2.11 अल्लाह की सिफ़ात (गुण)
2.11 The Attributes [sifāt] Of Allah
मुतकल्लिमून (इल्मे कलाम के विद्वान) के उदय से पहले अल्लाह की सिफ़ात का मसला मालूम नहीं था; अध्ययन के विषयों में से किसी भी विषय में इसका कोई स्थान नहीं था। "सिफ़ातुल्लाह" (अल्लाह की सिफ़ात) का शब्द न तो क़ुरआन-ए-करीम में आया है और न ही हदीसों में। यह ज्ञात नहीं है कि सहाबा में से किसी ने "सिफ़ातुल्लाह" वाक्यांश का उल्लेख किया या उसके बारे में बात की हो। क़ुरआन में जो कुछ आया है और जिसे मुतकल्लिमून "अल्लाह की सिफ़ात" कहते हैं, उसे उसके इस कथन के प्रकाश में समझना चाहिए,
Before the emergence of the Scholastics [Mutakallimūn] the issue of Allah's attributes was not known; it did not have a part in any study from amongst the studies. The expression ‘Sifāt Allah’ [attributes of Allah] has not come in the Noble Qur’ān or in the ahādith. It is not known that any of the sahābah mentioned or spoke about the phrase ‘Sifāt Allah’. Everything that has come in the Qur’ān which the Scholastics [Mutakallimūn] say is the ‘attributes of Allah’ must be understood in the light of His saying,
"तेरा पालनहार पवित्र है, जो इज़्ज़त और ताक़त का मालिक है, उन बातों से जो वे उसके बारे में कहते हैं!" [TMQ Sāāfāt: 180]
“Glorified is your Lord, the Lord of Honour and Power, above what they attribute unto Him!” [TMQ Sāāfāt: 180]
और उसका कथन,
And His saying,
"उसके समान कोई नहीं है" [TMQ Shurā: 11]
“There is nothing like unto Him” [TMQ Shurā: 11]
और उसका कथन,
And His saying,
"कोई दृष्टि उसे नहीं पा सकती" [TMQ An’ām: 103]
“No vision can grasp Him” [TMQ An’ām: 103]
तो अल्लाह का वर्णन केवल क़ुरआन से और जैसा क़ुरआन में आया है वैसे ही लिया जाता है। इस प्रकार, (उसके) ज्ञान का वर्णन उसके इस कथन जैसे (वचनों) से लिया जाता है,
Then the description of Allah is taken only from the Qur’ān and as it is mentioned in the Qur’ān. Thus, (the description of His) knowledge is taken from the like of His saying,
“और उसी के पास गैब (अदृश्य) की कुंजियाँ हैं, उन्हें उसके सिवा कोई नहीं जानता; और वह जानता है जो कुछ धरती में और समुद्र में है। कोई पत्ता नहीं गिरता, मगर वह उसे जानता है। धरती के अंधेरों में कोई दाना नहीं, न कोई हरी या सूखी चीज़ है, मगर वह एक स्पष्ट किताब (लौहे-महफ़ूज़) में लिखी हुई है।” [TMQ An’ām: 59]
“And with Him are the keys of the unseen, none knows them but He; and He knows whatsoever is in the earth and in the sea. Not a leaf falls, but He knows it. There is not a grain in the darkness of the earth, nor anything fresh or dry, but is written in a Clear Record” [TMQ An’ām: 59]
और (उसके) जीवन का वर्णन उसी प्रकार (लिया गया है) जैसे उसका यह कथन है,
And the (description of His) life is taken from the like of His saying,
अल्लाह! उसके सिवा कोई पूज्य नहीं, वह सदा जीवित रहने वाला है, जो सम्पूर्ण सृष्टि को थामे और सुरक्षित रखता है। [TMQ Baqarah: 255]
Allah! None has the right to be worshipped except He, the Ever living, the One Who sustains and protects all that exists” [TMQ Baqarah: 255]
वह सदैव जीवित है, उसके सिवा कोई पूज्य नहीं। [TMQ Fussilat: 65]
“He is the Ever Living, none has the right to be worshipped except He” [TMQ Fussilat: 65]
उसकी (वर्णन की गई) शक्ति/सामर्थ्य [क़ुदरह] उसके इस कथन जैसे से ली गई है,
The (description of His) power/ability [qudrah] is taken from the like of His saying,
कहो: "वही है जो तुम्हारे ऊपर से या तुम्हारे पैरों के नीचे से तुम पर अज़ाब भेजने की शक्ति रखता है, या तुम्हें फूट में उलझाकर हैरान कर दे।" [TMQ An’ām: 65]
