जो लोग नबी ﷺ के लिए हिजरत कर गए और अपने घर-बार तथा माल पीछे छोड़ दिए, उन्हें उन लोगों के बराबर न रखो जो ज़बरदस्ती के दबाव में इस्लाम लाए।’
‘do not put those who emigrated for the Prophet and left their homes and wealth behind on an equal footing with those who embraced Islam under duress.’
अबू बक्र ने उत्तर दिया:
Abu Bakr answered:
उन्होंने अल्लाह के लिए इस्लाम अपनाया, और दुनिया केवल एक संदेश (बलाग़) है।
‘They embraced Islam for the sake of Allah , and the Dunya is nothing but a message (Balagh).’
उसी प्रकार ‘उमर ने कहा:
Likewise ‘Umar said:
"मैं दादा (पिता के पिता) के बारे में अपनी राय से फ़ैसला करता हूँ और उसके बारे में अपनी राय के अनुसार बात कहता हूँ। यानी, नुसूस (धार्मिक ग्रंथों के पाठों) की उसकी अपनी समझ के अनुसार।"
‘I judge concerning the paternal grandfather (father’s father) by my opinion and state concerning it according to my opinion. i.e. according to his understanding of the texts’
ʿUmar के शासनकाल में एक महिला का देहांत हुआ, और उसने पीछे पति, माता, दो सगे-सौतेले (मातृपक्षीय) भाई और दो पितृपक्षीय भाई छोड़े। ʿUmar ने पहले सोचा कि मातृपक्षीय भाइयों को एक-तिहाई हिस्सा उनके अधिकार के रूप में मिलना चाहिए, लेकिन इससे पितृपक्षीय भाइयों के लिए कुछ भी नहीं बचता था। पितृपक्षीय भाई ʿUmar के पास आए और उनसे कहा:
n the time of ‘Umars rule a woman passed away leaving behind a husband, mother, two maternal brothers and two paternal fathers. ‘Umar first thought that the maternal brothers should have the third as their right, but this left nothing to the paternal brothers. The paternal brothers approached ‘Umar and said to him:
"अगर मान लिया जाए कि हमारा बाप एक गधा है (दूसरी रिवायतों में, एक पत्थर है), तब भी क्या हम एक ही माँ की औलाद नहीं हैं?"
‘Assume that our father is but a donkey (in other narrations, a stone) – are we still not of one mother?’
तो 'उमर ने अपना विचार बदल दिया और तीसरे हिस्से में सभी भाइयों को बराबर हिस्से दे दिए, इसके बावजूद कि सहाबा ने अलग तरीके से फ़ैसला किया था। उन्होंने पति को विरासत का आधा हिस्सा दिया था, माँ को विरासत का छठा हिस्सा दिया गया था जैसा कि नस (क़ुरआन के पाठ) में निर्धारित है, और आख़िरी तिहाई सगे भाइयों (मातृपक्षीय भाइयों) को दिया गया जैसा कि नस में तय है, इस प्रकार सौतेले भाइयों (पितृपक्षीय भाइयों) के लिए कुछ भी नहीं बचा। 'उमर ने समझा कि मातृपक्षीय भाई उस व्यक्ति के माँ की ओर से भाई थे, लेकिन यह हुक्म केवल मातृपक्षीय भाइयों पर लागू नहीं होता, बल्कि पितृपक्षीय भाइयों पर भी लागू होता है। माँ उन सब के बीच साझा कड़ी थी, इसलिए जब पितृपक्षीय भाइयों के लिए कुछ नहीं बचा था, तो उनका हक़ मातृपक्षीय भाइयों के हिस्से में से वह था जो उन्हें मिलना चाहिए था। बाक़ी सहाबा ने इसे अलग तरह से देखा; उन्होंने नस को समझा और अपना इज्तिहाद किया। इसके अलावा उस मामले पर भी विचार करें जब एक मुसलमान, जिसका नाम समरह था, ने एक यहूदी व्यापारी से शराब का दसवाँ हिस्सा (चुंगी के रूप में) लिया, उसे बोतलों में भरा और फिर बेच दिया। तब 'उमर ने कहा
So ‘Umar changed his mind and gave all the brothers equal shares in the third, in spite of the fact the Sahabah had judged differently. They had given the husband one half of the inheritance, one sixth of the inheritance was given to the mother as decreed in the text, and the final third was given to the maternal brothers as also determined in the text, thus leaving nothing for the paternal brothers. ‘Umar understood that the maternal brothers were brothers of the man from his mother’s side, but this applied not just to the maternal brothers but also to the paternal brothers. The mother was the common factor between them all, so when nothing had been left to the paternal brothers, their right was of what they deserved from the maternal brothers. The rest of the Sahabah saw it differently; they understood the text and made their own Ijtihād. Consider also the case when a Muslim, named Samrah took from a Jewish merchant a tenth portion of alcohol (as customs), bottled it and then sold it. So ‘Umar said
“अल्लाह समुरा से लड़े। क्या उसे नहीं पता कि नबी ﷺ ने फ़रमाया: ‘अल्लाह यहूदियों पर लानत करे। उन पर चर्बी हराम कर दी गई थी, तो उन्होंने उसे पिघलाकर बेच दिया।’”
“May Allah fight Samrah. Does he not know that the Prophet said: ‘May Allah curse the Jews. The fat was made Haram upon them, so they ornamented it and sold it.’”
