62. पैगंबर के कथनों के बीच प्रतीत होने वाला विरोधाभास (ﷺ)
62. The Conflict Between The Sayings Of The Messenger (saw)
पैगंबर ﷺ के दो कथनों के बीच टकराव केवल एक ही स्थिति में होता है, और वह है नस्ख़ (निरसन / रद्द होना)। इसके अलावा या तो वह दोनों के समान होने और एक के दूसरे पर प्राथमिकता पाने का मामला होगा, या फिर दोनों के बीच सामंजस्य बिठाना संभव होगा। जहाँ तक नस्ख़ की बात है, उसकी चर्चा उसी के विषय में आएगी, और समानता तथा प्राथमिकता की चर्चा प्रमाणों की समानता और प्राथमिकता के विषय में होगी। जहाँ तक दो टकराने वाले कथनों के बीच सामंजस्य की बात है, वह इस तरह होता है कि उनमें से हर एक को परखा जाए ताकि उसकी परिस्थितियाँ और हालात स्पष्ट हो जाएँ, फिर यह स्पष्ट हो जाता है कि उनमें कोई टकराव नहीं है। ऐसा इसलिए है कि जीवन की परिस्थितियाँ एक-दूसरे से भिन्न होती हैं, इसलिए उनकी किसी एक स्थिति को दूसरी से केवल समानता के आधार पर नहीं तौलना चाहिए, क्योंकि एक बात में समानता हो सकती है जबकि कई दूसरी बातों में अंतर होता है। अतः विधान और राजनीति में सामान्यीकरण और अमूर्तीकरण से बचना चाहिए, क्योंकि विधान बंदों के कर्मों का उनके आदेशों को स्पष्ट करके उपचार करता है, और राजनीति लोगों के मामलों की उन हितों के अनुसार देखभाल करती है जिन पर उनके कर्म आधारित हैं। इनमें से हर एक जीवन और उसकी परिस्थितियों व हालात से जुड़ा है, और ये विविध, भिन्न और अलग-अलग होती हैं, फिर भी अक्सर एक-दूसरे के समान प्रतीत होती हैं। इसलिए डर यह है कि इस भिन्नता, अंतर और विविधता पर ध्यान न दिया जाए, जिससे आदेश का सामान्यीकरण हो जाए, यानी एक ही प्रकार की सभी चीज़ों पर एक ही आदेश लगा दिया जाए, और यह अमूर्तीकरण की ओर भी ले जा सकता है, यानी किसी कर्म या मामले को उससे जुड़ी परिस्थितियों और हालात से अलग करके देखना। और यहीं भूल होती है, और इसी कारण एक ही कर्म या मामले के दो उपचारों के बीच टकराव प्रतीत होने लगता है, यानी ऐसा लगता है कि दोनों कथनों में विरोध है, और यहीं से रसूल ﷺ के कुछ कथनों के बीच कथित विरोध पैदा हुआ। लेकिन सामान्यीकरण से बचकर, और हर विवेचना को उस घटना तक सीमित रखकर जिसके लिए वह आई, और अमूर्तता से बचकर, यानी घटना को उसकी परिस्थितियों से अलग न करके, अर्थात विवेचना को उसकी घटना से और घटना को उसकी परिस्थितियों से जोड़कर देखा जाए, तो यह स्पष्ट होगा कि दोनों घटनाओं में अंतर है, और यह भी साफ़ हो जाएगा कि दोनों हदीसों के बीच कोई विरोध नहीं है, क्योंकि हर एक की परिस्थिति और स्थिति में अंतर है, या एक का दूसरे से संबंध ऐसा है कि उन्हें एक साथ रखकर ही विवेचना का आधार बनाया जाना चाहिए, चाहे वह दृष्टिकोण कथन का हो या घटना का, और उनमें से कोई भी दूसरे से अलग करके नहीं देखी जानी चाहिए। विद्वान या राजनीतिज्ञ को हर घटना को दूसरी से अलग करके देखना होगा, ताकि वह उनके बीच का अंतर सटीक रूप से समझ सके और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि उनके उपचार अलग-अलग हैं। तभी वह घटनाओं के उपचार में और विधान या राजनीति को समझने में सत्य के सबसे निकट और सही तक पहुँच सकता है। जहाँ तक विधान की बात है, विधायी पाठ घटनाओं और परिस्थितियों के लिए निर्णय होते हैं, इसलिए वे अपनी प्रकृति से ही एक-दूसरे से भिन्न होते हैं, और उनके बीच थोड़े अंतर तथा इस अंतर के साथ मौजूद स्पष्ट समानता के कारण स्वाभाविक रूप से वे विरोधी प्रतीत होते हैं। इसलिए विद्वान को विधायी ग्रंथों की जाँच-पड़ताल करनी चाहिए इससे पहले कि वह उनके बारे में अपना निर्णय दे, क्योंकि ये केवल अर्थ बताने वाली साहित्यिक अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं, बल्कि घटनाओं के लिए उपचार हैं। अतः यह अनिवार्य है कि वह उनके अर्थों को, जो उसके मन में हैं, उन घटनाओं के साथ जोड़े जिन्हें वह अनुभव करता है, ताकि वास्तविकता को ठीक से पहचान सके। इस प्रकार वह विधान को समझ सके और उस वास्तविकता को भाँप सके जिसका वह उपचार करना चाहता है। फिर वह ग्रंथों के अभिप्रायों के बीच के सूक्ष्म अंतर को और सामान्यीकरण तथा अमूर्तीकरण के खतरे को पहचान लेता है। नबी ﷺ की हदीसों को इसी आधार पर देखा जाना चाहिए, और तब उनके बीच का विरोधाभास-रहित होना स्पष्ट हो जाएगा।
The conflict between two of the Messenger's sayings does not occur except in one situation, that is the abrogation (al-naskh), and other than this it would be either a kind of equality and outweighing, or it is possible to conciliate between them. As for the naskh; the talk about it will come in the discussion of it, and the talk about the equality and the outweighing will be in the topic of the equality and the outweighing of the evidences. As for the reconciliation between the two conflicted sayings; it is by scrutinizing each one of them to clarify its circumstances and situations, then the non confliction becomes apparent, that is because the situations in the life differ from each other, so none of its situations should be measured to one another just for the likeness between them, because the likeness may exist in a matter while the difference exist in various matters, therefore the generalization and the abstraction must be avoided in the legislation and the politics, because the legislation is the treatment of the servants actions by clarifying their verdicts, and the politics is taking care of the peoples affairs in their benefits on which their actions are based. And every one of them is related to the life and its circumstances and situations, and they are various, different and disparate, but they often seem to be similar to each other. So there is fear that the disparity, the difference and the variety are not noticed, which leads to generalize the verdict, i.e. issuing one verdict for all those which are of its kind, and may also lead to the abstraction, i.e. by freeing every action or matter from the circumstances and situations related to it, and this is where the mistake happens, and because of that a conflict would be supposed between two treatments of one action or matter, i.e. it seems that the two sayings are in conflict, and from here the supposed conflict between some of the sayings of the Messenger came, but by avoiding the generalization, and by limiting every treatment to the incident that it came for it, and by avoiding the abstraction, i.e. freeing the incident from its circumstances, i.e. by relating the treatment to its incident and relating the incident to its circumstances; it will be noticed that there is a difference between the two incidents, and it will be cleared out that there is no conflict between the two ahaadeeth for the