“Say: ‘He has power to send torment on you from above or from under your feet, or to bewilder you with dissension’” [TMQ An’ām: 65]
क्या उन्होंने नहीं देखा कि जिस अल्लाह ने आकाशों और धरती को पैदा किया, वह इस पर सक्षम है कि उन्हीं जैसों को पैदा कर दे? [TMQ Isrā’: 99]
“See they not that Allah, Who created the heavens and the aerth, is able to create the like of them” [TMQ Isrā’: 99]
और (उसके) सुनने का वर्णन उसी प्रकार से लिया गया है जैसे उसका यह कथन है,
And the (description of His) hearing is taken from the like of His saying,
निश्चय ही अल्लाह सर्व-श्रोता, सर्व-ज्ञाता है। [TMQ Baqarah: 181]
“Lo! Allah is all-Hearing, All-Knowing” [TMQ Baqarah: 181]
और (उसके) देखने का वर्णन उसी प्रकार लिया गया है जैसे उसका यह कथन है,
And the (description of His) seeing is taken from the like of His saying,
और निःसंदेह, अल्लाह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ देखने वाला है। [TMQ Hajj: 61]
“And verily! Allah is all-Hearer, all-Seer” [TMQ Hajj: 61]
"वह सर्व-श्रोता है, सर्व-द्रष्टा है।" [TMQ Fussilat: 20]
“He is the all-Hearer, the all-Seer” [TMQ Fussilat: 20]
और (उसके) कलाम के वर्णन को उसी प्रकार लिया गया है जैसे उसका यह कथन है,
And the (description of His) speech is taken from the like of His saying,
और मूसा (अलैहिस्सलाम) से अल्लाह ने सीधे बात की। [TMQ Nisā’: 164]
“And to Musa Allah spoke directly” [TMQ Nisā’: 164]
“और जब मूसा हमारे नियत किए हुए समय और स्थान पर आए, तो उनके रब ने उनसे बात की” [TMQ Arāf: 143]
“And when Musa came at the time and place appointed by Us, his Lord spoke to Him” [TMQ Arāf: 143]
और (उसकी) इरादा (irādah) [इच्छा/संकल्प] का वर्णन उसी प्रकार के (कथन) से लिया गया है, जैसे उसका यह कथन है,
And the (description of His) Will [irādah] is taken from the like of His saying,
"वह जो चाहता है वही करता है" [TMQ Burūj: 16]
“He does what He Wills” [TMQ Burūj: 16]
निस्संदेह उसका आदेश यह है कि जब वह किसी चीज़ का इरादा करता है, तो उससे कहता है, "हो!" और वह हो जाती है। [TMQ Yā Sīn: 82]
“Verily, His Command, when He intends a thing, is only that He says to it,’Be!’ - and it is!” [TMQ Yā Sīn: 82]
लेकिन अल्लाह जो चाहता है वही करता है। [TMQ Baqarah: 253]
“But Allah does what He Wills” [TMQ Baqarah: 253]
और (उसकी) सृष्टि का वर्णन उसके इस कथन जैसे (कथनों) से लिया गया है,
And the (description of His) Creation is taken from the like of His saying,
"अल्लाह हर चीज़ का पैदा करने वाला है" [TMQ Zumar: 62]
“Allah is the Creator of all things” [TMQ Zumar: 62]
उसने हर चीज़ को पैदा किया, और उसके लिए एक अंदाज़ा (निर्धारित माप) ठहराया। [TMQ Furqān: 2]
“He has created everything, and ordained for it a measure” [TMQ Furqān: 2]
इन गुणों का उल्लेख पवित्र कुरआन में उसी तरह हुआ है जैसे तौहीद (एकेश्वरवाद) [wahdaniyya] और अज़ली अस्तित्व [qidam] जैसे गुणों का हुआ है। मुसलमानों के बीच इस बात में कोई मतभेद नहीं था कि अल्लाह एक है, अज़ली है, जीवित है, सामर्थ्यवान है, सुनता है, देखता है, बोलता है, जानने वाला है और अपनी इच्छा का प्रयोग करता है।
These attributes have been mentioned in the Noble Qur’ān just as other attributes like divine Unity [wahdaniyya] and Eternal Pre-existence [qidam] have been mentioned. There was no difference between the Muslims that Allah is One, Eternal, Living, Able and that He Hears, Sees, Speaks, Knowing and excersing Divine Will.