इस मामले में, 'उमर ने शराब और चर्बी के बीच क़ियास (तुलना) किया और कहा कि उसका हराम होना उसकी बिक्री की क़ीमत के हराम होने का मतलब है। इजतिहाद का एक और उदाहरण वह है जो 'अली ने शराब पीने के अपराध की सज़ा (हद) के बारे में कहा। उन्होंने कहा:
In this case, ‘Umar made the analogy between the alcohol and the fat, and that prohibition of it meant prohibition of its selling price. A further example of Ijtihād is what ‘Ali said regarding punishment (Hadd) for the crime of drinking alcohol. He said:
"जो कोई इसे पिएगा वह बकवास करेगा, और जो ऐसा करेगा वह झूठ गढ़ेगा, इसलिए मेरी राय है कि उसे झूठ गढ़ने वाले की तरह सज़ा दी जानी चाहिए।"
‘Whoever drinks it will speak nonsense, and who did so would fabricate lies, so I see that he must be punished like the fabricator of lies.’
जैसे पिछले उदाहरण में 'उमर (रज़ि.) ने किया था, वैसे ही 'अली (रज़ि.) ने भी शराब पीने और झूठ गढ़ने के बीच तुलना (क़ियास) की, क्योंकि उन्होंने शरीअत से यह समझा कि जो चीज़ होने की संभावना रखती है, उसे वैसा ही माना जाता है जैसे वह हो चुकी हो। यह वैसा ही है जैसे शरीअत ने नींद को हदस (धार्मिक अपवित्रता) के समान माना, और सहवास के कार्य को इद्दत (तलाक़ के बाद वह क़ानूनी अवधि जिसमें स्त्री दूसरे विवाह से पहले प्रतीक्षा करती है) में उसी तरह माना जैसे गर्भ ठहर गया हो। ये सब सहाबा के इज्तिहाद और इज्मा-ए-सहाबा के उदाहरण हैं, जो इज्तिहाद के विषय पर हैं।
Like ‘Umar in the previous example, ‘Ali made an analogy between drinking and fabrication of lies because he understood from Shar’a that which is likely to happen is treated the same as that which happens. This is like when the Shar’a treated sleeping the same as ritual impurity, and the act of sexual intercourse in requiring the Iddah (legal period a woman waits after divorce for marriage) the same as if the womb had become engaged (pregnant). All these are examples of Ijtihād by the Sahabah and Ijma’a as-Sahaba on the issue of Ijtihād.