differences in the circumstance and the situation of each one of them, or for the relation of one of them to the other so they are made together as a basis for the treatment viewpoint, or a basis for the incident viewpoint, and none of them is isolated from the other. The scholar or the politician must isolate every incident from the other, so that he can accurately see the difference between them, and he comes to the conclusion that their treatments are different, so he can approach the nearest to the truth and the correct in treating the incidents, and in understanding the legislation or the politics. As for the legislation, the legislative texts are verdicts for the events and the incidents, so they are different from each other by their nature, and they naturally seem to be in conflict, for the little difference between them, and for the definite similarity along with this difference. So the scholar must scrutinize the legislative texts before he issues his decision about them, because they are not literary expressions which denote meanings only, but they are treatments for events, so it is inevitable that he joins their meanings that are in his mind with the events that he senses, so that he pinpoints the reality, in order that he can understand the legislation and perceive the reality he wants to treat, then he perceives the fine differences between the denotations of the texts and the danger of the generalization and the abstraction. The ahaadeeth of the Prophet should be looked at on this basis, and then the non confliction will be perceived.
जो व्यक्ति पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की उन हदीसों की जाँच करता है जो आपस में विरोधी प्रतीत होती हैं, वह उन्हें गहन परीक्षण के बाद सब में समन्वय योग्य पाता है। इसके बहुत से उदाहरण हैं। उदाहरण के लिए, वे हदीसें जिनमें रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) किसी चीज़ का आदेश देते हैं, और दूसरी हदीसें जिनमें रसूल उन चीज़ों को स्वीकार करने से इनकार करते हैं जिनका उन्होंने आदेश दिया था, उनके बीच विरोध प्रतीत होता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि कोई विरोध नहीं है, क्योंकि रसूल का आदेश कार्य करने की माँग है, जो बिना किसी संकेत के न वुजूब (अनिवार्यता), न नदब (पसंदीदा होना) और न इबाहा (अनुमति) को दर्शाता है। अतः चूँकि उन्होंने (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ऐसा कार्य किया जो यह दर्शाता है कि वे उस चीज़ को माँग के बाद नहीं करते, तो यह इस बात का संकेत है कि वह माँग इबाहा के लिए थी, न कि वुजूब या नदब के लिए। इसलिए उनका किसी आदेशित चीज़ को स्वीकार करने से इनकार करना उनके उस आदेश के विरोध में नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि उनका आदेश इबाहा के लिए था, न कि वुजूब या नदब के लिए।
The observer into the ahaadeeth of the Prophet (SAW) which seem to be in conflict with each other finds that they are all reconcilable after scrutinizing. And there are many examples on this, For example the ahaadeeth in which the Messenger (SAW) commands something, and get conflicted by other ahaadeeth in which the Messenger refuses to accept things he had commanded, which seems to be conflict between them, but the reality is that there is no conflict, because the command of the Messenger is a request to act which does not denote the wujoob, the nadb or the ibaahah without an indication, so being that he (SAW) did something which denotes that he does not do it after the request to do it, that is an indication that the request is for the ibaahah, so his refusal to accept things that he commanded would not be in conflict with his command about it, but it is an indication that his command is for the ibaahah, not for the wujoob nor for the nadb.
उसी में से है जो क़ैस इब्न सा'द से वर्णित है कि उन्होंने कहा: रसूलुल्लाह ﷺ हमारे घर में आए... फिर सा'द ने उनके लिए वुज़ू का पानी रखवाया, तो उन्होंने वुज़ू किया, फिर उन्हें केसर और वरस (लाल रंग देने वाला एक पौधा) से रंगी हुई एक चादर दी गई, तो उन्होंने उसे अपने ऊपर लपेट लिया। इसे अहमद ने संकलित किया है। यह हदीस वुज़ू के बाद शरीर सुखाने की अनुमति को दर्शाती है, और वुज़ू का जल भी इसी के समान है। परंतु यह हदीस मैमूना से वर्णित उस हदीस से टकराती है, जिसमें उन्होंने कहा: "फिर उन्हें एक अँगोछा दिया गया, किंतु उन्होंने उससे शरीर नहीं पोंछा" इसे अल-बुख़ारी ने संकलित किया है, क्योंकि यह दर्शाती है कि रसूल ﷺ ने शरीर नहीं पोंछा। कुछ लोगों ने दोनों हदीसों के बीच मेल बिठाने का प्रयास किया और रसूल ﷺ के शरीर न पोंछने को इस तरह लिया मानो यह मकरूह (अप्रिय) हो। परंतु यदि रसूल ﷺ किसी चीज़ से मना करते और किसी चीज़ का आदेश देते, तब उनकी मनाही को मकरूह माना जाता; यहाँ तो उन्होंने एक बार कोई काम किया और दूसरी बार नहीं किया, इसलिए दोनों कार्यों में कोई टकराव नहीं है। और यदि मान भी लिया जाए कि टकराव है, तो इसे इबाहा (अनुमति) पर रखा जाना चाहिए, क्योंकि रसूल ﷺ द्वारा किसी काम का न करना निषेध को नहीं दर्शाता, क्योंकि वे अक्सर मुबाह (जायज़) कामों में से कुछ को नहीं किया करते थे।
From that is what was narrated from Qays Ibn Sa'd that he said: visited) SAW (Allah of Messenger The us in our house …, then Sa'd ordered a ritual wash for him so he washed, then he handed him … a sheet dyed by saffron and wars (a reddish colour dye plant), so he wrapped himself with it" compiled by Ahmad. This hadeeth denotes the permissibility of drying from the ritual wash, and the wadhu' is similar to it, and this hadeeth conflicts what is narrated from Maimunah -that said she then He was given a handkerchief but he did not dry with it" compiled by Al-Bukhari- because it denotes that the Messenger did not dry. Some people attempted to reconcile between the two ahaadeeth by (carrying it on the karaahah) regarding his nondrying as if it is makrooh. If the Messenger (SAW) forbade something and he commanded it; then his forbiddance will be regarded as makrooh, but here did something once and he did not do it the other time, so there is no conflict between the two actions, and supposing that there is a conflict; it should be carried on the ibaahah, because if something nonbeing acted by the Messenger; it does not denote the prohibition, because he frequently used not to do some of the permissible.