जब दार्शनिक आए और दर्शन के विचार मुसलमानों में घुस आए, तो मुतकल्लिमून (कलामशास्त्रियों) के बीच अल्लाह की सिफ़ात (गुणों) के बारे में मतभेद पैदा हो गए। मुअतज़िला ने कहा: अल्लाह की ज़ात (सत्ता) और उसकी सिफ़ात एक ही चीज़ है। इस प्रकार अल्लाह अपनी ज़ात में ही जीवित, ज्ञानवान और सामर्थ्यवान है। उसके पास अपनी ज़ात से बाहर कोई ज्ञान, कोई सामर्थ्य या कोई जीवन नहीं है। क्योंकि अगर अल्लाह अपनी ज़ात से बाहर किसी ज्ञान के कारण ज्ञानवान होता, और अपनी ज़ात से बाहर किसी जीवन के कारण जीवित होता, जैसा कि इंसानों के साथ होता है, तो इससे अनिवार्य रूप से यह सिद्ध होता कि वहाँ एक विशेषण (सिफ़ा) है और एक जिसका वर्णन किया जाता है (मौसूफ़), एक धारण करने वाला (हामिल) और एक धारण किया जाने वाला (महमूल)। और यह हालत शारीरिक वस्तुओं की होती है। जबकि अल्लाह हर ऐसे शारीरिक मानवीकरण (जिस्मिय्या) से पाक है। यदि हम कहें कि सिफ़त स्वयं अपने आप में मौजूद है, तो अज़ली (अनादि) और अज़ल से मौजूद सत्ता एक से अधिक हो जाएँगी, यानी एक से अधिक खुदा हो जाएँगे। अहले सुन्नत ने कहा: अल्लाह की कुछ अज़ली सिफ़ात हैं जो उसकी ज़ात में मौजूद हैं। वे (सिफ़ात) न तो वह (ज़ात) स्वयं हैं और न ही उससे अलग हैं (ला हुवा वला ग़ैरुहु)। रही बात अल्लाह के सिफ़ात रखने की, तो यह इस कारण है कि यह सिद्ध हो चुका है कि वह ज्ञानवान, जीवित, सामर्थ्यवान आदि है। यह जाना-माना है कि ज्ञान, जीवन और सामर्थ्य आदि अपने पूरे रूप में, वाजिब अल-वुजूद (अनिवार्य अस्तित्व) की अवधारणा से बाहर एक अर्थ की ओर संकेत करते हैं। सारे शब्द अर्थ में एक-दूसरे के समानार्थी नहीं होते। यह संभव नहीं जैसा कि मुअतज़िला कहते हैं कि वह बिना ज्ञान के ज्ञानवान है और बिना सामर्थ्य के क़ादिर (सामर्थ्यवान) है आदि। यह स्पष्ट रूप से असंभव है, और यह ऐसा है जैसे हम कहें कि कोई चीज़ बिना किसी कालेपन के काली है। नुसूस (धार्मिक ग्रंथों के पाठ) ने उसके ज्ञान, सामर्थ्य आदि के प्रमाण बताए हैं। सटीक और सुव्यवस्थित कार्यों का संपादन उसके ज्ञान और सामर्थ्य के अस्तित्व को दर्शाता है, न कि केवल ज्ञानवान और सामर्थ्यवान कहे जाने के मात्र नाम को। उसकी सिफ़त (गुण) का अज़ली होना इस कारण है कि उसकी ज़ात (सत्ता) में किसी नई चीज़ के होने का असंभव होना है। क्योंकि यह कल्पना से परे है कि पूर्व-विद्यमान और अज़ली सत्ता [al-Qadim al-Azali] में कोई नई चीज़ मौजूद हो। जहाँ तक सिफ़ात का उसकी ज़ात में मौजूद होने की बात है, तो वह इसलिए है कि यह अस्तित्व के लिए आवश्यक चीज़ों में से है। क्योंकि किसी चीज़ की सिफ़त बयान करने का कोई अर्थ नहीं, सिवाय इसके कि वह सिफ़त उस चीज़ में मौजूद हो। जहाँ तक सिफ़ात के "न वह, न उसके