किसी हुक्म (शरई निर्णय) को उन मसलों पर लागू करना, जो उसी के अंतर्गत आते हैं, इज्तिहाद नहीं माना जाता, बल्कि यह केवल शरीअत के हुक्म की समझ (फ़हम) है। इसका कारण यह है कि इज्तिहाद का अर्थ है नस (शरई पाठ) से हुक्म निकालना, चाहे वह नस के शब्दों से हो (मंतूक), उसके अर्थ और भावार्थ से हो (मफ़हूम), या उसके संकेत (दलालत) से हो।
The application of a hukm on issues which are classified under it is not considered Ijtihād rather but only as the comprehension of the Sharī’ah rule. Since Ijtihād is the inference of a hukm from the text whether from its wording (mantooq), understanding (mafhoom), from its indication (dalalah)
या उस 'illah से जो पाठ में उल्लिखित है। चाहे अनुमान किसी व्यापक हुक्म (हुक्म कुल्ली) का किसी व्यापक प्रमाण (दलील कुल्ली) से हो; जैसे यह अनुमान कि चोर को दंड दिया जाना चाहिए, क्योंकि शरीयत देने वाले ने चोरी के लिए हाथ काटने को हद का दंड बनाया है। या अनुमान किसी आंशिक हुक्म (हुक्म जुज़ई) का किसी आंशिक प्रमाण (दलील जुज़ई) से हो; जैसे किराए पर लेने (इजारा) के हुक्म का निकालना, क्योंकि नबी ﷺ
or from the ‘illah which has been mentioned in the text. Whether the inference was an inference of a comprehensive hukm (hukm kulli) from a comprehensive evidence (dalīl kulli); for example, the inference that a punishment should be imposed on the thief since the legislator made the cutting of the hand a hadd punishment for theft. Or the inference could be of a partial hukm (hukm juz’i) from a partial evidence (dalīl juz’i); such as the deduction of the hukm of hiring since the Prophet PBUH
(नबी ﷺ) ने बनी अद-दुइल के एक व्यक्ति को अनुभवी मार्गदर्शक के रूप में किराए पर लिया। [बुखारी ने इसे रिवायत किया है।] और उनके इस कथन से:
“(The Prophet PBUH) Hired a worker from Bani al-Du’l as an experienced guide” [Reported by Bukhari] And from His saying:
"फिर यदि वे तुम्हारे लिए (बच्चे को) दूध पिलाएँ, तो उन्हें उनका पारिश्रमिक दे दो" [TMQ Talaaq: 6]
“Then if they give suck to the children for you, give them their due payment” [TMQ Talaaq: 6]
या जैसे पैगंबर ﷺ के इस कथन से मज़दूर को उसका काम पूरा करने के बाद उसकी मज़दूरी देने के हुक्म का इस्तिंबात (अनुमान) करना: "मज़दूर को उसकी मज़दूरी उसका पसीना सूखने से पहले दे दो।"
Or like the inference of the hukm of giving the worker his wage after he has finished his work due to the Prophet’s saying:
"मज़दूर को उसकी मज़दूरी उसका पसीना सूखने से पहले दे दो" [Reported by Ibn Majah on Behalf of Abdullah Ibn Umar]
“Give the worker his wage before his sweat dries” [Reported by Ibn Majah on Behalf of Abdullah Ibn Umar]
यह एक आंशिक दलील से एक आंशिक हुक्म (निर्णय) का प्रमाण है। अतः किसी सम्पूर्ण दलील से एक सम्पूर्ण हुक्म निकालना, और किसी आंशिक दलील से एक आंशिक हुक्म निकालना, यह सब इज्तिहाद माना जाता है, क्योंकि यह किसी दलील से हुक्म को ग्रहण करना है, चाहे वह हुक्म सामान्य हो जो किसी सामान्य दलील से निकाला गया हो, या वह हुक्म विशेष हो जो किसी विशेष दलील से निकाला गया हो। इन सब में दलील से हुक्म समझने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगाना शामिल है। जहाँ तक नई समस्याओं पर उस हुक्म को लागू करने की बात है, जो उसके अर्थ में आती हैं या उसी के