उसी से वह भी है जो अब्दुर-रहमान इब्न काब इब्न मालिक से वर्णित है कि आमिर इब्न मालिक, जो तीरों के फल (अर्रोह) से खेलने वाला था, मुशरिक (बहुदेववादी) होते हुए अल्लाह के रसूल ﷺ के पास आया और उन्हें एक उपहार पेश किया, तो रसूल ﷺ ने फ़रमाया: "मैं किसी मुशरिक का उपहार स्वीकार नहीं करता।" इसे अत-तबरानी ने संकलित किया है। यह हदीस उस बात के विरुद्ध है जो नबी ﷺ के बारे में प्रमाणित है कि उन्होंने मुशरिकों का उपहार स्वीकार किया और उसे स्वीकार करने का आदेश दिया। अली (रज़ि.) से वर्णित है कि उन्होंने कहा: "किसरा (फ़ारस के शासक) ने अल्लाह के रसूल ﷺ को एक उपहार भेजा और उन्होंने उससे उसे स्वीकार किया, और क़ैसर (रोम के शासक) ने उन्हें उपहार भेजा और उन्होंने उससे उसे स्वीकार किया, और राजाओं ने उन्हें उपहार भेजे और उन्होंने उनसे स्वीकार किए।" इसे अहमद ने संकलित किया है। और आमिर बिन अब्दुल्लाह बिन अज़-ज़ुबैर से, उनके पिता से वर्णित है कि उन्होंने कहा: क़ुतैला बिन्त अब्दुल-उज़्ज़ा बिन अब्द असद, जो बनी मालिक बिन हसल (के कबीले) से थी, उपहार लेकर अपनी बेटी अस्मा बिन्त अबी बक्र के पास आई: छिपकलियाँ, पनीर और घी। वह मुशरिका थी, इसलिए अस्मा ने उसका उपहार लेने से और उसे अपने घर में प्रवेश देने से इनकार कर दिया। फिर आइशा ने नबी ﷺ से पूछा, तब अल्लाह, महान और सर्वशक्तिमान ने यह आयत उतारी: {अल्लाह तुम्हें उन लोगों के साथ, जो धर्म के कारण तुमसे नहीं लड़े और न तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाला, भलाई और इंसाफ़ का व्यवहार करने से नहीं रोकता; निस्संदेह अल्लाह इंसाफ़ करने वालों से प्रेम करता है।} तो उन्होंने (नबी ﷺ ने) उसे अपना उपहार स्वीकार करने और उसे अपने घर में प्रवेश देने का आदेश दिया। इसे अहमद ने संकलित किया है। अतः रसूल ﷺ का मुशरिक से उपहार स्वीकार करना और उसका उपहार अस्वीकार करना, इन दोनों के बीच विरोधाभास प्रतीत होता है। इनमें सामंजस्य यह है कि मुशरिक के उपहार को अस्वीकार करना इस बात का संकेत है कि उपहार स्वीकार करना जायज़ (मुबाह) है, न कि वाजिब और न मंदूब, क्योंकि रसूल ﷺ जायज़ चीज़ों में से भी बहुत-सी चीज़ें छोड़ दिया करते थे। उन्होंने गोह (दब) का मांस खाने से इनकार किया और ऐसी बात कही जो उसके प्रति उनकी नापसंदगी को दर्शाती है, और उन्होंने खरगोश का मांस खाने से भी इनकार किया। उस संदर्भ में यह भी है जो बुख़ारी ने उन मुहाजिर (प्रवासी) महिलाओं के बारे में वर्णित किया है जब अल्लाह ने उनके बारे में यह आयत उतारी: {ऐ ईमान वालो, जब ईमान वाली महिलाएँ हिजरत करके तुम्हारे पास आएँ, तो उनकी जाँच कर लिया करो; अल्लाह उनके ईमान को सबसे अच्छी तरह जानता है, फिर अगर तुम्हें उनके सच्चे मोमिन होने का पता चल जाए, तो उन्हें काफ़िरों की ओर वापस न लौटाओ, न वे उनके लिए हलाल हैं और न वे (काफ़िर) उनके लिए हलाल हैं…}। उर्वा ने कहा: आइशा ने मुझसे कहा कि रसूलुल्लाह ﷺ इसी आयत {ऐ ईमान वालो, जब ईमान वाली महिलाएँ हिजरत करके तुम्हारे पास आएँ, तो जाँच कर लिया करो …} से (उनकी) जाँच करते थे, यहाँ तक कि {अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यंत दयावान है} तक। उर्वा ने कहा: आइशा ने कहा: जब उनमें से कोई महिला इस शर्त को स्वीकार कर लेती, तो रसूलुल्लाह ﷺ उससे कहते: मैंने तेरी बैअत (निष्ठा की शपथ) ले ली है, यह वे बात के द्वारा ही उससे कहते थे; अल्लाह की कसम, बैअत लेते समय रसूलुल्लाह ﷺ का हाथ किसी महिला के हाथ से नहीं छुआ, वे केवल अपनी बात से ही बैअत लेते थे। इसे अल-बुख़ारी ने संकलित किया है। और उमैमा बिन्त रुक़ैक़ा से वर्णित है कि उन्होंने कहा: मैं कुछ महिलाओं के साथ रसूलुल्लाह ﷺ के पास आई, जिन्होंने इस्लाम पर उनकी बैअत की, उन्होंने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल, हम आपसे बैअत करते हैं कि हम अल्लाह के साथ किसी को भी इबादत में शरीक नहीं करेंगी, चोरी नहीं करेंगी, व्यभिचार नहीं करेंगी, अपनी संतान को क़त्ल नहीं करेंगी, और न ही हाथों और पैरों के बीच कोई झूठा आरोप गढ़ेंगी (यानी नाजायज़ संतान को पति की बताकर), और मा'रूफ़ (जिसका इस्लाम आदेश देता है) में आपकी अवज्ञा नहीं करेंगी। तब रसूलुल्लाह ﷺ ने कहा: जितना तुम्हारे लिए संभव और सहनीय हो। उसने कहा: उन्होंने कहा: अल्लाह और उसका रसूल हम पर स्वयं हमसे भी अधिक दयालु हैं, तो ऐ रसूलुल्लाह, हमसे बैअत लीजिए। तब रसूलुल्लाह ﷺ ने कहा: मैं महिलाओं से हाथ नहीं मिलाता, सौ महिलाओं से मेरी बात वैसी ही है जैसी एक महिला से मेरी बात। इसे मालिक