मरयम (Mary)
Maryam (Mary)
प्रस्तावना
Prologue
इस सूरah का केंद्रीय विषय ईश्वर की एकता (तौहीद) है, जिसमें उसकी संतान या उसके साझीदार होने की हर धारणा और विचार को अस्वीकार किया गया है। इसमें पुनरुत्थान (क़ियामत) के महत्वपूर्ण विषय को भी उठाया गया है, जो ईश्वर की एकता की अवधारणा से गुँथा हुआ है। इस संबंध में यह सूरah मक्का में उतरी अधिकांश, यदि सभी नहीं, सूरahs के उसी ढाँचे का पालन करती है।
The central theme of this sūrah focuses on God’s oneness, rejecting all concepts and ideas assigning a son or a partner to Him. It also touches on the important issue of resurrection, intertwined as it is with the concept of God’s oneness. In this, the sūrah follows the same pattern as most, if not all, sūrahs revealed in Makkah.
सूरह अपने विषय को कई कहानियों के माध्यम से स्पष्ट करती है। इसकी शुरुआत ज़कariyah और उनके बेटे, यहया, की कहानी से होती है, और इसके बाद मरयम की कहानी और ईसा (Jesus) के जन्म का वर्णन आता है। फिर इब्राहीम की अपने पिता के साथ की कहानी का एक भाग है, और उसके बाद इसहाक़, याक़ूब, मूसा, हारून, इस्माईल, इदरीस, आदम और नूह का संक्षिप्त उल्लेख है। ये कहानियाँ सूरह के लगभग दो-तिहाई हिस्से को घेरती हैं, और ये ईश्वर की एकता, पुनरुत्थान, तथा ईश्वर के साथ किसी संतान या साझीदार के न होने की सच्चाई को दृढ़ता से स्थापित करती हैं।