मेरी राय तक़लीद और तल्फ़ीक़ के बारे में मज़ाहिब के बीच
My Opinion In Respect To At-taqleed And At-talfeeq Amongst The Madhaahib
1 – मुसलमान के लिए स्वयं किसी एक मज़हब (मत) की तक़लीद करना ज़रूरी है, उन सभी अहकाम (शरई आदेशों) में जिनकी उसे आवश्यकता हो, जैसे कि यदि वह इमाम अश-शाफ़िई की तक़लीद करे।
1 – It is for the Muslim to make Taqleed to a Madh’hab, itself, in all of the Ahkaam that he requires, like if he was to make Taqleed to Ash-Shaafi’iy for instance.
2 – इस मुसलमान के लिए यह जायज़ है कि वह इमाम अश-शाफ़िई के मत के अलावा किसी अन्य मत को अपनाने के लिए पूछे, बशर्ते कि उसका कार्य उस मसअला से जुड़ा या संबंधित न हो जिसमें वह तक़लीद कर रहा है। इसका अर्थ यह है कि उसने अभी तक वह कार्य इमाम अश-शाफ़िई के मत के अनुसार न किया हो। लेकिन यदि उसने वह कार्य इमाम अश-शाफ़िई के मत के अनुसार कर लिया हो, भले ही केवल एक बार, तो उस मसअला में इमाम अश-शाफ़िई के अलावा किसी और की तक़लीद करना उसके लिए जायज़ नहीं है, जब तक कि वह अत-तर्जीह (दलीलों और मतों के बीच वज़न करके किसी को प्राथमिकता देने) के योग्य और सक्षम न हो जाए। उस स्थिति में वह इमाम अश-शाफ़िई का मत छोड़कर उस तर्जीह पर आधारित दूसरा मत अपना सकता है, लेकिन इसलिए नहीं कि वह नया मत उसके लिए हल्का या आसान है।