सिवा" होने की बात है: अल्लाह की सिफ़ात स्वयं उसकी ज़ात नहीं हैं। क्योंकि बुद्धि यह तय करती है कि वर्णन (सिफ़त) उस चीज़ से अलग है जिसका वर्णन किया जा रहा है। वह ज़ात से बाहर का एक अर्थ है। क्योंकि वह अल्लाह की सिफ़त है, न कि अल्लाह के सिवा कोई और चीज़। वह कोई वस्तु, सत्ता या तत्व नहीं, बल्कि केवल ज़ात का वर्णन है। यद्यपि वह अल्लाह की ज़ात नहीं है, फिर भी वह अल्लाह से अलग नहीं है। बल्कि वह अल्लाह की एक सिफ़त है। जहाँ तक मुतज़िला के मत की बात है: यदि हर सिफ़त को अपने आप में स्वतंत्र रूप से अस्तित्व दिया जाता, तो पूर्व-विद्यमान सत्ताएँ एक से अधिक हो जातीं। ऐसा तब होता जब सिफ़त स्वयं एक ज़ात होती। जहाँ वह ज़ात का वर्णन मात्र है, वहाँ ऐसी सिफ़त द्वारा ज़ात के वर्णन से ज़ातों की बहुलता अनिवार्य नहीं होती। बल्कि उससे केवल एक ही ज़ात के एक से अधिक वर्णन सिद्ध होते हैं। इससे अल्लाह की एकता [wahdaniyyah] का खंडन नहीं होता, न ही इससे अनेक ईश्वरों का होना सिद्ध होता है। इस प्रकार अह्लुस-सुन्नह ने बुद्धि के आधार पर सिद्ध किया कि अल्लाह की ऐसी सिफ़ात हैं जो उसकी ज़ात से भिन्न हैं, पर उससे अलग नहीं हैं, क्योंकि वर्णन उस चीज़ से भिन्न है जिसका वर्णन किया जाता है, पर उससे कटा हुआ नहीं है। फिर उन्होंने इन अज़ली सिफ़ात में से प्रत्येक का अर्थ स्पष्ट किया। अतः उन्होंने कहा कि इल्म (ज्ञान) वह अज़ली सिफ़त है जो उससे संबंधित ज्ञात चीज़ों को प्रकट करती है, और क़ुदरत (सामर्थ्य) वह अज़ली सिफ़त है जो तक़दीर में निश्चित की गई चीज़ों पर प्रभाव डालती है। और जीवन (हयात) एक अनादि सिफ़त है जो जीवित प्राणियों की सेहत (सिहहत) को अनिवार्य करती है। और क़ुदरत (सामर्थ्य) शक्ति है। और सम्अ (सुनना) एक अनादि सिफ़त है जो सुनी जाने वाली चीज़ों से संबंधित है। और बसर (देखना) एक अनादि सिफ़त है जो देखी जाने वाली चीज़ों से संबंधित है। इन्हीं के ज़रिये उसे पूरी समझ प्राप्त है, ऐसी नहीं जो कल्पना या भ्रम के रास्ते से हो, न ही ऐसी जो इंद्रियों के प्रभाव से या मन की इच्छा से आए। इरादा (इरादah) और मशीयत (चाह) दोनों जीवन की सिफ़त की अभिव्यक्तियाँ हैं, जो तक़दीर में लिखी गई चीज़ों में से किसी एक का एक विशेष क्षण में होना अनिवार्य करती हैं, यद्यपि उन सभी (तक़दीर की चीज़ों) पर क़ुदरत एक समान है। कलाम (वाणी) की सिफ़त एक अनादि सिफ़त है जो उस रचना के द्वारा व्यक्त होती है जिसे क़ुरआन कहा जाता है। अल्लाह शब्दों के साथ बोलता है; यह उसकी अनादि सिफ़तों में से एक है और अक्षरों और ध्वनियों की श्रेणी में से नहीं है। यह ऐसी सिफ़त है जो मौन और कमी (आफ़ह) के विपरीत है। अल्लाह इसी सिफ़त से बोलता है। इसी सिफ़त से वह आदेश देता है, मना करता है, सूचना देता है; और जो भी आदेश देता है, मना करता है और सूचना देता है, वह अपने भीतर एक अर्थ व्यक्त करता है।