ने संकलित किया है। अल-बुख़ारी ने 'उरवा से, उन्होंने 'आइशा (RA) से रिवायत किया, उन्होंने कहा: और अल्लाह के रसूल (SAW) का हाथ किसी औरत के हाथ को नहीं छूता था, सिवाय उस औरत के जिसका वे मालिक होते थे। इसलिए ये हदीसें उस चीज़ से टकराती हैं जो अल-बुख़ारी ने उम्म 'अतिय्या से रिवायत की, जिन्होंने कहा: हमने नबी ﷺ से बैअत की, तो उन्होंने हमें यह आयत पढ़कर सुनाई: (… कि वे अल्लाह के साथ किसी चीज़ को शरीक नहीं ठहराएँगी…) और उन्होंने हमें ज़ोर-ज़ोर से रोने से मना किया। तब हम में से एक औरत ने अपना हाथ खींच लिया और कहा: फ़ुलाँ औरत ने मुझे ख़ुश किया था, और मैं उसका बदला चुकाना चाहती हूँ, तो उन्होंने कुछ नहीं कहा। यह हदीस दर्शाती है कि रसूल ﷺ ने औरतों की बैअत हाथ मिलाकर स्वीकार की, क्योंकि उसमें कहा गया है: "तब हम में से एक औरत ने अपना हाथ खींच लिया …", जिसका अर्थ है कि उसके साथ की औरतों ने अपने हाथ नहीं खींचे, यानी उन्होंने हाथों से, अर्थात हाथ मिलाकर बैअत की। और उमैमा की हदीस कहती है: "मैं औरतों से हाथ नहीं मिलाता …" और कहती है: "उनका हाथ किसी औरत के हाथ को नहीं छूता था …", तो इसमें विरोधाभास है, क्योंकि हाथ मिलाकर बैअत वाली हदीस उस हदीस से टकराती है जिसमें आया है कि वे औरतों से हाथ नहीं मिलाते थे। इस हदीस और अन्य अहादीस के बीच सामंजस्य यह है कि रसूल ﷺ का किसी काम को न करना निषेध नहीं है, इसलिए यह हाथ मिलाने की मनाही को नहीं दर्शाता, बल्कि यह उनके मुबाह (जायज़) कामों में से एक से परहेज़ को दर्शाता है। यह इस बात का संकेत है कि स्त्रियों से बैअत (निष्ठा की शपथ) हाथ मिलाकर लेना न वाजिब है, न मंदूब, बल्कि मुबाह है, क्योंकि रसूल ﷺ का यह कहना कि उन्होंने हाथ नहीं मिलाया, इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने हाथ मिलाने से मना किया था। अतः यह निश्चित रूप से निषेध नहीं है, बल्कि संभवतः उन्होंने इससे परहेज़ किया, जैसे वे बहुत से मुबाह कामों से परहेज़ करते थे। जैसे उन्होंने अपने घर में एक दिरहम या एक दीनार रात भर रखने से परहेज़ किया, और जैसे उन्होंने चरवाहे की बांसुरी सुनने से परहेज़ किया, जो इब्ن उमर से नाफ़ेअ की रिवायत में है। उन्होंने न चरवाहे को मना किया, न रोका, जो उसकी स्वीकृति को दर्शाता है, लेकिन उन्होंने उसे सुनने से परहेज़ किया। इसी तरह उन्होंने गोह और खरगोश आदि खाने से परहेज़ किया। अतः उमैमा की हदीस और उससे पहले की हदीस के बीच कोई विरोध नहीं है। उमैमा की हदीस में इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उसमें विरोध का संदेह केवल उम्म अतिय्या की हदीस के कारण होता है, जो हाथ मिलाकर बैअत के बारे में है, क्योंकि वह बैअत के लिए विशिष्ट है, और ये अहादीस भी बैअत के लिए विशिष्ट हैं, इसलिए विरोध का संदेह होता है। जहां तक उन आयतों के प्रमाणों की बात है जो पुरुष द्वारा स्त्री को छूने की अनुमति दर्शाते हैं, जैसे अल्लाह तआला का कथन "या तुमने स्त्रियों को छुआ हो…" (सूरह अन-निसा, आयत 43), और एक क़िरात में "या तुमने स्त्रियों को छुआ हो…", तो यह संकेतात्मक अर्थ से पुरुष द्वारा स्त्री को छूने की अनुमति दर्शाती है। अतः उमैमा की हदीस और इस आयत के बीच विरोध का कोई संदेह नहीं है, क्योंकि यह आयत हर प्रकार के स्पर्श के लिए सामान्य है, जबकि उमैमा की हदीस बैअत के विषय में विशिष्ट है।
तदनुसार, यदि कोई हदीस यह बताती है कि रसूल ने किसी कार्य को नहीं किया, और उनका यह कथन कि वे उसे नहीं करते, न तो निषेध है और न ही निषेध का संकेत देता है, तो वह किसी दूसरे समय में उनके द्वारा उस कार्य को करने के विरुद्ध नहीं है, और न ही उस कार्य को करने के उनके आदेश के विरुद्ध है। पूरी बात यह है कि यह इस बात का कारीना (संकेत) है कि रसूल ﷺ ने जिस कार्य को किया या उसका आदेश दिया, वह मुबाह है, न कि वाजिब और न ही मंदूब, और रसूल ﷺ ने बहुत से मुबाह कार्यों को छोड़ा भी है।
Accordingly, if a hadeeth denotes the abstention of the Messenger from doing something, and his statement that he does not do it, that is not forbiddance nor does it denote the forbiddance, so it does not conflict with his deed of that action in another time, nor does it conflict with his command to do that thing, and the whole matter is that it is a qareenah (indication) that the action which the Messenger did or commanded is mubaah, not waajib nor mandoob, and the Messenger (SAW) abstained from many of the permissible.