अंतर्गत वर्गीकृत होती हैं और उसका एक अंग हैं, तो इसे इज्तिहाद नहीं माना जाता। उदाहरण के लिए, अल्लाह ने मुर्दार (मरे हुए जानवर) को हराम ठहराया है। जब किसी गाय को सिर पर वार करके मार दिया जाए यहाँ तक कि वह मर जाए, तो उसका गोश्त नहीं खाया जाता, क्योंकि वह मुर्दार के रूप में मर चुकी है और उसे शरई तरीके से ज़बह नहीं किया गया, और मुर्दार का गोश्त हराम है। और डिब्बाबंद गोश्त का हुक्म, जो उस गाय से आता है जिसे शरई तरीके से ज़बह नहीं किया गया, शरीअत में उसका खाना और बेचना हराम है। यह हुक्म निकाला नहीं गया है, बल्कि यह "मुर्दार" शब्द के अंतर्गत वर्गीकृत है। इसी तरह, ड्रूज़ लोगों द्वारा ज़बह किए गए जानवर नहीं खाए जाते, क्योंकि उन्हें किसी मुसलमान या किताब वालों में से किसी ने ज़बह नहीं किया। अतः यह हुक्म, यानी ड्रूज़ के ज़बह किए गए जानवर को खाने की मनाही, निकाला नहीं गया है। बल्कि एक पहले से ज्ञात हुक्म उस पर लागू किया गया है, जो यह है कि उन काफ़िरों के ज़बह किए गए जानवर नहीं खाए जाते जो किताब वालों में से नहीं हैं। इसी प्रकार, किसी महिला का मजलिस अश-शूरा का सदस्य होना जायज़ होना एक शरई हुक्म है। यह हुक्म निकाला नहीं गया है, बल्कि उस पर वकाला (प्रतिनिधित्व) का हुक्म लागू किया गया है। मजलिस अश-शूरा की सदस्यता किसी राय का प्रतिनिधित्व करना है। महिला के लिए जायज़ है कि वह दूसरों को अपनी राय पेश करने के लिए प्रतिनिधि बनाए, और वह दूसरों की राय की प्रतिनिधि बन सकती है। उदाहरण के लिए, ज़कात उसी को दी जाती है जो गरीब हो, और उसकी गरीबी ऐसे अनुमानित संकेतों (अमारात-ए-ज़न्नी) से सिद्ध होती है जिनके लिए उसके वैध रूप से विचार किए जाने का प्रमाण दिया गया हो। किसी फैसले पर तब तक निर्णय नहीं दिया जाता जब तक किसी न्यायप्रिय व्यक्ति ('अदल) का बयान न हो, और उसकी विश्वसनीयता ('अदाला) (न्यूनतम) संदेह के साथ ज्ञात हो। इसी प्रकार, कोई व्यक्ति क़िबला (नमाज़ की दिशा) का पता लगाने के लिए जांच-पड़ताल करता है, यहाँ तक कि जांच के बाद क़िबला ज्ञात हो जाता है, और इसी तरह के अन्य उदाहरण भी हैं। ये सभी मामले इज्तिहाद के द्वारा तय नहीं होते, जो शरीयत के प्रमाणों से हुक्म निकालना है, बल्कि ये मामले विस्तृत मसलों (जुज़इय्यात) पर हुक्म लागू करके, या विस्तृत मसलों को समझकर उन पर हुक्म लागू करके तय होते हैं। यह तरीका क़ज़ा (न्यायिक व्यवस्था) के दायरे में आता है और इसे इज्तिहाद नहीं माना जाता। इसे इज्तिहाद इसलिए नहीं माना जाता क्योंकि इसमें कोई विशेष शरई हुक्म तय नहीं होता, बल्कि केवल एक ऐसी घटना पर शरई हुक्म लागू किया जाता है जो पहले से तय और समझी जा चुकी है। जब उसी प्रकार की कोई दूसरी घटना होती है, तो पहली घटना की तरह उस पर भी वही हुक्म लागू कर दिया जाता है, इसलिए इसे इज्तिहाद नहीं कहा जाता। शरई हुक्मों को प्रमाण से समझने के बाद उन्हें लागू करना होता है, न कि इज्तिहाद करना, जबकि शरई नुसूस हुक्म-ए-शरई अपनाने के लिए इज्तिहाद की आवश्यकता बताते हैं। इसलिए,
"वैध इज्तिहाद वह है जिसमें व्यक्ति शरीयत के नुसूस (ग्रंथों) को समझने और उनसे हुक्म निकालने के लिए अपनी पूरी कोशिश करता है। यह उन मसलों पर शरीयत के हुक्मों को लागू करने में अपनी पूरी कोशिश करना नहीं है जो उसके अंतर्गत वर्गीकृत हैं।"
“The legitimate Ijtihād is exertion of ones utmost to understand the Sharī’ah texts in order to deduce the ruling from it. It is not the exertion of ones utmost in applying the Sharī’ah rules on the issues that are classified under it.”