"तर्क आत्मा की शक्ति और समझ है"
'Ration is power for the soul and comprehension',
जिसका उनके अनुसार अर्थ है
Which according to them means
स्वाभाविक प्रवृत्ति, जिसके साथ इंद्रियाँ सही हों, तो ज़रूरियात (वे बातें जो अनिवार्य रूप से ज्ञात होती हैं) का ज्ञान उसका अनुसरण करता है।
'An instinct which is followed by knowledge of daruriyyat (things known by necessity) when the senses are sound.'
कुछ लोग कहते हैं:
Some of them say:
मन वह सार है जिसके द्वारा माध्यमों [वसाइत] के सहारे अदृश्य चीज़ों को समझा जाता है, और दिखाई देने वाली चीज़ों को देखकर।
The mind is the essence with which the unseen things are comprehended using intermediaries [wasait] and perceptible things by seeing'
वे यह भी कहते हैं:
They also say:
"मन ही स्वयं आत्मा है।"
'The mind is the soul itself.'
जो व्यक्ति बुद्धि के बारे में ऐसी समझ रखता हो, उसके लिए इन मामलों में खुली छूट ले लेना कोई आश्चर्य की बात नहीं। अतः उन्होंने सैद्धांतिक रूप से विभिन्न मुद्दों को व्यवस्थित किया और ऐसे परिणाम निकाले जिनका कोई वास्तविक आधार नहीं था। और उन्होंने अपने बारे में कहा कि वे इस परिणाम को अपनी बुद्धि से समझ पाए हैं। परिणामस्वरूप, उनके लिए तर्कसंगत अध्ययन की कोई ऐसी सीमा नहीं रही जहाँ वह रुकता। वे किसी भी अध्ययन में गहराई से उतर सकते थे और ऐसे परिणामों तक पहुँच जाते थे जिन्हें वे तर्कसंगत अध्ययन और तर्कसंगत परिणाम कहते थे। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि मुअतज़िला कहते:
The one who carries such an understanding regarding the mind, it would not be strange for him to give himself a free reign in these matters. So they arranged, theoretically, various issues and came out with a result that did not exist. And they said regarding themselves that they came to comprehend this result with their mind. Consequently, the rational study for them did not have a limit at which it stopped. They could dive into any study and arrive at results which they called a rational study and rational results. Therefore, it is not strange that the Mu'tazila would say:
“अल्लाह की अनादि क़ुदरत (सामर्थ्य) को किसी निर्धारित और सृजित घटना से जोड़ना, ही क़ुदरत की सिफ़त को हादिस (सृजित) बना देता है।”
“That connecting the eternal ability of Allah with the decreed and a created incident makes the attribute of qudra (ability) created [haaditha].”