उन अहादीस में से जो एक-दूसरे के विरोधी प्रतीत होती हैं, परंतु जिनके बीच सामंजस्य स्थापित करना संभव है, कुछ ऐसी अहादीस हैं जिनमें रसूल (SAW) किसी चीज़ से मना करते हैं और फिर उसका आदेश देते हैं। इनमें वे अहादीस भी हैं जो अपवित्र या हराम चीज़ों से इलाज करने से मना करती हैं। वाइल अल-हज़रमी से, जो सुवैद बिन तारिक़ से रिवायत करते हैं, वर्णित है कि जुफ़ी ने नबी (SAW) से शराब के बारे में पूछा, तो उन्होंने उसे मना किया, या उसे बनाना नापसंद किया। फिर उसने कहा: मैं उसे केवल दवा के लिए बनाता हूँ। उन्होंने फ़रमाया: "वह दवा नहीं, बल्कि बीमारी है।" यह हदीस मुस्लिम ने संकलित की है। और अबू अद-दरदा' से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (SAW) ने फ़रमाया: "अल्लाह ने आसमान से बीमारी और इलाज दोनों उतारे हैं, और हर बीमारी के लिए इलाज बनाया है, इसलिए इलाज करो, परंतु हराम चीज़ से इलाज मत करो।" इसे अबू दाऊद ने संकलित किया है। और अबू हुरैरा से वर्णित है कि रसूल (SAW) ने अपवित्र दवा से मना किया, यानी ज़हर। इसे अहमद ने संकलित किया है। ये अहादीस उन अहादीस के विरोधी प्रतीत होती हैं जिनमें रसूल अपवित्र और हराम चीज़ों से इलाज करने का आदेश देते हैं। क़तादा ने अनस से वर्णित किया कि कुछ लोग, उकल और उरैना, मदीना में नबी (SAW) के पास आए और इस्लाम के बारे में बात की। उन्होंने कहा: "ऐ अल्लाह के नबी, हम पशुओं के मालिक थे, परंतु हम इस देश के नहीं थे," और उन्हें एक बीमारी हो गई जिसके कारण वे मदीना में रहना नापसंद करते थे। तब अल्लाह के रसूल (SAW) ने एक दथवद (तीन से नौ ऊँट) और एक चरवाहे का आदेश दिया, और उन्हें आज्ञा दी कि वे उन पर सवार होकर निकलें और उनका दूध और पेशाब पिएँ। इसे अल-बुखारी ने संकलित किया है। और अनस से वर्णित है कि नबी (SAW) ने अब्दुर्रहमान बिन औफ़ और अज़-ज़ुबैर बिन अल-अव्वाम को उनकी खुजली के कारण रेशम पहनने की अनुमति दी। इसे अहमद ने संकलित किया है। और अत-तिर्मिज़ी ने वर्णन किया कि अब्दुर्रहमान बिन औफ़ और अज़-ज़ुबैर बिन अल-अव्वाम ने एक युद्ध-अभियान के दौरान नबी (SAW) से जूँओं की शिकायत की, तो उन्होंने उनके लिए रेशमी कुर्तों की अनुमति दी। अनस ने कहा: "मैंने उन्हें ये पहने हुए देखा।" अतः ये दोनों हदीसें अपवित्र और हराम चीज़ों से इलाज की अनुमति देती हैं। पहली हदीस इलाज के लिए पेशाब पीने की अनुमति देती है, जो नापाक है, और दूसरी हदीस इलाज के लिए रेशम पहनने की अनुमति देती है, जो हराम है। और उनसे पहले की अहादीस हराम और नापाक चीज़ से इलाज करने से मना करती हैं, और यहीं पर विरोध पैदा होता है। इन दोनों के बीच सामंजस्य का तरीका यह है कि मनाही को कराहत (नापसंदगी) पर महमूल किया जाए, क्योंकि मनाही किसी चीज़ से दूर रहने की माँग है, और यह देखने के लिए कि यह निश्चित (जाज़िम) माँग है या अनिश्चित, एक क़रीना (संकेत) की ज़रूरत होती है। चूँकि रसूल ﷺ नापाक और हराम चीज़ से इलाज की अनुमति देते हैं, जबकि उनसे इलाज करने से मना भी करते हैं, तो यह क़रीना है कि उनसे इलाज करने की मनाही निश्चित नहीं है, इसलिए यह मकरूह है।
From among the ahaadeeth that seem to be in conflict with each other but it is possible to conciliate between them, there are ahaadeeth in which the Messenger (SAW) forbids something and he commands it, from that, there are ahaadeeth that forbid to cure by the impure or forbidden things, from Wa'il Al Hadhrami Al Suwaid ibn taariq that Ja'fi asked the Prophet (SAW) about the intoxicant, and he forbade him, or he detested that he makes it. Then he said: I only make it for medication, he said: it is not a medication but it is a disease", compiled by Muslim. And from Abu Al Dardaa' that the Messenger of Allah (SAW) said: and ,cure the and disease the down sent Allah " He made a cure for every disease, so do cure your selves, but do not cure your selves by a forbidden" compiled by Abu Dawood. And from Abu Hurayrah said of Messenger the Allah (SAW) forbade the impure medicine, means the poison" compiled by Ahmad. These ahaadeeth are in conflict with other ahaadeeth in which the Messenger commands to cure by the impure and the forbidden things. Qataadah Anas from narrated َFrom people That 'Ukal and 'Urainah came to the Madeenah to the Prophet (SAW) and talk about Islam, they said: O Prophet of Allah, we were owners of cattle but we are not from the country, and they detested to stay in the Madeenah for a disease they caught, then the Messenger of Allah (SAW) ordered a dthawd (three to nine camels) and a shepherd, and commanded them to go out riding them and to drink from their milk and urine" compiled by Al-Bukhari. And from Anas that ُ:(SAW (Prophet the ِ" allowed Abd Al-Rahmaan ibn Awf and Al- Zubair ibn Al-Awwam to wear silk for an itch they had" compiled by Ahmad. And Al-Tirmidthi narrated saying it :That Abd Al-Rahmaan ibn Awf and Al-Zubair ibn Al-Awwam complaint the lice to the Prophet (SAW) during an incursion they were in, so he allowed the silk shirts for them. Anas said: I saw it on them" so these two ahaadeeth permit to cure by the impure and the forbidden. The first hadeeth permits to cure by drinking the urine which is impure, and the second hadeeth permits to cure by wearing the silk which is forbidden, and the ahaadeeth before them forbid to cure by the forbidden and the impure, and here is where the conflict falls. The gathering between them is that the prohibition should be carried as (karaahah) hatred, because the prohibition is a request to keep away from, and it needs a qareenah (indication) to show if it is decisive or indecisive request, so being that the Messenger permits to cure by the impure and the forbidden, while he prohibits to cure by them is a qareenah that his prohibition to cure by them is not decisive, so it is makrooh.