इस्लामी शरीअत के पाठ मुसलमानों से इज्तिहाद करने की माँग करते हैं। इसका कारण यह है कि शरीअत के ये पाठ विस्तार से नहीं आए, बल्कि मुजमल (संक्षिप्त और अस्पष्ट) रूप में आए हैं, जो मानव जाति की हर घटना पर लागू होते हैं। इन्हें समझना और इनसे हर घटना के लिए अल्लाह का हुक्म-ए-शरई निकालना, इसके लिए प्रयास खर्च करने की आवश्यकता होती है। यहाँ तक कि वे पाठ भी जो विस्तार से आए हैं और सूक्ष्म विवरणों से संबंध रखते हैं, वास्तव में आम (‘आम) और मुजमल (अस्पष्ट) ही हैं। उदाहरण के लिए, विरासत की आयतें विस्तारपूर्वक स्पष्ट की गई हैं और सूक्ष्म विवरण देती हैं, फिर भी आंशिक नियमों की दृष्टि से कई मसलों में, जैसे कलाला का मसला और हजब (विरासत से वंचित करने) के मसले, उन्हें समझने और निष्कर्ष निकालने की ज़रूरत होती है। सभी मुज्तहिदीन की राय है कि बेटा या बेटी विरासत में मृतक के भाइयों पर प्राथमिकता रखते हैं, क्योंकि शब्द ‘वलद’ (संतान) दोनों लिंगों की संतानों के लिए प्रयुक्त होता है। इब्न अब्बास की राय है कि बेटी की यह भूमिका नहीं होती, क्योंकि शब्द ‘वलद’ केवल पुरुष के लिए प्रयुक्त होता है। इससे स्पष्ट होता है कि वे पाठ भी जो विभिन्न मसलों को विस्तार से बयान करते हैं, मुजमल (अस्पष्ट) रूप में आए हैं, और उनसे हुक्म समझने और निकालने के लिए इज्तिहाद आवश्यक है। फिर भी, ये विस्तृत पाठ नई घटनाओं पर लागू करने की ज़रूरत रखते हैं। यह लागू करना, however, वह नहीं है जिसे इज्तिहाद कहा जाता है। इज्तिहाद से अभिप्राय उस हुक्म का निष्कर्ष निकालना है जो उनके मुजमल (संक्षिप्त/अस्पष्ट) रूप से निकलता है, भले ही वे विवरण देते हों। वे आम और मुजमल हैं, और वे विधायी पाठ हैं। विधायी पाठों की प्रकृति ही यह है कि वे आम और मुजमल हों, भले ही वे विवरणों में गहराई से जाते हों। शरीअत के पाठ, चाहे वे कुरआन से हों या सुन्नत से, चिंतन के क्षेत्र के लिए सर्वोत्तम विधायी पाठ हैं, सामान्यीकरण के लिए सबसे व्यापक दायरा रखते हैं, और सामान्य सिद्धांतों को विकसित करने के लिए सबसे उपजाऊ भूमि हैं। और केवल यही पाठ सभी लोगों और राष्ट्रों के लिए विधायी पाठ के रूप में उपयुक्त हैं। जहाँ तक चिंतन के क्षेत्र के लिए सर्वोत्तम पाठ होने की बात है, तो यह इस तरीके से स्पष्ट है कि वे सभी प्रकार के संबंधों को किस प्रकार समेटते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि सभी प्रकार के संबंध, चाहे व्यक्तियों के बीच के संबंध हों, या राज्य और नागरिकों के बीच के संबंध हों, या राज्यों, लोगों और राष्ट्रों के बीच के संबंध हों, वे चाहे कितने भी नए और विविध क्यों न हों, चिंतन उन शरीयत-पाठों से उनके लिए आदेश निकालने में सक्षम है। इसलिए वे सभी विधायी पाठों में चिंतन के क्षेत्र के लिए सर्वोत्तम पाठ हैं। जहाँ तक सामान्यीकरण के लिए सर्वोत्तम दायरा होने की बात है, वह उनके वाक्यों, शब्दों और अभिव्यक्ति की शैली से स्पष्ट है, जिसमें वे शब्दार्थ (मंतूक), अर्थ-बोध (मफ़हूम), संकेत (दलाला) और कारण-बोध (तअलील) तथा उस ‘इल्लत’ से सादृश्य को समेटते हैं, जो हर कर्म के लिए अनुमान को संभव, स्थायी और व्यापक बनाती है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि वे हर चीज़ को समेटने में सक्षम हैं, पूर्ण और सामान्य होने के कारण। जहाँ तक सामान्य सिद्धांतों की खेती के लिए सबसे उपजाऊ भूमि होने की बात है, वह इन पाठों में निहित सामान्य अर्थों की प्रचुरता और उन सामान्य अर्थों की प्रकृति से स्पष्ट है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कुरआन और हदीस विस्तृत विवरणों को छूते समय भी व्यापक रेखाओं में आए हैं। इन व्यापक रेखाओं की प्रकृति यह है कि वे किताब और सुन्नत को ऐसे सामान्य अर्थ देती हैं जिनके अंतर्गत सामान्य और विशेष मामलों का वर्गीकरण किया जा सकता है, और इसी से सामान्य अर्थों की प्रचुरता आती है। इसके अलावा, ये सामान्य अर्थ वास्तविक और प्रत्यक्ष मामलों को समेटते हैं, न कि सैद्धांतिक या तार्किक रूप से निकाले गए काल्पनिक मामलों को। साथ ही, वे मनुष्य की समस्याओं को हल करने के लिए हैं, न कि केवल विशेष व्यक्तियों के लिए; अर्थात मनुष्यों के कर्मों के लिए आदेश स्पष्ट करने हेतु हैं, चाहे उन्हें इस कर्म की ओर जिस भी सहज प्रवृत्ति ने प्रेरित किया हो। इसी कारण ये (शरई नुसूस) विभिन्न अर्थों और अनेक अहकाम पर लागू होने योग्य होते हैं। अतः शरीयत के नुसूस (पाठ) सामान्य सिद्धांतों (क़वाइद आम्मा) को उत्पन्न करने के लिए सबसे उपजाऊ भूमि हैं।