उन्होंने इसे एक तर्कसंगत जाँच और एक तर्कसंगत परिणाम माना....
They considered that to be a rational investigation and a rational result....
अहल अस-सुन्नह एक साथ यह भी कहते हैं कि अल्लाह की क़ुदरत (सामर्थ्य) को किसी निर्धारित (मुक़द्दर) चीज़ से जोड़ने से क़ुदरत न तो बदलती है और न ही वह कोई रचित (मख़्लूक़) चीज़ बन जाती है। इसका कारण यह है कि क़ुदरत को रचित बनाने वाली चीज़ क़ुदरत में बदलाव है, न कि निर्धारित चीज़ में बदलाव। और उन्होंने इसे एक तर्कसंगत जाँच और तर्कसंगत परिणाम माना।.....क्योंकि उनके अनुसार बुद्धि आत्मा या एक स्वभाव थी, जिसके साथ वे चीज़ें जानी जाती हैं जो अनिवार्य रूप से ज्ञात होती हैं। इसलिए उन्होंने बुद्धि को हर चीज़ की जाँच करने की अनुमति दी। यदि वे बुद्धि के अर्थ को सचमुच समझते, तो वे इन अनुमानित जाँचों और परिणामों में न उलझते, जिनके अस्तित्व का कोई ज्ञान नहीं है। ये केवल दूसरी बातों से निकली हुई चीज़ें थीं, जिन्हें उन्होंने तार्किक सत्य कहा।
And the Ahl as-Sunnah say at the same time that connecting the ability of Allah with the decreed matter does not make the qudra (ability) change and nor does it make it a created thing. This is because what makes the qudra created is change in the qudra and not the change in the decreed matter. And they considered that to be a rational investigation and a rational result.....this is because the mind according to them, was the soul or an instinct followed by knowledge of things known by necessity. Therefore they allowed the mind to investigate everything. Had they truly understood the meaning of the mind they would not have involved in these suppositional investigations and results which are not known to exist. These were just things from other matters which followed and they called these rational truths.
इस युग में हमारे लिए बुद्धि (अक़्ल) का अर्थ स्पष्ट है। हम समझते हैं कि जब तक वे चीज़ें उपलब्ध न हों जो बुद्धि के किसी अध्ययन को चलाने के लिए आवश्यक हैं, तब तक उसे तर्कसंगत चर्चा नहीं कहा जा सकता। और ऐसी स्थिति में स्वयं को अध्ययन की अनुमति देना उचित नहीं है। हम जानते हैं कि बुद्धि
The meaning of the mind is clear to us in this age. We realise that as long as the things which are necessary for the mind to conduct a study are not available then we cannot call it a rational discussion. And in such a case, it is not allowed to permit ourselves to study. We know that the mind is
वास्तविकता का इंद्रियों के माध्यम से मस्तिष्क तक संचरण, उस पूर्व जानकारी के साथ जो इस वास्तविकता की व्याख्या करती है।
'The transmission of the reality via the senses to the brain with previous information which explains this reality.'
