अल-क़मर (चाँद)
Al-Qamar (The Moon)
प्रस्तावना
Prologue
शुरू से आख़िर तक यह सूरह उन लोगों पर एक ज़बरदस्त हमला है जो चेतावनियों को झुठलाते हैं, और साथ ही ईमानवालों को पक्का और भरोसेमंद दिलासा भी देती है। यह कई दृश्यों में बँटी हुई है, और हर दृश्य में इनकार करने वाली उस क़ौम पर पड़ने वाली एक अलग तरह की यातना दिखाई गई है जिसने अल्लाह के संदेशों को झुठलाया था। हर दृश्य एक ऐसे झटके पर ख़त्म होता है जो इंसानी दिल को हिला देता है, और वह पूछता है: "देखो, मेरी सज़ा कितनी भयानक थी और मेरी चेतावनियाँ कितनी सच्ची निकलीं!" फिर बात यह कहकर पूरी होती है: "हमने क़ुरआन को याद रखने के लिए आसान बना दिया है, तो क्या कोई नसीहत हासिल करने वाला है?" इस सूरह में उठाए गए विषय मक्की दौर की कई सूरतों में भी चर्चा में आते हैं। इसकी शुरुआत क़यामत के दिन के एक दृश्य से होती है और अंत भी एक ऐसे ही दृश्य पर होता है। बीच में यह संक्षेप में नूह की क़ौम, आद, समूद, लूत की क़ौम और फ़िरऔन और उसके साथियों के अंजाम पर बात करती है। इन सब क़िस्सों का ज़िक्र दूसरी सूरतों में भी अलग-अलग अंदाज़ में आता है। लेकिन यहाँ इन सब मामलों को एक ख़ास अंदाज़ में पेश किया गया है, जिससे ये बिल्कुल नए लगते हैं। यहाँ हर घटना एक हंगामाख़ेज़, तूफ़ानी और दहशत फैलाने वाली तस्वीर के रूप में सामने आती है, जो बरबादी और तबाही का पूरा नक़्शा खींच देती है।