"यदि कोई न्यायाधीश फ़ैसला सुनाए और इज्तिहाद करे, और वह सही हो, तो उसे दो पुण्य मिलेंगे। और यदि वह गलती करे, तो उसे एक पुण्य मिलेगा।" [बुखारी और मुस्लिम ने इसे रिवायत किया है]
“If a judge passes judgment and makes Ijtihād and he is right then he will have two rewards. And if he makes a mistake he will have one.” [Reported by Bukhari & Muslim
सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने इस बात पर इज्मा (सर्वसम्मति) कर लिया था कि शरीअत के अहकाम में, ज़न्नी फिक़्ही मसाइल के सिलसिले में, मुजतहिदीन से गुनाह हटा दिया गया है। रही क़तई मसाइल की बात, जैसे इबादतों का फ़र्ज़ होना, ज़िना और क़त्ल की हुरमत, तो इनमें न इज्तिहाद है और न इनके बारे में कोई इख़्तिलाफ़ है। यही वजह है कि सहाबा ने ज़न्नी मसाइल में इख़्तिलाफ़ किया, क़तई मसाइल में नहीं।
The Sahabah formed an ijma’ (consensus) that the sin is taken off from the Mujtahiddin in the Sharī’ah rules in terms of the speculative fiqhi (jurisprudential) issues. As for the definite issues such as the obligation of the worships, prohibition of fornication and murder there is no Ijtihād or dispute with respect to them. That is why the Sahabah disagreed on the speculative issues and not on the definite issues.
जो मुजतहिद ज़न्नी (अनुमानित) मसलों में अपने इज्तिहाद से जिस नतीजे पर पहुँचता है, वह उसमें सही है, भले ही उसकी राय में गलती की संभावना बनी रहे। लेकिन सही होने का मतलब यह नहीं है कि उसने सच्चे निशाने को पा लिया है, क्योंकि यह ज़न्नी हुक्म की वास्तविकता के अनुरूप नहीं है, इसलिए कि रसूल ﷺ ने उसे "मुख़्ति’" (गलती करने वाला) कहा है। बल्कि मुजतहिद के सही होने से जो अभिप्राय है, वह ऐसे शब्दों में है जो गलती की संभावना को नकारते नहीं, न कि इसमें कि उसने "इसाबा" (सच्चे निशाने को पाना) हासिल कर लिया, जो गलती के विपरीत है। अतः जो इज्तिहाद में गलती करता है, उसे "मुसीब" (सही) कहना इस अर्थ में है कि नस (शरई पाठ) मुजतहिद को उस समय भी सवाब देता है जब वह गलती करता है, न कि इस अर्थ में कि उसने गलती नहीं की। इसलिए हर मुजतहिद अपनी सोच के अनुसार सही है, जो गलती की संभावना को नकारता नहीं। यह सही पहुँचने के अर्थ में है, न कि सच्चे निशाने को पाने के अर्थ में।
The mujtahid in the speculative issues is correct in what he has arrived at by his Ijtihād even if he is liable to make a mistake in his opinion. However, being correct does not mean that he has hit the true target because this does not agree with the reality of a speculative rule since the Messenger called him a mukhti’ (one who has made a mistake). Rather what is meant by saying that the mujtahid is right is in terms that do not rule out a mistake and not in terms of hitting the true target (isaba) which is the opposite of mistake. So describing someone who makes a mistake in Ijtihād as right (musib) is in the meaning that the text rewards the mujtahid even when he makes a mistake and not in the sense that he did not make a mistake. Therefore, every mujtahid is right according to what he thinks is right which does not rule out mistake. It is in terms of getting it right and not in terms of hitting the true target.