हर तार्किक चर्चा के लिए सबसे पहले चार चीज़ें होनी चाहिए: पहली, बुद्धि (दिमाग़); दूसरी, इंद्रियाँ; तीसरी, वास्तविकता; और चौथी, इस वास्तविकता से संबंधित पूर्व जानकारी। इन चारों में से यदि एक भी चीज़ न हो, तो कोई भी तार्किक चर्चा बिल्कुल नहीं हो सकती। यद्यपि तर्क पर आधारित चर्चा संभव है, और कल्पना तथा अनुमान भी हो सकते हैं। लेकिन इनमें से किसी का भी कोई मूल्य नहीं है, क्योंकि ये न तो मन की समझ के दायरे में आते हैं, न ही मन की अपने स्रोत तक पहुँच के दायरे में। इसलिए मुतकल्लिमून (इल्मे कलाम के विद्वान) ने मन के अर्थ को न समझ पाने के कारण बहुत-सी ऐसी चर्चाओं में स्वयं को खुली छूट दे दी, जिन्हें इंद्रियों से जाना नहीं जा सकता, और इसके अलावा उनके पास उनके बारे में कोई पूर्व जानकारी भी नहीं थी।
Every rational discussion must have four things first, a brain, second, the senses, third, the reality and fourth, the previous information relating to this reality. If one of these four things is missing, there can be no rational discussion at all. Even though it is possible to have a discussion based on logic and it is possible for there to be imagination and supposition. None of this has any value, because it does not come under the comprehension of the mind or the mind's comprehension of its source. So the scholastics [Mutakallimūn's] lack of understanding of the meaning of the mind made them give themselves a free reign in many discussions which cannot be sensed, further they did not have any previous information reagarding them.
जहाँ तक मुतकल्लिमून (इल्मे कलाम के विद्वानों) का कुरआन की पद्धति और दार्शनिकों की पद्धति के बीच, तार्किक चर्चा में, भेद न करने का प्रश्न है, तो इसका कारण यह है कि कुरआन ने धर्मशास्त्र (इलाहियात) की चर्चा की, और दार्शनिकों ने भी धर्मशास्त्र की चर्चा की। जहाँ तक दार्शनिकों की धर्मशास्त्रीय चर्चा का संबंध है, तो वे परम सत्ता (अल-वुजूद अल-मुतलक) पर विचार करते थे और उन बातों पर, जो उसकी सत्ता के लिए आवश्यक थीं। वे ब्रह्मांड का अध्ययन नहीं करते थे, बल्कि उस चीज़ का अध्ययन करते थे जो ब्रह्मांड से परे है। वे अपने तार्किक आधार-वाक्यों से प्रमाण गढ़ने लगते थे, और इन प्रमाणों से परिणाम निकालते थे। फिर इन परिणामों से अन्य परिणाम निकालते थे। वे इसी क्रम में चलते रहते थे, यहाँ तक कि उस सत्ता के सत्य और उस सत्ता के अपेक्षित तत्वों तक पहुँच जाते जिन्हें वे सत्य मानते थे। उन सबने अपने अध्ययन में भिन्न-भिन्न परिणाम पाए, फिर भी वे एक ही पद्धति का अनुसरण करते थे, और वह है परा-प्राकृतिक (अलौकिक) विषयों की चर्चा, ऐसे प्रमाण स्थापित करना जिनसे अटकल-आधारित मान्यताएँ या अन्य प्रमाण निकलें, और ऐसे परिणामों तक पहुँचना जिन्हें वे निश्चित मानते थे और जिनमें वे विश्वास रखते थे।
As for the scholastics [Mutakallimūn] not distuinguishing between the method of the Qur’ān from the method of the philosophers in the rational discussion, this is because the Qur’ān discussed theology and the philosophers discussed theology. As for the theological discussion of the philoshopers, it is that the philosphers looked into the Absolute Being and whatever was necessary for its Essence. They did not study the universe but what was beyond the universe. They began to arrange proofs with their logical premises and from these proofs they arrived at results. Then they derived other results from these results. They proceeded in this manner until they arrived at what they considered to be the truth of this Essence and the requirement of this Essence. All of them despite arriving at different results in their study, they followed one method which is the discussion of the supernatural, establishing proofs resulting in speculative assumptions or other proofs and arriving at results they considered definite and believed in.