और उन हदीसों में से जो एक-दूसरे के विरोधी प्रतीत होती हैं किंतु उनमें मेल बिठाया जा सकता है, वे हदीसें हैं जिनका विषय एक है परंतु उनकी परिस्थितियाँ भिन्न हैं। इसमें से वह है जो ज़ैद बिन ख़ालिद अल-जुहनी से वर्णित है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: "क्या मैं तुम्हें बताऊँ कि सबसे अच्छा गवाह कौन है? वह है जो गवाही उससे माँगे जाने से पहले ही दे दे।" इसे मुस्लिम ने संकलित किया है। इसका विरोध वह है जो इब्न उमर से वर्णित है कि उन्होंने कहा:
And from the ahaadeeth that seem to be in conflict but they can be conciliated with each other, are the ahaadeeth which are united in their subject but their circumstances differ. From that is what is narrated from Zaid ibn Khaaled Al-Juhany that the Messenger of Allah (SAW) said: " Shell I tell you who is the best witness, it is he who brings the testimony before he is asked for it" compiled by Muslim. It conflicts what is narrated from ibn Omar that he said:
"उमर ने जाबिया में हमें ख़ुतबा दिया और कहा: ऐ लोगो, मैं तुम्हारे बीच उसी तरह खड़ा हूँ जैसे अल्लाह के रसूल ﷺ हमारे बीच खड़े हुए थे, फिर उन्होंने कहा: मैं तुम्हें अपने साथियों के बारे में वसीयत करता हूँ, फिर उनके बाद आने वालों के बारे में, फिर उनके बाद आने वालों के बारे में, फिर झूठ इतना फैल जाएगा कि आदमी बिना माँगे क़सम खाएगा, और बिना गवाही माँगे गवाही देगा।" इसे तिरमिज़ी ने संकलित किया है। इस हदीस में रसूल ﷺ ने उस गवाह की निंदा की है जो बिना माँगे गवाही दे, और इससे पहले वाली हदीस में रसूल ﷺ ने उस व्यक्ति की प्रशंसा की है जो माँगे जाने से पहले अपनी गवाही दे, इसलिए दिखता है कि दोनों में टकराव है। इन दोनों हदीसों के बीच सामंजस्य यह है कि पहली हदीस, जिसमें उन्होंने उस गवाह की प्रशंसा की है जो माँगे जाने से पहले गवाही देता है, वह हिस्बा की गवाहियों के मामले में है, यानी वे गवाहियाँ जो अल्लाह तआला के हक़ से संबंधित हैं, जैसे गुलाम को आज़ाद करना (अल-इत्ताक़), वक़्फ़ (अल-वक़्फ़), आम वसीयत (अल-वसिय्यह अल-आम्मह) और इसी तरह की दूसरी बातें। अतः यह हिस्बा का गवाह (शाहिदुल-हिस्बा) सभी गवाहों में सबसे उत्तम है, क्योंकि यदि वह गवाही देकर उसे स्पष्ट न करे तो धर्म का कोई फ़ैसला और शरीयत का कोई सिद्धांत खो सकता है, और इसी प्रकार वह व्यक्ति है जिसने किसी के हक़ की गवाही दी जिसके बारे में वह व्यक्ति नहीं जानता, तो वह उसके पास जाकर उसे इसकी सूचना देता है। रही दूसरी हदीस, जिसमें रसूल ﷺ ने उस गवाह की निंदा की है जो माँगे जाने से पहले गवाही देता है, तो वह इंसानों के हक़ों से संबंधित है, और इस तरह हदीसों की परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं, यद्यपि दोनों का विषय एक ही है।
"Omar delivered a sermon to us in the Jaabyah, he said: O people, I stood for you the way the Messenger of Allah (SAW) stood for us, then he said: I recommend to you my companions, then those who come after them, then those who come after them, then telling lie will spread until the man would swear without being asked to do so, and he would testify without being asked to give a testimony" compiled by Al- Tirmidthi. In this hadeeth the Messenger dispraises the witness who gives a testimony without being asked for it, and in the hadeeth before it the Messenger praises the one who gives his testimony before being asked to give it, so it appears that they are in conflict. The gathering between these two ahaadeeth, is that the first hadeeth in which he praised the witness who gives his testimony before he is asked for it, is in the issue of al-hisbah testimonies, which are testimonies concerning the right of Allah Ta'ala, like the slavery freeing (al-ataaq), the entailment (al-waqf), the general will (al-wasiyah al-'ammah) and the likes. So this witness which is the hisbah witness (shaahid al-hisbah) is the best of witnesses, because if he does not clarify it (by witnessing) a verdict of the religion and a principle of the shariah may get lost, and like this is who has witnessed a right for a person that he does not know about it, so he goes to him and tells him about it. As for the second hadeeth in which the Messenger dispraised the witness who gives his testimony before he is asked for it, that is concerning the rights of the human being, and that is how the circumstances of the ahaadeeth differed despite that their issue is one.
