अल-वाक़िआ (निश्चित घटित होने वाली घटना)
Al-Waqi ‘ah (The Inevitable Event)
प्रस्तावना
Prologue
अल-वाक़िआ, यानी "होने वाली घटना", इस मक्की सूरह को दिया गया नाम है, जो इसके विषय को स्पष्ट करता है। इसमें मुख्य रूप से पुनरुत्थान (क़यामत) की चर्चा की गई है। यह सूरह उन लोगों के तर्क का खंडन करती है जो इसके बारे में संदेह रखते हैं, जो क़ुरआन को झुठलाते हैं और ख़ुदा के साथ साझीदार ठहराते हैं। वे हमेशा यह सवाल करते हैं: "क्या! जब हम मर जाएँगे और मिट्टी और हड्डियाँ बन जाएँगे, तो क्या हमें फिर से उठाया जाएगा? और हमारे पूर्वजों को भी?" (आयतें 47-48) इसलिए सूरह पुनरुत्थान का वर्णन करते हुए शुरू होती है, और उसे "अल-वाक़िआ" का नाम देती है, जो उसके घटित होने को बिल्कुल स्पष्ट कर देता है और उसमें कोई संदेह नहीं छोड़ता: "जब वह घटना घटित होगी जिसका होना निश्चित है, तो उसके घटित होने को कोई झुठला नहीं सकेगा।" (आयतें 1-2) यह उन घटनाओं को उजागर करती है जो उस दिन को बाक़ी सब दिनों से अलग करेंगी: लोगों की स्थितियाँ पूरी तरह बदल जाएँगी, और धरती का रूप भी बदल जाएगा। ये भयावह घटनाएँ एक अलग धरती और बिल्कुल नए मूल्य पैदा करेंगी: "किसी को नीचे गिराती हुई, किसी को ऊँचा उठाती हुई।" जब धरती ज़ोर से हिलाई जाएगी, पहाड़ टूटकर चूर-चूर होकर बिखर जाएँगे, तब तुम तीन वर्गों में बाँट दिए जाओगे। (आयतें 3-7)