अश-शुअरा (कवि)
Al-Shuara (The Poets)
प्रस्तावना
Prologue
इस सूरह में जिस मुख्य विषय पर चर्चा की गई है, यानी ईमान, वही इस्लाम के आरंभिक दौर में मक्का में उतरी सभी सूरहों में समाया हुआ है। इस विषय को उसके सभी प्रमुख पहलुओं से जाँचा गया है: ईश्वर की एकता से शुरुआत होती है: "ईश्वर के साथ किसी दूसरे पूज्य को न पुकारो, नहीं तो तुम यातना भोगने वालों में से हो जाओगे।" (आयत 213), फिर न्याय के दिन का भय: "उस दिन मुझे रुसवाई न सहनी पड़े, जब सब लोग मरने के बाद उठाए जाएँगे; वह दिन जब न धन काम आएगा और न संतान; बल्कि वही व्यक्ति (सफल होगा) जो सही मन के साथ ईश्वर के पास आएगा।" (आयतें 87-89); मुहम्मद ﷺ पर ऊपर से उतारी गई वह़्य (प्रकाशना) पर विश्वास: "निश्चय ही यह (क़ुरआन) सारे संसार के पालनहार की ओर से उतारा गया है। इसे विश्वसनीय आत्मा (फ़रिश्ता) ने आपके हृदय पर उतारा है, ताकि आप सचेत करने वालों में से हों।" (आयतें 192-194); और उन ख़तरों की व्याख्या जिनमें वह व्यक्ति पड़ता है जो ईमान को झुठलाता है, जिसमें इस दुनिया में आने वाली विनाशकारी यातना भी शामिल है, और परलोक की वह यातना भी जो इंकार करने वालों की प्रतीक्षा में है: "उन्होंने निश्चय ही (वह़्य की सच्चाई को) झुठलाया है; अतः जिसका वे मज़ाक़ उड़ाते थे, उसकी वास्तविकता शीघ्र ही उन्हें मालूम हो जाएगी।" (आयत 6) "जो लोग बुराई पर अड़े हुए हैं, वे शीघ्र ही जान लेंगे कि उनका अंजाम कितना बुरा होगा।" (आयत 227)