उन हदीसों में से जो आपस में विरोधाभासी प्रतीत होती हैं, लेकिन जिनके बीच सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है, वे वे हदीसें हैं जिनका विषय एक है, परंतु उनकी परिस्थितियाँ भिन्न हैं। इसी में से वह है जो आइशा (रज़ि०) से वर्णित है, जो रसूल (सल्ल०) की पत्नी थीं, कि उन्होंने कहा: अल्लाह के रसूल ﷺ बद्र की ओर निकले। जब आप हर्रतुल वबरह पहुँचे, तो एक व्यक्ति आपसे आ मिला, जिसकी बहादुरी और सहायता का ज़िक्र किया गया था, तो रसूलुल्लाह ﷺ के साथियों को उसे देखकर खुशी हुई। जब वह रसूल ﷺ के पास आया तो उसने कहा: मैं आपके पीछे चलने और आपके साथ (लूट का) लाभ पाने आया हूँ। अल्लाह के रसूल ﷺ ने उससे कहा: क्या तुम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रखते हो? उसने कहा: नहीं। आपने कहा: तो लौट जाओ, मैं किसी मुशरिक से सहायता नहीं लेता। उन्होंने कहा: फिर रसूल ﷺ चलते रहे, यहाँ तक कि जब आप पेड़ (के स्थान) पर पहुँचे तो वह व्यक्ति फिर आपके पास आया और उसने वही कहा जो पहली बार कहा था, तो नबी ﷺ ने उससे भी वही कहा जो पहली बार कहा था। उसने कहा: लौट जाओ, मैं किसी मुशरिक से सहायता नहीं लेता। उन्होंने कहा: फिर वह लौट गया, फिर वह आपके पास मरुभूमि में आया, तो आपने उससे वही कहा जो पहली बार कहा था: क्या तुम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रखते हो? उसने कहा: हाँ। तब अल्लाह के रसूल ﷺ ने उससे कहा: आगे बढ़ो। (इसे मुस्लिम ने संकलित किया है)। और खुबैब से, उन्होंने अब्दुर्रहमान से, उन्होंने अपने पिता से, उन्होंने अपने दादा से वर्णन किया कि वे कहते हैं: मैं अपनी क़ौम के एक व्यक्ति के साथ अल्लाह के रसूल ﷺ के पास आया, जब आप (किसी युद्ध के लिए) चढ़ाई करना चाहते थे। हम उस समय तक इस्लाम स्वीकार नहीं कर चुके थे, और हमने कहा: हमें लज्जा आती है कि हमारी क़ौम किसी मामले (युद्ध) में लगे और हम उनके साथ न हों। आपने कहा: क्या तुम ईमान ला चुके हो? हमने कहा: नहीं। आपने कहा: हम मुशरिकों के विरुद्ध मुशरिकों से सहायता नहीं लेते। वे कहते हैं: फिर हमने इस्लाम स्वीकार किया और आपके साथ (युद्ध में) शामिल हुए। (इसे अहमद ने संकलित किया है)। और अनस से वर्णित है कि उन्होंने कहा: अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: मुशरिकों की आग से रौशनी न माँगो, और अपनी अंगूठियों पर अरबी में नक़्श न करवाओ। (इसे अहमद ने संकलित किया है)। अबू हमीद अल-साइदी से वर्णित है कि उन्होंने कहा: अल्लाह के रसूल ﷺ (एक युद्ध-अभियान के लिए) निकले, जब आप थनियत अल-वदा' से गुज़रे तो एक टुकड़ी (दस्ता) सामने आई। आपने पूछा: ये कौन लोग हैं? उन्होंने कहा: बनू क़ैनुक़ा', ये अब्दुल्लाह बिन सलाम का समूह है। आपने पूछा: क्या उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया है? उन्होंने कहा: नहीं, पर वे अब भी अपने दीन पर हैं। आपने फ़रमाया: उन्हें वापस लौट जाने को कहो, हम मुशरिकों की मदद नहीं लेते। इसे अल-हाफ़िज़ अबू अब्दुल्लाह ने संकलित किया है और नैल अल-औतार के लेखक ने इसका उल्लेख किया है। ये हदीसें उन अन्य हदीसों के विरोध में प्रतीत होती हैं जिनमें मुशरिकों की मदद लेने की अनुमति आई है। मख़रमा से वर्णित है कि उन्होंने कहा: मैंने अल्लाह के रसूल ﷺ को फ़रमाते सुना: तुम रोमियों के साथ एक शांति-संधि करोगे, और तुम उनके साथ मिलकर तुम्हारे पीछे के एक शत्रु पर आक्रमण करोगे। इसे अबू दाऊद ने वर्णित किया है। इमाम तिर्मिज़ी ने अल-ज़ुहरी से संकलित किया है कि नबी ﷺ ने यहूदियों में से उन लोगों को भी (लूट का) हिस्सा दिया जिन्होंने आपके साथ युद्ध किया। और वर्णित है कि क़ज़मान उहुद के दिन नबी ﷺ के साथ निकला, जबकि वह मुशरिक था, और उसने बनू अब्द अल-दार के तीन लोगों को मारा, जो मुशरिकों के ध्वजवाहक थे। यह नैल अल-औतार में सीरत के लेखकों से नक़ल किया गया है। ये हदीसें मुशरिकों की मदद लेने की अनुमति दर्शाती हैं, जबकि पहले की हदीसें उनकी मदद लेने की अवैधता दर्शाती हैं, इसलिए ये एक-दूसरे के विरोध में लगती हैं। इनके बीच सामंजस्य इस प्रकार है: आइशा (रज़ि.) की हदीस में रसूल ﷺ का यह इनकार है कि वे मुशरिक की मदद लेते थे, और रसूल ﷺ का किसी कार्य को न करना उसके हराम होने को नहीं दर्शाता, क्योंकि संभव है कि आप उससे उसी तरह बचते थे जैसे आप किसी जायज़ चीज़ से बचते थे; बल्कि यह इस बात का संकेत है कि मामला उसके विपरीत है, या उसके विपरीत कार्य करना न वाजिब है, न मंदूब, न मुबाह। अतः इस हदीस से कोई विरोध नहीं है। अबू हमीद अस-साइदी की हदीस के बारे में, जिसमें उन्होंने कहा: "हम मुशरिकों से मदद नहीं माँगते," यह बात उनके और उम्मत के बीच आम तौर पर जानी जाती है, इसलिए यह मनाही को दर्शाती है। लेकिन इसका विषय यह था कि एक टुकड़ी अपने ही झंडे के तहत लड़ना चाहती थी, न कि कोई एक व्यक्ति। अतः मनाही उस सेना से मदद माँगने की है जो अपने ही झंडे के तहत लड़ती है, और जिन हदीसों में रसूल ﷺ ने मदद स्वीकार की, उन्होंने व्यक्तियों की मदद स्वीकार की थी। इसलिए दोनों हदीसों की स्थिति अलग है: मनाही अपने झंडे के तहत लड़ने वाली सेना से मदद माँगने की है, और अनुमति व्यक्तियों से मदद माँगने की है। और अनस की हदीस में आग एक रूपक है एक सत्ता (इकाई) के लिए, क्योंकि क़बीला युद्ध की घोषणा के चिह्न के रूप में आग जलाता है, और उसकी आग की रोशनी माँगना उसकी सत्ता के अधीन प्रवेश करना है, और यह निषिद्ध है। और रोमियों वाली हदीस का अर्थ है कि वे हमें जिज़्या देते हैं और हमारी सुरक्षा में आ गए, क्योंकि संधि यही माँगती है, ताकि वे हमारे झंडे के तहत लड़ने वाले बन जाएँ। तदनुसार इन हदीसों में कोई विरोध नहीं है, क्योंकि मनाही मुशरिक से मदद माँगने की उस स्थिति में है जब उसकी मदद इसलिए माँगी जाए कि वह एक सेना है और अपने झंडे के तहत है, और मुशरिक से मदद माँगने की अनुमति केवल उस स्थिति में है जब वह एक व्यक्ति हो या इस्लाम के झंडे के तहत कोई सेना हो। उन हदीसों में से जो आपस में विरोधी प्रतीत होती हैं, किंतु उनके बीच मेल संभव है, वे हदीसें हैं जिनमें रसूल ﷺ किसी चीज़ को सामान्य रूप से मना करते हैं और किसी विशेष स्थिति में उसकी अनुमति देते हैं, तो वह विशेष स्थिति अपवाद बन जाती है, और जो बात उस अनुमति वाली स्थिति के विपरीत है वही मनाही की इल्लत (कारण) बन जाती है। और इसी में से वह है जो अबू ख़द्दाश से एक सहाबी के हवाले से वर्णित है, जिसने कहा: अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
"मुसलमान तीन चीज़ों में साझीदार हैं: पानी, चारागाह और आग।" इसे अहमद ने रिवायत किया है। यह हदीस उस बात से टकराती प्रतीत होती है जो उनसे (ﷺ) पुष्ट है, कि उन्होंने ताइफ़ और मदीना में व्यक्तियों को जल-स्रोतों का अपने लिए निजी स्वामित्व रखने की अनुमति दी थी। किंतु दोनों के बीच सामंजस्य संभव है, क्योंकि जिस पानी को रसूल (ﷺ) ने व्यक्तियों के स्वामित्व में रहने दिया, वह समाज (जमाअह) की ज़रूरत से अधिक था, अतः वह जमाअह की आवश्यकता से बचा हुआ (फ़ाज़िल) था। इसका प्रमाण वह दूसरी हदीस है जिसमें रसूल (ﷺ) ने फ़रमाया: "ज़रूरत से बचे हुए पानी को रोका न जाए" — इसे भी अहमद ने रिवायत किया है। इसका अर्थ है कि वह पानी जिसका निजी स्वामित्व जायज़ है, उसकी जमाअह को कोई ज़रूरत नहीं होती; अतः इसके विपरीत, यानी वह पानी जिसकी जमाअह को ज़रूरत है, उसमें लोग साझीदार हैं। यही लोगों को उसमें साझीदार बनाने की इल्लत (कारण) है, और इस प्रकार दोनों हदीसों के बीच कोई टकराव नहीं रहता।
"The Muslims are partners in three: the water, the pasture, and the fire" compiled by Ahmad. This hadeeth conflicts that which is affirmed from him (SAW) that he permitted for the individuals the possession of the water springs as individual ownership for themselves in the Taa'if and the Madeenah. But it is possible to conciliate between them, for the water that the Messenger permitted to be owned by individuals were not needed by the society (jamaa'ah), so they are a remainder over the need of the jamaa'ah. The daleel on this is the other hadeeth in which the Messenger (SAW) says: "A remainder of the water should not be prevented if it is not needed" compiled by Ahmad. It means that the water which is permitted to be individually owned; the jamaa'ah has no need in it, so its contrary, that is the water which the jamaa'ah needs is what the people are partners in it, so this is the illah of making the people partners in it, and accordingly there is no conflict between the two ahaadeeth.
और इसी प्रकार, जो हदीसें आपस में विरोधी प्रतीत होती हैं, उनकी गहन जाँच करने पर स्पष्ट हो जाता है कि उनमें जो भिन्नताएँ हैं उनके कारण वे वास्तव में विरोधी नहीं हैं, और यह भी स्पष्ट हो जाता है कि रसूलुल्लाह ﷺ के कथनों में कोई विरोध नहीं है, सिवाय एक स्थिति के, और वह है नसख़ (निरस्तीकरण)।
And thus all the ahaadeeth that seem to be in conflict, it becomes clear after scrutinizing in them that they are not in conflict for the differences in them, and it becomes clear that there is no conflict between the sayings of the Messenger except in one situation, which is the abrogation.